Tuesday, October 26, 2021

साहिर की पुण्यतिथि (25 अक्टूबर पर विशेष)- देवमणि पांडेय का लेख

 (साहिर की पुण्यतिथि 25 अक्टूबर पर विशेष) : लेखक देव मणि पांडेय

साहिर और सुधा मल्होत्रा की दास्ताँ

अमृता प्रीतम के लिए साहिर दोपहर की नींद में देखे गए किसी हसीन ख़्वाब की तरह थे। दोपहर की नींद टूटने के बाद भी ख़्वाब की ख़ुमारी घंटों छाई रहती है। अमृता प्रीतम के ज़हन पर साहिर के ख़्वाब की ख़ुमारी ताज़िंदगी छाई रही। एक दिन अमृता प्रीतम ने अपने शौहर सरदार प्रीतम से तलाक़ ले लिया मगर उनका सरनेम ताउम्र अपने पास रखा। सन् 1960 में अमृता ने मुंबई आने का इरादा किया। सुबह ब्लिट्ज अख़बार पर नज़र पड़ी। साहिर और सुधा मल्होत्रा के फोटो के नीचे लिखा था- साहिर की नई मुहब्बत। चित्रकार इमरोज़ के स्कूटर पर बैठ कर उनकी पीठ पर अंगुलियों से साहिर का नाम लिखने वाली अमृता ने शादी किए बिना इमरोज़ के साथ घर बसा लिया।
सब्ज़ शाख़ पर इतराते हुए किसी सुर्ख़ गुलाब की तरह सिने जगत में सुधा मल्होत्रा की दिलकश इंट्री हुई। काली ज़ुल्फें, गोरा रंग, बोलती हुई आंखें, हया की सुर्ख़ी से दमकते हुए रुख़सार और लबों पर रक़्स करती हुई मोहक मुस्कान ... सचमुच सुधा मल्होत्रा का हुस्न मुकम्मल ग़ज़ल जैसा था। साहिर ने इस ग़ज़ल पर एक नज़्म लिख डाली-
कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए
तू इससे पहले सितारों में बस रही थी कहीं
तुझे ज़मीं पर बुलाया गया है मेरे लिए
चेतन आनंद की फ़िल्म के लिए संगीतकार ख़य्याम ने सुधा मल्होत्रा और गीता दत्त की आवाज़ में इस नज़्म को रिकॉर्ड किया। फ़िल्म नहीं बन सकी। इसी नज़्म को केंद्र में रखकर यश चोपड़ा ने एक कहानी तैयार की। इस पर एक यादगार फ़िल्म 'कभी कभी' बनी। फ़िल्म की नायिका राखी की तरह सुधा मल्होत्रा ने भी अचानक शादी कर ली थी।
फ़िल्म 'भाई बहन' (1959) में सुधा मल्होत्रा की गायकी से साहिर बेहद मुतास्सिर हुए। फ़िल्म 'दीदी' के संगीतकार एन दत्ता बीमार पड़ गए। साहिर की गुज़ारिश पर गायिका सुधा मल्होत्रा ने साहिर की नज़्म को कंपोज़ किया। सुधा की आवाज़ में यह नज़्म रिकॉर्ड हुई-
तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है
साहि की शख़्सियत पर मुहब्बत का रंग छाने लगा था। फ़िल्म 'बरसात की रात' (1960) में साहिर ने गायिका सुधा मल्होत्रा के लिए सिफ़ारिश की। सुधा मल्होत्रा के हुस्न में तपिश थी मगर उनकी गायिकी भी दमदार थी। फ़िल्म की बेमिसाल क़व्वाली में उनकी गायकी का कमाल देखने लायक़ है-
ना तो कारवाँ की तलाश है,
ना तो हमसफ़र की तलाश है.
मेरे शौक़-ए-ख़ाना ख़राब को,
तेरी रहगुज़र की तलाश है
मीडिया ने सुधा मल्होत्रा को साहिर की नई मुहब्बत के रूप में प्रचारित किया। दिल्ली से आईं सुधा मलहोत्रा की उम्र महज 23 साल थी। मगर वे अमृता प्रीतम की तरह दिन में ख़्वाब देखने वाली जज़्बाती लड़की नहीं थीं। उन्होंने घोषणा कर दी कि वे अब फ़िल्मों के लिए नहीं गाएंगी। दूसरा नेक काम सुधा मलहोत्रा ने ये किया कि अपने बचपन के दोस्त शिकागो रेडियो के मालिक गिरधर मोटवानी से तुरंत शादी कर ली। फ़िल्मी चकाचौंध से दूर अपने घर की दहलीज़ में आस्था का दीया जलाकर सुधा मल्होत्रा गा रहीं थीं-
न मैं धन चाहूँ न रतन चाहूँ
तेरे चरणों की धूल मिल जाए
तो मैं तर जाऊं
राज कपूर ने सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में एक ग़ज़ल सुनी। वे सुधा के घर गए। सुधा ने कहा- राज साहब, अब मैं फ़िल्मों के लिए नहीं गाती। उनके आग्रह पर सुधा ने अमेरिका अपने शौहर को फ़ोन किया। शौहर ने अनुमति दी। फ़िल्म 'प्रेम रोग' में सुधा मलहोत्रा ने एक गीत गाया-
ये प्यार था या कुछ और था
न तुझे पता न मुझे पता
अब्दुल हई उर्फ़ साहिर ने नज़्म की शक्ल में अपनी पहली मुहब्बत ऐश कौर को एक ख़त लिखा था। नतीजा ये हुआ कि कॉलेज प्रशासन ने साहिर को कॉलेज से निकाल दिया। साहिर के दिल में न जाने कैसा ख़ौफ़ बैठ गया कि उन्होंने न तो अमृता प्रीतम से अपनी मुहब्बत का इज़हार किया और न ही सुधा मल्होत्रा से। उनकी ख़ामोशी में उनका इज़हार पोशीदा था। मुहब्बत उनके लिए हसीन ख़्वाबों की एक धनक थी जिसका दूर से वे दीदार किया करते थे। अपनी तनहाइयों को रोज़ शाम को वे जाम से आबाद किया करते थे। मगर दुनिया को साहिर मुहब्बत के ऐसे तराने दे गए जिसमें धड़कते दिलों की गूंज सुनाई पड़ती है।
साहिर अपने गीतों में नया रंग और नई ख़ुशबू लेकर आए। देश, समाज और वक़्त के मसाईल के साथ उनके गीतों में एहसास और जज़्बात की ऐसी नक़्क़ाशी है जिससे उनके गीत बिल्कुल अलग नज़र आते हैं। एक जुमले में किसी अहम् बात को साहिर इतनी ख़ूबसूरती से कह देते हैं कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है- जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं।
8 मार्च 1921 को लुधियाना में जन्मे साहिर लुधियानवी का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। साहिर ने चार मिसरे अपने लिए कहे थे। वो आपके लिए पेश हैं-
न मुंह छुपा के जिए हम न सर झुका के जिए
सितमगरों की नज़र से नज़र मिलाके जिए
अब एक रात अगर कम जिए तो कम ही सही
यही बहुत है कि हम मशअलें जलाके जिए
आपका-
देवमणि पांडेय
सम्पर्क : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063 , 98210 82126

फेसबुक से साभार

सतपाल ख़याल - तकतीअ और बहर

 बहर की यदि बात करें तो फ़ारसी के ये भारी भरकम शब्द जैसे फ़ाइलातुन, मसतफ़ाइलुन या तमाम बहरों के नाम आप को याद करने की ज़रूरत नही है। ये सब उबाऊ है इसे दिलचस्प बनाने की कोशिश करनी है।  आप समझें कि संगीतकार जैसे गीतकार को एक धुन दे देता है कि इस पर गीत लिखो.. गीतकार उस धुन को बार-बार गुनगुनाता है और अपने शब्द उस मीटर / धुन / ताल में फिट कर देता है बस.. गीतकार को संगीत सीखने की ज़रूरत नहीं है उसे तो बस धुन को पकड़ना है। ये तमाम बहरें जिनका हमने ज़िक्र किया ये आप समझें एक किस्म की धुनें हैं। आपने देखा होगा छोटा सा बच्चा टी.वी पर गीत सुनके गुनगुनाना शुरू कर देता है वैसे ही आप भी इन बहरों की लय या ताल कॊ पकड़ें और शुरू हो जाइये। हाँ बस आपको शब्दों का वज़्न करना ज़रूर सीखना है जो आप उदाहरणों से समझ जाएंगे। 


हम शब्द को उस आधार पर तोड़ेंगे जिस आधार पर हम उसका उच्चारण करते हैं। शब्द की सबसे छोटी इकाई होती है वर्ण। तो शब्दों को हम वर्णों मे तोड़ेंगे।  वर्ण वह ध्वनि हैं जो किसी शब्द को बोलने में एक समय में हमारे मुँह से निकलती है और ध्वनियाँ केवल दो ही तरह की होती हैं या तो लघु (छोटी)  या दीर्घ (बड़ी)। अब हम कुछ शब्दों को तोड़कर देखते हैं और समझते हैं, जैसे: 

"आकाश"
ये तीन वर्णो से मिलकर बना है. 


आ+ का+ श 

अब छोटी और बड़ी आवाज़ों के आधार पर या आप कहें कि गुरु और लघु के आधार पर हम इन्हें चिह्नित कर लेंगे. गुरु के लिए "2 " और लघु के लिए " 1" का इस्तेमाल करेंगे. 

जैसे:
सि+ता+रों के आ+गे ज+हाँ औ+र भी हैं. 

(1+2+2 1+ 2+2 1+2+2 1+ 2+2)

अब हम इस एक-दो के समूहों को अगर ऐसे लिखें.
122 122 122 122 

तो अब आगे चलते हैं बहरो की तरफ़. उससे पहले कुछ परिभाषाएँ देख लें जो आगे इस्तेमाल होंगी। 


तकतीअ:

वो विधि जिस के द्वारा हम किसी मिसरे या शे'र को अरकानों के तराज़ू मे तौलते हैं, ये विधि तकतीअ कहलाती है। तकतीअ से पता चलता है कि शे'र किस बहर में है या ये बहर से खारिज़ है। सबसे पहले हम बहर का नाम लिख देते हैं।, फिर वो सालिम है या मुज़ाहिफ़ है. मसम्मन ( आठ अरकान ) की है इत्यादि.


अरकान और ज़िहाफ़:

अरकानों के बारे में तो हम जान गए हैं कि आठ अरकान जो बनाये गए जो आगे चलकर बहरों का आधार बने. ये इन आठ अरकानों में कोशिश की गई की तमाम आवाज़ों के संभावित नमूनों को लिया जाए.ज़िहाफ़ इन अरकानों के ही टूटे हुए रूप को कहते हैं जैसे:फ़ाइलातुन(२१२२) से फ़ाइलुन(२१२).


मसम्मन और मुसद्द्स:

लंबाई के लिहाज़ से बहरें दो तरह की होती हैं मसम्मन और मुसद्द्स. जिस बहर के एक मिसरे में चार और शे'र में आठ अरकान हों उसे मसम्मन बहर कहा जाता है और जिनमें एक मिसरे मे तीन शे'र में छ: उन बहरों को मुसद्द्स कहा जाता है. जैसे:

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
(122 122 122 122)
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं.
(122 122 122 122)

यह आठ अरकान वाली बहर है तो यह मसम्मन बहर है.


मफ़रिद या मफ़रद और मुरक्कब बहरें:

जिस बहर में एक ही रुक्न इस्तेमाल होता है वो मफ़रद और जिनमे दो या अधिक अरकान इस्तेमाल होते हैं वो मुरक्कब कहलातीं हैं जैसे:

सितारों के अगे यहाँ और भी हैं
(122 122 122 122)

ये मफ़रद बहर है क्योंकि सिर्फ फ़ऊलुन ४ बार इस्तेमाल हुआ है.

अगर दो अरकान रिपीट हों तो उस बहर को बहरे-शिकस्ता कहते हैं जैसे:
फ़ाइलातुन फ़ऊलुन फ़ाइलातुन फ़ऊलुन

अब अगर मैं बहर को परिभाषित करूँ तो आप कह सकते हैं कि बहर एक मीटर है, एक लय है, एक ताल है जो अरकानों या उनके ज़िहाफ़ों के साथ एक निश्चित तरक़ीब से बनती है. असंख्य बहरें बन सकती है एक समूह से.

जैसे एक समूह है:

122 122 122 122

इसके कई रूप हो सकते हैं जैसे:

122 122 122 12
122 122 122 1
122 122 
122 122 1

सबसे पहली बहार है:


बहरे-मुतका़रिब:


1.मुत़कारिब (122x4) मसम्मन सालिम
(चार फ़ऊलुन )


*सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं.

*कोई पास आया सवेरे-सवेरे
मुझे आज़माया सवेरे-सवेरे.



लेखक : सतपाल ख़याल 
ये दोनों शे'र बहरे-मुतकारिब में हैं और ये बहुत मक़बूल बहर है. बहर का सालिम शक्ल में इस्तेमाल हुआ है यानि जिस शक्ल में बहर के अरकान थे उसी शक्ल मे इस्तेमाल हुए.ये मसम्मन बहर है इसमे आठ अरकान हैं एक शे'र में.तो हम इसे लिखेंगे: बहरे-मुतका़रिब मफ़रद मसम्मन सालिम.अगर बहर के अरकान सालिम या शु्द्ध शक्ल में इस्तेमाल होते हैं तो बहर सालिम होगी अगर वो असल शक्ल में इस्तेमाल न होकर अपनी मुज़ाहिफ शक्ल में इस्तेमाल हों तो बहर को मुज़ाहिफ़ कह देते हैं.सालिम मतलब जिस बहर में आठ में से कोई एक बेसिक अरकान इस्तेमाल हुआ हो. हमने पिछले लेख मे आठ बेसिक अरकान का ज़िक्र किया था जो सारी बहरों का आधार है.मुज़ाहिफ़ मतलब अरकान की बिगड़ी हुई शक्ल.जैसे फ़ाइलातुन सालिम शक्ल है और फ़ाइलुन मुज़ाहिफ़. सालिम शक्ल से मुज़ाहिफ़ शक्ल बनाने के लिए भी एक तरकीब है जिसे ज़िहाफ़ कहते हैं.तो हर बहर या तो सालिम रूप में इस्तेमाल होगी या मुज़ाहिफ़ मे, कई बहरें सालिम और मुज़ाहिफ़ दोनों रूप मे इस्तेमाल होती हैं. अरकानों से ज़िहाफ़ बनाने की तरकीब बाद में बयान करेंगे.हम हर बहर के मुज़ाहिफ़ और सालिम रूप की उदाहरणों का उनके गुरु लघू तरकीब से, अरकानों के नाम देकर समझेंगे जो मैं समझता हूँ कि आसान होगा, नहीं तो ये खेल पेचीदा हो जाएगा.


बहरे-मुतका़रिब मुज़ाहफ़ शक्लें:


1.
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊ (फ़ऊ या फ़+अल)
122 122 122 12

गया दौरे-सरमायादारी गया
तमाशा दिखा कर मदारी गया.(इक़बाल)

दिखाई दिए यूँ कि बेखुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले.(मीर)

(ये महज़ूफ ज़िहाफ़ का नाम है)

2:
फ़ऊल फ़ालुन x 4
121 22 x4
(सौलह रुक्नी)


ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ न लेहु काहे लगाये छतियाँ

हज़ार राहें जो मुड़के देखीं कहीं से कोई सदा न आई.
बड़ी वफ़ा से निभाई तूने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई.


3:
फ़ऊल फ़ालुन x 2
121 22 x 2

वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था.
हवाओं का रुख दिखा रहा था.


4:
फ़ालुन फ़ऊलुन x2
22 122 x2


नै मुहरा बाक़ी नै मुहरा बाज़ी
जीता है रूमी हारा है काज़ी (इकबाल)


5:
फ़ाइ फ़ऊलुन
21 122 x 2

सोलह रुक्नी
21 122 x4

6:
22 22 22 22
चार फ़ेलुन या आठ रुक्नी.

इस बहर में एक छूट है इसे आप इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
211 2 11 211 22
दूसरा, चौथा और छटा गुरु लघु से बदला जा सकता है.


एक मुहव्ब्त लाख खताएँ
वजह-ए-सितम कुछ हो तो बताएँ.

अपना ही दुखड़ा रोते हो
किस पर अहसान जताते हो.(ख्याल)


7:
(सोलह रुक्नी)
22 22 22 22 22 22 22 2(11)
यहाँ पर हर गुरु की जग़ह दो लघु आ सकते हैं सिवाए आठवें गुरु के.


* दूर है मंज़िल राहें मुशकिल आलम है तनहाई का
आज मुझे अहसास हुआ है अपनी शिकस्ता पाई का.(शकील)

* एक था गुल और एक थी बुलबुल दोनों चमन में रहते थे
है ये कहानी बिल्कुल सच्ची मेरे नाना कहते थे.(आनंद बख्शी)

* पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है.(मीर)

और..
एक ये प्रकार है
22 22 22 22 22 22 22
इसमे हर गुरु की जग़ह दो लघु इस्तेमाल हो सकते हैं.

8:
फ़ालुन फ़ालुन फ़ालुन फ़े.
22 22 22 2

अब इसमे छूट भी है इस को इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं
211 211 222


* मज़हब क्या है इस दिल में
इक मस्जिद है शिवाला है


अब मुद्दे की बात करते हैं आप समझ लें कि मैं संगीतकार हूँ और आप गीतकार या ग़ज़लकार तो मैं आपको एक धुन देता हूँ जो बहरे-मुतकारिब मे है. आप उस पर ग़ज़ल कहने की कोशिश करें. इस बहर को याद रखने के लिए आप चाहे इसे :

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
(122 122 122 122)

या
छमाछम छमाछम छमाछम छमाछम

या
तपोवन तपोवन तपोवन तपोवन

कुछ भी कह लें महत्वपूर्ण है इसका वज़्न, बस...

1.बहरे- मुत़कारिब
(122x4)
(चार फ़ऊलुन )

एक बहुत ही मशहूर गीत है जो इस बहर मे है वो है.

अ+के+ले अ+के+ले क+हाँ जा र+हे हो
(1+2+2 1+2+2 1+2+2 1+2+2)
मु+झे सा+थ ले लो ज+हाँ जा र+हे हो
(1+2+2 1+ 2+2 1+2+ 2 1+2+2)

Wednesday, October 20, 2021

देवमणि पांडेय जी की पांच ग़ज़लें

=== परिचय : देवमणि पांडेय === 


जन्म : 4 जून 1958 सुलतानपुर (उ.प्र.), 
शिक्षा :  हिन्दी और संस्कृत में प्रथम श्रेणी एम.ए.। 
लेखन विधा : गीत, ग़ज़ल, कविताएं, लेख। 

दो ग़ज़लें वर्ष 2017 में जलगांव विश्व विद्यालय के एम ए हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल। 

चार कविता संग्रह प्रकाशित हैं- 1.दिल की बातें (1999), 2. ख़ुशबू की लकीरें (2005), 3.अपना तो मिले कोई (2012), 4. कहां मंज़िलें कहां ठिकाना (2020)। सिने गीतकारों और फ़िल्म लेखकों पर इंडिया नेट बुक्स नई दिल्ली से एक किताब प्रकाशित- 'अभिव्यक्ति के इंद्रधनुष : सिने जगत की सांस्कृतिक संपदा।'  

मुम्बई के सांध्य दैनिक 'संझा जनसत्ता' में कई सालों तक साप्ताहिक स्तम्भ 'साहित्यनामचा' का लेखन। हिंदी-उर्दू की साहित्यिक पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित। देश-विदेश में कई पुरस्कारों और सम्मान से अलंकृत। 


बतौर सिने गीतकार देवमणि पांडेय के कैरियर की शुरूआत निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की फ़िल्म 'हासिल' से हुई। डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म 'पिंजर' में उनके लिखे गीत 'चरखा चलाती मां' को सन् 2003 के लिए बेस्ट लिरिक ऑफ दि इयर अवार्ड से नवाज़ा गया। 

गीतकार देवमणि पांडेय ने 'कहां हो तुम' और 'तारा : दि जर्नी आफ लव आदि फिल्मों को भी अपने गीतों से सजाया है। उन्होंने सोनी चैनल के धारावाहिक 'एक रिश्ता साझेदारी का', स्टार प्लस के सीरियल 'एक चाबी है पड़ोस में' और ऐंड टीवी के धारावाहिक 'येशु' भी अपने क़लम का जादू दिखाया है। संगीत अल्बम गुज़ारिश, तन्हा तन्हा और बेताबी में भी उनके गीत पसंद किए गए।  

सम्पर्क :
देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाड़ा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, M : 98210 82126 

(1) देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

मेरा यक़ीन, हौसला, किरदार देखकर 
मंज़िल क़रीब आ गई रफ़्तार देखकर 

जब फ़ासले हुए हैं तो रोई है मां बहुत
बेटों के दिल के दरमियां दीवार देखकर 

हर इक ख़बर का जिस्म लहू में है तरबतर 
मैं डर गया हूँ आज का अख़बाऱ देखकर 

बरसों के बाद ख़त्म हुआ बेघरी का दर्द  
दिल ख़ुश हुआ है दोस्तो घरबार देखकर 

दरिया तो चाहता था कि सबकी बुझा दे प्यास 
घबरा गया वो इतने तलबगार देखकर 

वो कौन था जो शाम को रस्ते में मिल गया
वो दे गया है रतजगा एक बार देखकर 

चेहरे से आपके भी झलकने लगा है इश्क़ 
जी ख़ुश हुआ है आपको बीमार देखकर 


(2) देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

फूल महके यूं फ़ज़ा में रुत सुहानी मिल गई 
दिल में ठहरे एक दरिया को रवानी मिल गई 

घर से निकला है पहनकर जिस्म ख़ुशबू का लिबास
लग रहा है गोया इसको रातरानी मिल गई 

कुछ परिंदों ने बनाए आशियाने शाख़ पर
गाँव के बूढ़े शजर को फिर जवानी मिल गई 

आ गए बादल ज़मीं पर सुनके मिट्टी की सदा
सूखती फ़सलों को पल में ज़िंदगानी मिल गई 

जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको पढ़ता ही रहूं
याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई 

मां की इक उंगली पकड़कर हंस रहा बचपन मेरा
एक अलबम में वही फोटो पुरानी मिल गई 

  
(3) देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

बदली निगाहें वक़्त की क्या क्या चला गया 
चेहरे के साथ साथ ही रुतबा चला गया 

बचपन को साथ ले गईं घर की ज़रूरतें 
अपनी किताबें छोड़के बच्चा चला गया 

मेरी तलब को जिसने समंदर अता किया 
अफ़सोस मेरे दर से वो प्यासा चला गया 

वो बूढ़ी आंखें आज भी रहती हैं मुंतज़िर
जिनको अकेला छोड़के बेटा चला गया 

रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर ही की तरह   
उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया 

अपनी अना को छोड़के पछताए हम बहुत 
जैसे किसी दरख़्त का साया चला गया 

(4) देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

वक़्त के सांचे में ढल कर हम लचीले हो गए 
रफ़्ता रफ़्ता  ज़िंदगी के पेंच ढीले हो गए  

इस तरक़्क़ी से भला क्या फ़ायदा हमको हुआ
बुझ न पाई प्यास कुछ, बस होंठ गीले हो गए 

जी हुज़ूरी की सभी को किस कदर आदत पड़ी 
जो थे परबत कल तलक वो आज टीले हो गए
 
क्या हुआ क्यूं घर किसी का आ गया फुटपाथ पर     
शायद उनकी लाडली के हाथ पीले हो गए 

 आपके बर्ताव में थी सादगी पहले बहुत
जब ज़रा शोहरत मिली तेवर नुकीले हो गए 

हक़ बयानी की हमें क़ीमत अदा करनी पड़ी 
हमने जब सच कह दिया वो लाल-पीले हो गए 

हो मुख़ालिफ़ वक़्त तो मिट जाता है नामो-निशां
इक महाभारत में गुम कितने क़बीले हो गए 

(5) देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

इस जहां में प्यार महके ज़िंदगी बाक़ी रहे.
ये दुआ मांगो दिलों में रौशनी बाक़ी रहे. 

आदमी पूरा हुआ तो देवता हो जायेगा,
ये ज़रूरी है कि उसमें कुछ कमी बाक़ी रहे. 

दोस्तों से दिल का रिश्ता काश हो कुछ इस तरह,
दुश्मनी के साये में भी दोस्ती बाक़ी रहे. 

ख़्वाब का सब्ज़ा उगेगा दिल के आंगन में ज़रूर,  
शर्त है आँखों में अपनी कुछ नमी बाक़ी रहे. 

इश्क़ जब कीजे किसी से दिल में ये जज़्बा भी हो,
लाख हों रुसवाइयां पर आशिक़ी बाक़ी रहे. 

दिल में मेरे पल रही है ये तमन्ना आज भी,
इक समंदर पी चुकूं और तिश्नगी बाक़ी रहे.
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