बहुत दिनों के बाद आज फिर मन हुआ कि तरही मुशायरा करवाया जाए। सो मिसरा-ए-तरह हाज़िर है-
कया कहिए ऐसी हालत में, अब कौन समझने वाला है
बहर- 8 फ़ेलुन,(22x8)
क़ाफ़िया- वाला,पाला,ताला आदि
रदीफ़- है
ग़ज़लें मुझे satpalg.bhatia@gmail.com पर मेल कर दें। ग़ज़लें अगर सूफ़ियाना रंग में हों तो मुशायरे में रौनक आ जयेगी।
शामको जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
राजेश रेड्डी
किसीको घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई,
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई
मुनव्वर राना
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए.
बशीर बद्र
है ज़िन्दगी कमीज़ का टूटा हुआ बटन
बिँधती हैं उँगलियाँ भी जिसे टाँकते हुए.
द्विजेन्द्र "द्विज"
एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवाँ है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशाँ है आज
अली सरदार जाफ़री
कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है
शकील बदायूनी
उसने इतना तो सलीका रक्खा
बंद कमरे में दरीचा रक्खा
ज्ञान प्रकाश विवेक
आ के अब तस्लीम कर लें तू नहीं तो मैं सही
कौन मानेगा के हम में बेवफ़ा कोई नहीं
अहमद फ़राज़
हमारे ऐब हमें उन्गलियों पे गिनवाओ,
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो
राहत ईदौरी
हमारी ज़िन्दगी का इस तरह हरसाल कटता है
कभी गाड़ी पलटती है, कभी तिरपाल कटता है
दिखाते हैं पड़ौसी मुल्क़ आँखें, तो दिखाने दो
कभी बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है
सरक़े का कोई शेर ग़ज़ल में नहीं रक्खा
हमने किसी लौंडी को महल में नहीं रक्खा
मिट्टी का बदन कर दिया मिट्टी के हवाले
मिट्टी को किसी ताजमहल में नहीं रक्खा
मुनव्वर राना
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2 comments:
jrur koshish karege.....
na samjh huain samajhne wale, ab kaon samajhne wala hai..
jhoothi ibaratien buland huin, sach ke moonh par tala hai....
kis tarah khyal zahir karain logon
asliyat par parda dal rahe,
asliyat main jinka moonh kala hai...
badi badi takreerain, badi badi heedyatain..
chor-uchake hukmran hue, jamhooriyat ka ye rank nirala hai.
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