Saturday, August 15, 2009

राजेश रेड्डी साहेब की पाँच और ग़ज़लें











कृष्ण बिहारी 'नूर'शायरी मे एक जाना पहचाना नाम है जिनकी शायरी सूफ़ियाना रंग में रंगी हुई है और मक़बूल भी है उनकी ग़ज़ल का ये मतला पढ़िए-

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझ में
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में


यहाँ एक सूफ़ी शायर को खु़द में खु़दा का होना मजबूरन मानना पड़ रहा है और इस बात को रेड्डी साहब ने अपने अंदाज़ में यूँ कहा-

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें
मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें


मेरे चहरे पे मुसलसल हैं निगाहें उसकी
जाने किस शख़्स को वो ढूँढ रहा है मुझमें

हँसना चाहूँ भी तो हँसने नहीं देता मुझको
ऐसा लगता है कोई मुझसे ख़फ़ा है मुझमें

मैं समुन्दर हूँ उदासी का अकेलेपन का
ग़म का इक दरिया अभी आके मिला है मुझमें

इक ज़माना था कई ख्वाबों से आबाद था मैं
अब तो ले दे के बस इक दश्त बचा है मुझमें

किसको इल्ज़ाम दूँ मैं किसको ख़तावार कहूँ
मेरी बरबादी का बाइस तो छुपा है मुझमें

दो-






शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं

जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है
जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं

सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी
और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं

ज़िन्दगी जब मुझसे मज़बूती की रखती है उमीद
फ़ैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं

आपके रस्ते हैं आसाँ, आपकी मंजिल क़रीब
ये डगर कुछ और ही है जिस डगर जाता हूँ मैं

तीन






दुख के मुका़बिल खड़े हुए हैं
हम गुर्बत में बड़े हुए हैं

मेरी मुस्कानों के नीचे
ग़म के खज़ाने गड़े हुए हैं

जीवन वो जेवर है, जिसमें
अश्क के मोती जड़े हुए हैं

जा पहुँचा मंज़िल पे ज़माना
हम सोचों में पड़े हुए हैं

दुनिया की अपनी इक ज़िद है
हम अपनी पर अड़े हुए हैं

कुछ दुख हम लेकर आए थे
कुछ अपने ही गड़े हुए हैं

जो ख़त वो लिखने वाला है
वो ख़त मेरे पढ़े हुए हैं

चार







रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए
सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा
फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था
एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है

पाँच








इस अहद के इन्साँ मे वफ़ा ढूँढ रहे हैं
हम ज़हर की शीशी मे दवा ढूँढ रहे हैं

दुनिया को समझ लेने की कोशिश में लगे हम
उलझे हुए धागों का सिरा ढूँढ रहे हैं

पूजा में, नमाज़ों अज़ानों में, भजन में
ये लोग कहाँ अपना खु़दा ढूँढ रहे हैं

पहले तो ज़माने में कहीं खो दिया खु़द को
आईने में अब अपना पता ढूँढ रहे हैं

ईमाँ की तिज़ारत के लिए इन दिनों हम भी
बाज़ार में अच्छी सी जगह ढूँढ रहे हैं



शायर का पता-







राजेश रेड्डी
ए-403, सिल्वर मिस्ट, अमरनाथ टॉवर के पास,
सात बंगला, अंधेरी (प.) मुबंई - 61