Monday, October 26, 2009

गिरीश पंकज-ग़ज़लें और परिचय










1957 में जन्में गिरीश पंकज की अब तक 28 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और एक ग़ज़ल संग्रह भी जल्द ही प्रकाशित हो रहा है।आप दिल्ली साहित्य अकादमी के सदस्य हैं और सद्भावना दर्पण नामक पत्रिका के संपादक भी हैं। "आज की ग़ज़ल" पर पेश हैं इनकी तीन ग़ज़लें-

एक

मै अँधेरे में उजाला देखता हूँ
भूख में रोटी-निवाला देखता हूँ

आदमी के दर्द की जो दे खबर भी
है कहीं क्या वो रिसाला देखता हूँ

हो गए आजाद तो फिर किसलिए मैं
आदमी के लब पे ताला देखता हूँ

हूँ बहुत प्यासा मगर मैं क्या करूं अब
तृप्त हाथों में ही प्याला देखता हूँ

कोई तो मिल जाए बन्दा नेकदिल सा
ढूंढता मस्जिद, शिवाला देखता हूँ

दो

तुम मिले तो दर्द भी जाता रहा
देर तक फ़िर दिल मेरा गाता रहा

देख कर तुमको लगा हरदम मुझे
जन्मों-जन्मो का कोई नाता रहा

दूर मुझसे हो गया तो क्या हुआ
दिल में उसको हर घड़ी पाता रहा

अब उसे जा कर मिली मंजिल कहीं
जो सदा ही ठोकरे खाता रहा

मुफलिसी के दिन फिरेंगे एक दिन
मै था पागल ख़ुद को समझाता रहा

ज़िन्दगी है ये किराये का मकां
इक गया तो दूसरा आता रहा

तीन

आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं
क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं

हारने का अर्थ यह भी जानिए
जीत की संभावनाएं साथ हैं

इस अँधेरे को फतह कर लेंगे हम
रौशनी की कुछ कथाएँ साथ हैं

मर ही जाता मैं शहर में बच गया
गाँव की शीतल हवाएं साथ हैं

ये सफ़र अंतिम हैं खाली हाथ लोग
पर हजारों वासनाएँ साथ हैं

(बहरे-रमल की मुज़ाहिफ़ शक्लों मे कही गई ग़ज़लें)

शायर का पता-
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
जी-३१, नया पंचशील नगर,
रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१
मोबाइल : ०९४२५२ १२७२०