How to build a Social Networking Website with Drupal
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With this article I want to explain how you can plan and build a Social
Networking Website using *Drupal*. The intent of the post is to provide
useful tips...
सोच रहे हैं तुम कह दो
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सोच रहे हैं तुम कह दो तो कोई गीत लिखें
और तुम्हें हम नहीं अपैरिचित, अपना मीत लिखें
लिखती नाम फूल की पांखुर पर रोजाना शबनम
जमना तट की रेती पर लिखता रहता है म...
चिट्ठाचर्चा और मैं..
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कल रात वापस लौट आये दो दिवसीय मॉन्ट्रियल यात्रा से. कोई विशेष उल्लेखनीय कुछ
भी नहीं. चाहें तो कहानी बनायें मगर अभी उद्देश्य कुछ और ही है.
शुक्रवार को मॉ...
धूमिल की याद - उनकी अन्तिम कविता
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*शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।
लोहे...
रंगोली सजाओ...रे
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"स्टेलनेस मेरा ही यू.एस.पी. हो, ऐसा नहीं है। आप कई ब्लॉगों पर चक्कर मार
आईये। बहुत जगह आपको स्टेलनेस (स्टेनलेस से कन्फ्यूज न करें) स्टील मिलेगा| लोग
गिने च...
"अवधूत : कबीर" : कुमार गन्धर्व
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नहीं ..... कुछ कहना नहीं है.
अल सुबह से ये सुन रहा था ..... बार बार सुना ....... कई बार सुना !!
जी में आया कि इसे पोस्ट ही कर दूँ ..........
सु...
महावीर शर्मा की दो ग़ज़लें
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ग़ज़ल
अदा देखो, नक़ाबे-हुस्न वो कैसे उठाते हैं,
अभी तो पी नहीं हम ने, क़दम क्यों डगमगाते हैं?
ये अब अंदाज़ तो देखो त'आल्लुक तोड़ कर भी वो
हमारे दिल का ख़ूँ ...
पैसा सब कुछ पैसा क्या.........................
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एक और स्मृति-चित्र
जयपुर के महामूर्ख सम्मेलन का चित्र
मेरे दायीं और क्रमशः सुरेश नीरव (दिल्ली), सर्वेश अस्थाना (लखनऊ)
और एक ग़ज़ल भी
पैसा सब कुछ ...
डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
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अमृता की कवितायेँ खुद में एक कहानी है ,एक एक लफ्ज़ अपनी बात इस तरह से कहता
है जैसे ज़िन्दगी का एक सच मुकम्मल रूप से सच है ..और हर बार उनका लिखा कोई न
कोई न...
तब तो महो महो........
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बल्ले से गेंद को पीटना
एक बडा काम है
और उसे पीटते रहना
बहुत बडा काम
और उसे लगातार पीटते रहना
महान काम है
बीच बीच में अगर देश
पिट भी जाए
फिर भी लगातार पीटते...
Sketch by Rafael
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رافائیل کے خاکے کی نیلامی ’ہیڈ آف اے میوز‘ نامی یہ خاکہ 1508 اور 1511 کے
درمیان کے عرصے میں بنایا گیا تھا۔ پاپائے روم جولیئس دوم نے ویٹیکن کے لیے چار
’فریس...
मोहे अगला जनम ना दीजो ।
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क्या करे इन हाथों का ? काट डाले इन्हें ? फेंक आए कहीं जाकर ? या हरदम ढंक कर
रखे कहीं ? छुपा दे ! या किसी खुरदुरी चीज़ पर तब तक रगड़ता रहे जब तक दूसरे
लड़कों...
"किस्मत का उपहास"
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*"किस्मत का उपहास"*
*हर बीता पल इतिहास रहा,*
*जीना तुझ बिन बनवास रहा*
*ये चाँद सितारे चमके जब जब *
*इनमे तेरा ही आभास रहा
चंचल हुई जब जब अभिलाषा,*
*तब प्...
हँस के जीवन काटने का मशवरा देते रहे
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हँस के जीवन काटने का, मशवरा देते रहे
आँख में आँसू लिए हम, हौसला देते रहे.
धूप खिलते ही परिंदे, जाएँगे उड़, था पता
बारिशों में पेड़ फिर भी, आसरा देते रहे
जो...
मुबारक हो जन्म दिवस !
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ख़ुदा करे तुम जीओ क़यामत तक, और क़यामत कभी न हो !
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द्विज भाई को जन्म दिवस की हार्दिक मंगलाएँ!
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ज़ाहिर तौर पर मीटर से बाहर लिखता हूँ लेकिन फिर भी "द्विज"...
साहित्य समाचार
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कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार
तीसरा सप्तक के यशस्वी कवि *कुंवर नारायण *को मंगलवार को भारतीय भाषाओं के
साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए 41वें *ज्ञ...
..हर मकां भी तो घर नहीं होता
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यह जो बस्ती में डर नहीं होता
सबका सजदे में सर नहीं होता
तेरे दिल में अगर नहीं होता
मैं भी तेरी डगर नहीं होता
रेत के घर पहाड़ की दस्तक
वाक़िया ये ख़बर नही ह...
राग यमन- परिचय और दो बंदिश
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राग यमन-
प्रथम पहर निशि गाइये ग नि को कर संवाद ।
जाति संपूर्ण तीवर मध्यम यमन आश्रय राग ॥
*राग का परिचय* -
1) इस राग को राग कल्याण के नाम से भी जाना जाता है...
ग़ज़ल - यूं ही वक्त न जाया कर
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यूं ही वक्त न जाया कर
ख़ुद से भी बतियाया कर
उसपे इश्क का भूत चढा
उसको मत समझाया कर
इज्ज़त , दौलत या रिश्ते
कुछ तो यार कमाया कर
डर से ही मर जाएगा
इतना मत घ...
Azhar Inayati's ghazal: Kaun kitna badaa madaari hai
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Azhar Inayati is a prominent Urdu poet of Ghazal. He has carved a niche for
himself as a leading poetic voice from Uttar Pradesh.
अब ये मेयार-ए-शहरयारी है
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पुस्तकें एक साथ लोकार्पित
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सुप्रसिद्ध गजलकार और हाइकुकार कमलेश भट्ट कमल ने अपने जीवन के 50 वर्ष 13
फरवरी 2009 को पूरे किए। कमलेश जी की पचासवीं वर्षगाँठ पर उनकी दो महत्वपूर्ण
पुस्तकें...
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*'जन-गण-मन' पर प्रख्यात शायर डा० शबाब ललित :
*दायित्व बोध को झंकृत करती ग़ज़लें— डा० शबाब ललित
'जन-गण-मन' युवा कवि द्विजेन्द्र 'द्विज' की छ्प्पन ग़ज़लों का अनुप...
SAHIR LUDHIANVI - A BIOGRAPHY
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SAHIR LUDHIANVI - A BIOGRAPHY
Sahir, like his name, was a "magician" of words. He wove fascinating images
in songs and ghazals, spellbinding his listeners ...
श्रद्धांजलि - जनाब श्री अहमद फ़राज़ साहब (1931-2008)
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कल (25 अगस्त, 2008) उर्दू अदब के एक स्वर्णिम अध्याय का दुःखद अंत हो गया!
जनाब श्री अहमद फ़राज़ साहब हमारे बीच नही रहे! उन्होने इस्लामाबाद के एक अस्पताल
में ...
SHIV KUMAR BATALVI - A BIOGRAPHY
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SHIV KUMAR BATALVI - A BIOGRAPHY
Shiv Kumar was born in Bara Pind Lohtian (Shakargarh tehsil), in Punjab (now
Pakistan). Shiv’s date of birth as recorded o...
ख़ुद अपनी राह चलते हैं, ख़ुद अपनी मान लेते हैं हम अहले-दिल किसी का कब भला अहसान लेते हैं
सुलगती शाम,तन्हाई,ग़मे-दिल,ज़हर का प्याला , हम अपने वास्ते यूं जश्न का सामान लेते हैं
मुख़ालिफ़ वक़्त भी उन पर बहुत आसां गुज़रता है ख़ुदा के हुक्म को जो ख़ुशदिली से मान लेते हैं
उन्हें इक-दुसरे का हर घड़ी अहसास रहता है जो सच्चे दोस्त हैं वो बिन कहे सब जान लेते हैं
कभी तो रूठ कर मर्ज़ी चला लेते हैं हम अपनी कभी घबरा के हम ज़िद ज़िंदगी की मान लेते हैं
असर रहता है क़ायम मुस्तक़िल तहरीर में उनकी सुख़नसाज़ी में फ़िक्र-ओ-फ़न का जो मीज़ान लेते हैं
बदल ले लाख अब 'मुफ़लिस' तू रंगत अपने चेहरे की तेरे तर्ज़े-बयाँ से सब तुझे पहचान लेते हैं
अहले-दिल=दिल वासी ,मुख़ालिफ़=विरोधी,मुस्तक़िल=हमेशा, स्थायी, तहरीर=लिखावट ,सुख़नसाज़ी=लेखन प्रक्रिया फिक्रो फ़न=चिंतन और कला,मीज़ान=तराज़ू ,तर्ज़-ए-बयाँ=कथन शैली
छोटी सी सूचना - दोस्तो ! एक छोटी सी सूचना है , मेरी आवाज़ में मेरी कुछ ग़ज़लें और शे’र रिकार्ड हुए हैं और इसे आप urdu-anjuman पर सुन सकते हैं। समय मिले तो ६ मिंन्ट ज़रूर सुनियेगा ये रहा लिंक- http://www.bazm.urduanjuman.com/index.php?topic=4279.0
उर्दू अदब को जाने बिना ग़ज़ल कहना बैसा ही है जैसे कबीर को पढ़े बिना दोहा लिखना।गा़लिब से परिचित हुए बगैर कोई ग़ज़ल नहीं कह सकता है। खै़र,आज हम ग़ज़लें पेश कर रहे हैं,1934 में हरियाणा में जन्में बलवीर राठी की, जिनके अब तक ३ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।बज़ुर्ग शायर हैं और बहुत अच्छी ग़ज़लें कहते हैं और हरियाणा साहित्य अकादमी से सम्मान हासिल कर चुके हैं।
एक
गो पुरानी हो चुकी अब होश में आने की बात लोग फिर भी कर रहे हैं मुझको समझाने की बात
रफ़्ता-रफ़्ता ढल गई है सैंकड़ों नग़मात में ए दिले-मासूम तेरे एक अफ़साने कि बात
अपना-अपना ग़म लिए फिरते हैं इस दुनिया में लोग कौन समझेगा यहाँ अब तेरे दीवाने की बात
ज़िंदगी उलझी हुई है और ही जंजाल में अब कहां वो साग़रो-मीना की, मयखाने की बात
अजनबी माहौल में अपने तो लब खुलते नहीं तुम ही छेड़ो आज इस रंगीन अफ़साने की बात
(रमल की मुज़ाहिफ़ शक़्ल)
दो
तेज़ लपटों में ढल गया हूँ मैं कोई सूरज निगल गया हूँ मैं
कितने राहत-फ़िज़ा थे अंगारे बर्फ लगते ही जल गया हूँ मैं
तुमने बांधा था जिन हदों मे मुझे उन हदों से निकल गया हूँ मैं
हासिदो ! मेरा ज़ुर्म इतना है तुमसे आगे निकल गया हूँ मैं
मत बुलंदी की बात कर "राठी" अब वहां से फिसल गया हूँ मैं
(बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक्ल) फ़ा’इ’ला’तुन मु’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन 2122 1212 22
तीन
हमें साथ मिल तो गया था किसी का मगर मुख़्तसर था सफ़र ज़िंदगी का
कहाँ आ गए हम भटकते-भटकते यहाँ तो निशां तक नहीं रौशनी का
वफ़ा एक मुद्दत हुई मिट चुकी है कहाँ नाम लेते हो अब दोस्ती का
अगर साथ होते वो इन रास्तों पर तो क्या हाल होता मेरी आगही का
मेरे हाल पर मुस्करा कर गए हैं चलो हक़ अदा हो गया दोस्ती का
बहरे-मुतका़रिब मसम्मन सालिम (चार फ़ऊलुन )122x4
शायर का पता- 3836 अरबन इस्टेट जींद- हरियाणा फोन-01681-247351
1957 में जन्में गिरीश पंकज की अब तक 28 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और एक ग़ज़ल संग्रह भी जल्द ही प्रकाशित हो रहा है।आप दिल्ली साहित्य अकादमी के सदस्य हैं और सद्भावना दर्पण नामक पत्रिका के संपादक भी हैं। "आज की ग़ज़ल" पर पेश हैं इनकी तीन ग़ज़लें-
एक
मै अँधेरे में उजाला देखता हूँ भूख में रोटी-निवाला देखता हूँ
आदमी के दर्द की जो दे खबर भी है कहीं क्या वो रिसाला देखता हूँ
हो गए आजाद तो फिर किसलिए मैं आदमी के लब पे ताला देखता हूँ
हूँ बहुत प्यासा मगर मैं क्या करूं अब तृप्त हाथों में ही प्याला देखता हूँ
कोई तो मिल जाए बन्दा नेकदिल सा ढूंढता मस्जिद, शिवाला देखता हूँ
दो
तुम मिले तो दर्द भी जाता रहा देर तक फ़िर दिल मेरा गाता रहा
देख कर तुमको लगा हरदम मुझे जन्मों-जन्मो का कोई नाता रहा
दूर मुझसे हो गया तो क्या हुआ दिल में उसको हर घड़ी पाता रहा
अब उसे जा कर मिली मंजिल कहीं जो सदा ही ठोकरे खाता रहा
मुफलिसी के दिन फिरेंगे एक दिन मै था पागल ख़ुद को समझाता रहा
ज़िन्दगी है ये किराये का मकां इक गया तो दूसरा आता रहा
तीन
आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं
हारने का अर्थ यह भी जानिए जीत की संभावनाएं साथ हैं
इस अँधेरे को फतह कर लेंगे हम रौशनी की कुछ कथाएँ साथ हैं
मर ही जाता मैं शहर में बच गया गाँव की शीतल हवाएं साथ हैं
ये सफ़र अंतिम हैं खाली हाथ लोग पर हजारों वासनाएँ साथ हैं
(बहरे-रमल की मुज़ाहिफ़ शक्लों मे कही गई ग़ज़लें)
शायर का पता- संपादक, " सद्भावना दर्पण" जी-३१, नया पंचशील नगर, रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१ मोबाइल : ०९४२५२ १२७२०
1975 में जन्में जतिन्दर "परवाज़" की तीन ग़ज़लें हम पेश कर रहे हैं। "ग़ज़ल दुश्यंत के बाद" भाग-२ में इनकी ग़ज़लें शामिल हैं । युवा शायर हैं और बहुत अच्छे शे’र कहते हैं। आल इंडिया मुशायरों में शिरकत कर चुके हैं। इनसे अदब को बहुत उम्मीदें हैं। इनका ग़ज़ल संग्रह भी जल्द ही आ रहा है।
एक
शजर पर एक ही पत्ता बचा है हवा की आँख में चुभने लगा है
नदी दम तोड़ बैठी तिशनगी से समंदर बारिशों में भीगता है
कभी जुगनू कभी तितली के पीछे मेरा बचपन अभी तक भागता है
सभी के खून में गैरत नही पर लहू सब की रगों में दोड़ता है
जवानी क्या मेरे बेटे पे आई मेरी आँखों में आँखे डालता है
चलो हम भी किनारे बैठ जायें ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है
बहरे-हज़ज की मुज़ाहिफ़ शक्ल मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन 1222 1222 122.
दो
ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ मुश्किलें हैं सफ़र में क्या क्या कुछ
फूल से जिस्म चाँद से चेहरे तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ
तेरी यादें भी अहले-दुनिया भी हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ
ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता था हमारे भी घर में क्या क्या कुछ
शाम तक तो नगर सलामत था हो गया रात भर में क्या क्या कुछ
हम से पूछो न जिंदगी 'परवाज़' थी हमारी नज़र में क्या क्या कुछ
बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक़्ल फ़ा’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन 2122 1212 22
तीन
यार पुराने छूट गए तो छूट गए कांच के बर्तन टूट गए तो टूट गए
सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं तीर कमाँ से छूट गए तो छूट गए
शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे मेरे सपने टूट गए तो टूट गए
इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये भाग किसी के फूट गए तू फूट गए
छोड़ो रोना धोना रिश्ते नातों पर कच्चे धागे टूट गए तो टूट गए
अब के बिछड़े तो मर जाएंगे 'परवाज़' हाथ अगर अब छूट गए तो छूट गए
जैसे दिवाली चराग़ों के बिना अधूरी लगती है वैसे ही शायरी भी चरागों के बिना अधूरी है। ऐसा शायद ही कोई शायर हो जिसने चराग़ पर दो-चार शे’र न कहें हों। दिवाली का मौक़ा है , तो सोचा क्यों न चरागों को एक जगह तरतीब से जलाया जाए। शायर जो चराग़ जलाता है वो चराग़ कहीं तो अँधेरा चूसते हैं, कहीं आँधियों से टक्कर लेते हैं, कहीं दमागों को रौशन करते हैं और कहीं तनहाइयों के साथी हैं। आजकल शायर शम्मा कम जलाते हैं लेकिन चराग़ हर जगह रौशन करते हैं। दीपावली की शुभ कामनाओं के साथ मुलाहिज़ा फ़रमांए चरागों पर कहे ये खूबसूरत अशआर-
दिल है गोया चराग किसी मुफलिस का शाम ही से बुझा सा रहता है..मीर
बू-ए-गुल, नालह-ए-दिल, दूद-ए-चिराग़-ए-मह्फ़िल जो तिरी बज़्म से निकला सो परेशां निकला..गा़लिब
यह नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग़ तेरे ख़्याल की खुश्बू से बस रहे हैं दिमाग़..फ़िराक़
ये चिराग़ बेनज़र है ये सितारा बेज़ुबाँ है अभी तुझसे मिलता जुलता कोई दूसरा कहाँ है..बशीर बद्र
कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए कहाँ चराग मय्यसर नहीं शहर के लिए.. दुश्यंत
दिल में दिए जला के अंधेरे में जीना सीख बुझते हुए चिराग़ का मातम फ़ुज़ूल है..कौसर सद्दीकी
मेरे साथ जुगनू है हमसफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या ये चिराग़ कोई चिराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ..बशीर बद्र
हम चिराग़-ए-शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचना. रात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन.. अहमद फ़राज़
आज की शब ज़रा ख़ामोश रहें सारे चराग़ आज महफिल में कोई शम्अ फ़रोजां होगी..नुसरत मेंहदी
दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत यह इक चिराग़ कई आँधियों पे भारी है..वसीम बरेलवी
ये किस मुक़ाम पे ले आई जुस्तजू तेरी कोई चिराग़ नहीं और रोशनी है बहुत..किर्श्न बिहारी नूर
जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा किसी चराग का अपना मकां नहीं होता.. वसीम बरेलवी
कोई फूल बन गया है, कोई चाँद, कोई तारा जो चिराग़ बुझ गए हैं तेरी अंजुमन में जल के
मेरे मन की अयोध्या में न जाने कब हो दीवाली अभी तो झलकता है राम का बनवास आँखों में..साग़र पालमपुरी
यही चिराग़ जो रोशन है बुझ भी सकता था भला हुआ कि हवाओं का सामना न हुआ..महताब हैदर नक़बी
कुछ आज शाम ही से है दिल भी बुझा-बुझा कुछ शहर के चिराग़ भी मद्धम हैं दोस्तो ..अहमद फ़राज़
हमने हर गाम पे सजदों के जलाये हैं चिराग़ अब तिरी राहगुज़र, राहगुज़र लगती है..जां निसार अख़तर
आईये चराग-ए-दिल आज हीं जलाएँ हम, कैसी कल हवा चले कोई जानता नहीं
चराग अपने थकान की कोई सफ़ाई न दे वो तीरगी है के अब ख्वाब तक दिखाई ना दे
अजब चराग हूँ दिन रात जलता रहता हूँ मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे
मंज़िल न दे चराग न दे हौसला तो दे, तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे,.
तूने जलाईं बस्तियाँ ले-ले के मशअलें अपना चराग़ अपने ही हाथों बुझा के देख.. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'
रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिए जिया..चिराग जैन
हमने उन तुन्द हवाओं में जलाये हैं चिराग़ जिन हवाओं ने उलट दी हैं बिसातें अक्सर..जां निसार अख़तर
अंधेरे जश्न मनाने की भूल करते हैं चिराग़ अब भी हवाओं पे वार करता है..इसहाक़ असर इन्दौरी
जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को, सौ चिराग़ अँधेरे में झिलमिलाने लगते हैं .. कैफ़ी आज़मी
तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चिराग़ लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चिराग़
कहाँ से ढूँढ के लाऊं चराग़ से वो बदन तरस गई हैं निगाहें कंवल-कंवल के लिए
चिराग़ हो कि ना हो, दिल जला के रखते हैं हम आंधियों में भी तेवर बला के रखते हैं मिला..हसती
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल चिराग़-ए-सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ ...इकबाल
इस एक ज़ौम में जलते हैं ताबदार चराग़ हवा के होश उड़ाएँगे बार - बार चराग़...बुनियाद हुसैन ज़हीन
उदास उदास शाम में धुआं धुआं चराग हैं हमें तेरे ख्याल में मिली फकत चुभन चुभन ..मरयम गजाला
अब चराग ढूँढता हूँ के थोड़ी रौशनी मिले अँधेरे में खो गया इक जरूरी सवाल मियाँ
हवाओं को थाम लो ये फुर्क़त की शाम है आहिस्ता साँस लो कि अब बुझता चराग है
चराग अपने थकान की कोई सफ़ाई न दे वो तीरगी है के अब ख्वाब तक दिखाई ना दे
चराग़-ओ-आफ़्ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी शबाब की नक़ाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी
हरेक मठ में जला फिर दिया दिवाली का, हरेक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का अजब बहार का है दिन बना दिवाली का..नज़ीर
तेरी हर चाप से जलते हैं ख़यालों मे चराग जब भी तू आए जगाता हुआ जादू आए
उन्हें चिराग़ कहाने का हक़ दिया किसने अँधेरों में जो कभी रौशनी नहीं देते ..द्विजेंद्र द्विज
आज बिखरी है हवाओं में चरागों की महक आज रौशन है हवा चाँद-सितारों की तरह..सतपाल ख़याल
अब एक शे’र बहुत ही अज़ीम शायर का ,मोहतरम खुमार बाराबंकवी जिनका अंदाज़ ही निराला था।
आँखों के चराग़ों मे उजाले न रहेंगे आ जाओ कि फिर देखने वाले न रहेंगे
और इस सुहावनी शाम को खुमार साहब की ग़ज़ल सुनिए जिसे गाया है मेरे मनपसंद गायक हंस राज हंस ने जिसकी आवाज़ दरगाहों में जलते चरागों सी रौशन है -
आज की ग़ज़ल से जुड़े तमाम शायरों और पाठकों को दीवाली की ढेर सारी शुभकामनाएं!!
ये कोई निजी ब्लाग नही है ये एक पत्रिका है जो पूर्ण रूप से "गज़ल" को समर्पित है. संरक्षक: श्री द्विजेन्द्र `द्विज' मुख्य संपादक: सतपाल "ख्याल" सहयोगी: डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी, श्रद्दा जैन, गौतम राजरिशी रचनाएँ भेजने का पता: satpalg.bhatia@gmail.com dwij.ghazal@gmail.com
अगर आप हमारे सहयोगी बनना चाहते हैं तो हमें मेल करें.
मेरे उस्ताद जनाब द्विजेन्द्र "द्विज"
द्विज जी का ग़ज़ल संग्रह पढ़ने के लिए फ़ोटो पर क्लिक करें
मेरी कलम से
मेरी कुछ ग़ज़लें कविता-कोश पर पढ़ने के लिये कलिक करें...
शामको जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं राजेश रेड्डी
किसीको घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई, मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई मुनव्वर राना
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए. बशीर बद्र है ज़िन्दगी कमीज़ का टूटा हुआ बटन बिँधती हैं उँगलियाँ भी जिसे टाँकते हुए. द्विजेन्द्र "द्विज"
एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवाँ है आज पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशाँ है आज अली सरदार जाफ़री
कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है
शकील बदायूनी
उसने इतना तो सलीका रक्खा
बंद कमरे में दरीचा रक्खा
ज्ञान प्रकाश विवेक
आ के अब तस्लीम कर लें तू नहीं तो मैं सही
कौन मानेगा के हम में बेवफ़ा कोई नहीं
अहमद फ़राज़
हमारे ऐब हमें उन्गलियों पे गिनवाओ,
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो
राहत ईदौरी
हमारी ज़िन्दगी का इस तरह हरसाल कटता है कभी गाड़ी पलटती है, कभी तिरपाल कटता है दिखाते हैं पड़ौसी मुल्क़ आँखें, तो दिखाने दो कभी बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है