Monday, November 29, 2010

सोच के दीप जला कर देखो

इस बहर में शे’र कहना सचमुच पाँव में पत्थर बाँध कर पहाड़ पर चढ़ने जैसा है। क्योंकि इसमें तुकबंदी की तो बहुत गुंज़ाइश थी लेकिन शे’र कहना बहुत कठिन। इसी वज़ह से तीन-चार शायरों को हम इसमें शामिल नहीं कर सके । दानिश भारती जी(मुफ़लिस) ने कुछ ग़ल्तियों की तरफ़ इशारा किया था, उनको हमने सुधारने की कोशिश की है और आप सबसे गुज़ारिश है कि कहीं कुछ ग़ल्ति नज़र आए तो ज़रूर बताएँ। हमारा मक़सद यह भी रहता है कि नये प्रयासों को भी आपके सामने लेकर आएँ और अनुभवी शायरों को भी। भावनाएँ तो हर शायर की एक जैसी होती हैं लेकिन उनको व्यक्त करने की शैली जुदा होती है। और यही अंदाज़े-बयां एक शायर को दूसरे से जुदा करता है और यही महत्वपूर्ण है।

द्विज जी का ये शे’र

यह बस्ती कितनी रौशन है
सोच के दीप जला कर देखो

इसी अंदाज़े-बयां का एक उदाहरण है। हर शायर ने तारीकी दूर करने के लिए सोच के दीप जलाए हैं लेकिन बस्ती कितनी रौशन है उसको देखने के लिए भी सोच के दीप जलाए जा सकते हैं । बात को जुदा तरीके से रखने का ये हुनर ही शायरी है जिसकी मिसाल है ये एक और शे’र -

जाओ, इक भूखे बच्चे को
लोरी से बहला कर देखो

अगली और अंतिम क़िस्त में मैं अपना प्रयास आपके सामने रखूंगा।लीजिए मुलाहिज़ा कीजिए द्विज जी की ग़ज़ल-











द्विजेंद्र द्विज

चोट नई फिर खा कर देखो
शहरे-वफ़ा में आ कर देखो

अपनी छाप गँवा बैठोगे
उनसे हाथ मिला कर देखो

आए हो मुझको समझाने
ख़ुद को भी समझा कर देखो

सपनों को परवाज़ मिलेगी
आस के पंख लगा कर देखो

जिनपे जुनूँ तारी है उनको
ज़ब्त का जाम पिलाकर देखो

जाओ, इक भूखे बच्चे को
लोरी से बहला कर देखो

लड़ जाते हो दुनिया से तुम
ख़ुद से आँख मिला कर देखो

यह बस्ती कितनी रौशन है
सोच के दीप जला कर देखो

सन्नाटे की इस बस्ती में
‘द्विज’, अशआर सुना कर देखो