Tuesday, February 2, 2010

गुज़रे वक़्त की बातें

















वक़्त कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता। ऐसा लगता है कि हम जैसे किसी पुल की तरह खड़े रहते हैं और वक़्त गाड़ियों की तरह निरंतर गुज़रता रहता है। जब द्विज जी से मिला था कालेज में उस वक़्त मेरी उम्र १८-१९ साल की थी और मैं पंजाबी में कविता लिखता था और शिव कुमार बटालवी का भक्त था जो आज भी हूँ लेकिन ग़ज़ल की तरफ़ रुझान द्विज जी की वज़ह से हुआ और ये ग़ज़ल जो आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं द्विज जी ने तभी कही थी । वो कालेज का समय, वो उम्र, वो बे-फ़िक्री कभी लौट कर नहीं आती लेकिन मन हमेशा गुज़रे हुए वक़्त को छाती से ऐसे लगा के रखता है जैसे कोई मादा बांदर अपने मरे हुए बच्चे को छाती से लगा के घूमती हो जिसे ये विशवास ही नहीं होता कि ये बच्चा मर चुका है।

लीजिए द्विज जी की ग़ज़ल मुलाहिज़ा फ़रमाइए-

हमने देखी भाली धूप
उजली, पीली, काली धूप

अपना हर कोना सीला
उनकी डाली-डाली धूप

अम्बर-सा उनका सूरज
अपनी सिमटी थाली धूप

बर्फ़-घरों में तो हमको
लगती है अब गाली धूप

मछली जैसे फिसली है
हमने जब भी सम्हाली धूप

पास इसे अपने रख लो
ये लो अपनी जाली धूप

शिव कुमार बटालवी का ज़िक्र हुआ है तो क्यों न आसा सिंह मस्ताना की आवाज़ में शिव की ये ग़ज़ल-

मैनूँ तेरा शबाब लै बैठा
रंग गोरा गुलाब लै बैठा
किंनी बीती ते किंनी बाकी ए
मैनूँ एहो हिसाब लै बैठा..

सुनी जाए-