Monday, October 11, 2021

ग़ज़ल -बशीर बद्र साहब


ग़ज़ल 


 किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊंगा
ज़माना देखेगा और मैं न देख पाऊंगा

हयातों मौत फ़िराक़ों विसाल सब यकजा
मैं एक रात में कितने दीये जलाऊंगा

पला बढ़ा हूँ अभी तक इन्हीं अंधेरों में
मैं तेज़ धूप से कैसे नज़र मिलाऊंगा

मेरे मिज़ाज की ये मादराना फितरत है
सवेरे सारी अज़ीयत मैं भूल जाऊँगा

तुम एक पेड़ से वाबस्ता हो मगर मैं तो
हवा के साथ बहुत दूर-दूर जाऊँगा

मिरा ये अहद है मैं आज शाम होने तक
जहाँ से रिज़क लिखा है वहीँ से लाऊंगा

उजालों की परियां -बशीर बद्र

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ग़ज़ल 
वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है

उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिये बनाया है

महक रही है ज़मीं चांदनी के फूलों से
ख़ुदा किसी की मुहब्बत पे मुस्कुराया है

उसे किसी की मुहब्बत का ऐतबार नहीं
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है

तमाम उम्र मेरा दम उसके धुएँ से घुटा
वो इक चराग़ था मैंने उसे बुझाया है

उजाले की परियां -बशीर बद्र

 
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ग़ज़ल 

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला

बहुत अजीब है ये क़ुर्बतों की दूरी भी
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला

ख़ुदा की इतनी बड़ी क़ायनात में मैंने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वो ही न मिला

उजालों की परियां -बशीर बद्र

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ग़ज़ल 

 हर जनम में उसी की चाहत थे
हम किसी और की अमानत थे

उसकी आँखों में झिलमिलाती हुई,
हम ग़ज़ल की कोई अलामत थे

तेरी चादर में तन समेट लिया,
हम कहाँ के दराज़क़ामत थे

जैसे जंगल में आग लग जाये,
हम कभी इतने ख़ूबसूरत थे

पास रहकर भी दूर-दूर रहे,
हम नये दौर की मोहब्बत थे

इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया,
ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

दिन में इन जुगनुओं से क्या लेना,
ये दिये रात की ज़रूरत थे

उजालों की परियां ग़ज़ल संग्रह से -बशीर बद्र

 


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ग़ज़ल
अब किसे चाहें किसे ढूँढा करें
वो भी आख़िर मिल गया अब क्या करें

हल्की-हल्की बारिशें होती रहें
हम भी फूलों की तरह भीगा करें

आँख मूँदे उस गुलाबी धूप में
देर तक बैठे उसे सोचा करें

दिल मुहब्बत दीन-दुनिया शायरी
हर दरीचे से तुझे देखा करें

घर नया कपड़े नये बर्तन नये
इन पुराने काग़ज़ों का क्या करें

ग़ज़ल बशीर बद्र -उजालों की परियां

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ग़ज़ल 

 वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है

उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिये बनाया है

महक रही है ज़मीं चांदनी के फूलों से
ख़ुदा किसी की मुहब्बत पे मुस्कुराया है

उसे किसी की मुहब्बत का ऐतबार नहीं
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है

तमाम उम्र मेरा दम उसके धुएँ से घुटा
वो इक चराग़ था मैंने उसे बुझाया है

Sunday, October 10, 2021

शाहिद कबीर की एक ग़ज़ल

           नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है

देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है

बाँध रक्खा है किसी सोच ने घर से हम को

वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है

रेत की ईंट की पत्थर की हो या मिट्टी की

किसी दीवार के साए का भरोसा क्या है

घेर कर मुझ को भी लटका दिया मस्लूब के साथ

मैं ने लोगों से ये पूछा था कि क़िस्सा क्या है

संग-रेज़ो के सिवा कुछ तिरे दामन में नहीं

क्या समझ कर तू लपकता है उठाता क्या है

अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया 'शाहिद'

वर्ना हाथों में लकीरों के अलावा क्या है