Monday, June 8, 2009

दिल अगर फूल सा नहीं होता- तीसरी किश्त









मिसरा-ए-तरह "दिल अगर फूल सा नहीं होता" पर पाँच और ग़ज़लें.अंतिम किश्त अभी बाकी है.


ग़ज़ल: एम.बी. शर्मा ‘मधुर’

गर मुक़द्दर लिखा नहीं होता
कोई रुस्तम छुपा नहीं होता

कौन जाने कि आए कब कैसे
मौत का कुछ पता नहीं होता

कोई रौशन-ज़मीर कैसे हो
पेट किसके लगा नहीं होता

बुत-परस्ती तो क़ुफ़्र हो शायद
बुतशिकन भी ख़ुदा नहीं होता

हाल मेरा न पूछते आकर
ज़ख़्म फिर से हरा नहीं होता

जानते हैं शराब दोज़ख़ है
नश्अ हर आप-सा नहीं होता

वक़्त नाज़ुक़ वही जहाँ कोई
बीच का रास्ता नहीं होता



ग़ज़ल : पुर्णिमा वर्मन

काश सूरज ढला नहीं होता
दिन मेरा अनमना नहीं होता

धूप में मुस्कुरा नहीं पाते
दिल अगर फूल सा नहीं होता

मौसमों ने हमें सिखाया है
रोज़ दिन एक सा नहीं होता

राह खुद ही निकल के आती है
जब कोई रास्ता नहीं होता

ज़िंदगी का सफ़र न कट पाता
वो अगर हमनवा नहीं होता



ग़ज़ल: डी.के. मुफ़लिस की ग़ज़ल

ग़म में गर मुब्तिला नहीं होता
मुझको मेरा पता नहीं होता

जो सनम-आशना नहीं होता
उसको हासिल खुदा नहीं होता

दर्द का सिलसिला नहीं होता
तू अगर बेवफा नहीं होता

वक़्त करता है फैसले सारे
कोई अच्छा-बुरा नहीं होता

मैं अगर हूँ तो कुछ अलग क्या है
मैं न होता,तो क्या नहीं होता

दूसरों का बुरा जो करता है
उसका अपना भला नहीं होता

जब तलक आग में न तप जाये
देख , सोना खरा नहीं होता

क्यूं भला लोग डूबते इसमें
इश्क़ में गर नशा नहीं होता

हाँ ! जुदा हो गया है वो मुझसे
क्या कोई हादिसा नहीं होता ?

सीख लेता जो तौर दुनिया के
कोई मुझसे खफा नहीं होता

ये ज़मीं आसमान हो जाये
ठान ही लो तो क्या नहीं होता

जो न गुज़रा तुम्हारी सोहबत में
पल वही खुश-नुमा नहीं होता

कैसे निभती खिजां के मौसम से
दिल अगर फूल-सा नहीं होता

जिंदगी क्या है, चंद समझौते
क़र्ज़ फिर भी अदा नहीं होता

हौसला-मंद कब के जीत चुके
काश!मैं भी डरा नहीं होता

बे-दिली , बे-कसी , अकेलापन
तू नहीं हो, तो क्या नहीं होता

डोर टूटेगी किस घड़ी 'मुफलिस'
कुछ किसी को पता नहीं होता



ग़ज़ल: चन्द्रभान भारद्वाज

प्यार में यूँ दिया नहीं होता;
दिल अगर फूल सा नहीं होता

प्यार की लौ सदा जली रहती
इसका दीया बुझा नहीं होता

एक सौदा है सिर्फ घाटे का
प्यार में कुछ नफा नहीं होता

रात करवट लिये गुजरती है,
दिन का कुछ सिलसिला नहीं होता

ज़िन्दगी भागती ही फिरती है
प्यार का घर बसा नहीं होता

लोग सदियों की बात करते हैं
एक पल का पता नहीं होता

पहले हर बात का भरोसा था
अब किसी बात का नहीं होता

प्यार का हर धड़ा बराबर है
कोई छोटा बड़ा नहीं होता

पूरी लगती न 'भारद्वाज' गज़ल
प्यार जब तक रमा नहीं होता



ग़ज़ल: ख़ुर्शीदुल हसन नय्यर

ग़म ग़ज़ल मे ढला नहीं होता
दिल अगर फूल सा नहीं होता

होता है सिर्फ वो मेरे दिल में
जब कोई दूसरा नहीं होता

कौन पढ़ता इबारतें दिल की
चेहरा ग़र आइना नहीं होता

सिर्फ़ इल्ज़ाम और नफरत से
हल कोई मसअला नहीं होता

हम से सब कुछ बयान होता है
पर बयाँ मुद्दआ नहीं होता

हम न होते तो गेसु-ए- सुम्बुल
इतना सँवरा- सजा नहीं होता

याद रखना कि भूल ही जाना
बस में कुछ बा-खु़दा नहीं होता

चाहने से किसी के हम सफरो
कभी अच्छा-बुरा नहीं होता

ज़ख्म-ए-दिल कैकटस है सहरा का
कब भला ये हरा नहीं होता

हम जुनूं केश से कभी नय्यर
इश्क का हक़ अदा नहीं