Tuesday, January 19, 2010

राहत इन्दौरी साहब और अंजुम रहबर
























राहत साहब किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। राहत साहब ने एक जनवरी को जीवन के साठ वर्ष पूरे किए हैं। इसी महीने रामकथा वाचक मुरारी बापू ने राहत इंदौरी साहब के गजल संग्रह ‘नाराज’ के हिन्दी संस्करण का विमोचन करते हुए कहा-

राम वही है, जो राहत दे
जो आहत करता है, वह रावण होता है

यही वो मिली-जुली तहजीब है जिसका परिचय राहत साहब और मुरारी बापु ने दिया है।

देव मणि पांडेय जी की बदौलत ये दो ग़ज़लें हमें मिली हैं जो राहत साहब ने ही उन्हें भेजी हैं और इनको राहत साहब की अनुमति से यहाँ छापा जा रहा है। पहली ग़ज़ल बिल्कुल ताज़ा है और आज की ग़ज़ल पर पहली दफ़ा छाया हो रही है। इसके इस शे’र को लेकर कल द्विज जी से भी बात हुई और राहत साहब से भी पहले शे’र देखें-

कौन छाने लुगात का दरिया
आप का एक इक्तेबास बहुत

कौन देखे शब्दकोश, कौन जाए गहराई में जो आपने कह दिया,जो ख़ुदा ने कह दिया, जो भगवान ने कह दिया, जो उन्होंने quote कर दिया वो हर्फ़े-आख़िर है। हम चाहें भी तो उनके कहे के माअनी नहीं समझ सकते। राहत साहब ने जैसे कहा कि धार्मिक-ग्रंथों में बहुत से हर्फ़ अब तक लोग समझ नहीं पाए हैं लेकिन वो ख़ुदा के, भगवान के शब्द हैं उन्हें सुनना,पढ़ना ही काफ़ी है । एक शे’र कई आयाम समेटे होता है और पाठक उसके अर्थ जुदा-जुदा ले सकता है। यक़ीनन ये शे’र राहत साहब जैसे शायर ही कह सकते हैं और हम भी अब ये कह सकते हैं कि अगर राहत साहब ने कहा है तो हर्फ़े-आखिर है उसके लिए हमें बहस या शब्द-कोश देखने कि ज़रूरत नहीं। इक्तेबास यानि किसी वाक्या को ज्यूँ का त्यूँ बिना किसी बहस के स्वीकार कर लेना है। हिंदी में इसे उद्वरण कह सकते हैं।

आज की ग़ज़ल को राहत साहब भी देखेंगे । आज की ग़ज़ल का जो मक़सद था वो पूरा हो रहा है और ये ब्लाग इन महान शायरों तक पहुँच रहा है जो निसंदेह खुशी की बात है। ग़ज़लें मुलाहिज़ा कीजिए-

ग़ज़ल

एक दिन देखकर उदास बहुत
आ गए थे वो मेरे पास बहुत

ख़ुद से मैं कुछ दिनों से मिल न सका
लोग रहते हैं आस-पास बहुत

अब गिरेबां बा-दस्त हो जाओ
कर चुके उनसे इल्तेमास बहुत

किसने लिक्खा था शहर का नोहा
लोग पढ़कर हुए उदास बहुत

अब कहाँ हमसे पीने वाले रहे
एक टेबल पे इक गिलास बहुत

तेरे इक ग़म ने रेज़ा-रेज़ा किया
वर्ना हम भी थे ग़म-शनास बहुत

कौन छाने लुगात का दरिया
आप का एक इक्तेबास बहुत

ज़ख़्म की ओढ़नी लहू की कमीज़
तन सलामत रहे लिबास बहुत

इक्तेबास-quote,लुगात-शब्दकोश,इल्तेमास-गुज़ारिश

बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
फ़ा’इ’ला’तुन मु’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन
2122 1212 22/112

दो

हरेक चहरे को ज़ख़्मों का आइना न कहो
ये ज़िंदगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो

न जाने कौन सी मजबूरियों का क़ैदी हो
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो

तमाम शहर ने नेज़ों पे क्यों उछाला मुझे
ये इत्तेफ़ाक़ था तुम इसको हादिसा न कहो

ये और बात के दुशमन हुआ है आज मगर
वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो

हमारे ऐब हमें ऊँगलियों पे गिनवाओ
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो

मैं वाक़यात की ज़ंजीर का नहीं कायल
मुझे भी अपने गुनाहो का सिलसिला न कहो

ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं राहत
हर इक तराशे हुए बुत को देवता न कहो

बहरे-मुजतस की मुज़ाहिफ़ शक्ल-
म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112


और जगजीत सिंह की आवाज़ में राहत साहब की एक ग़ज़ल सुनिए-









और अब बात करते हैं श्री मति अंजुम रहबर कि जो राहत इन्दौरी साहब की पत्नी हैं और बहुत अच्छी शाइरा भी हैं। उनकी इस ग़ज़ल से तो सारी दुनिया वाकिफ़ है। आप भी पढ़िए-

अंजुम रहबर

सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
इल्ज़ाम आईनों पे लगाना फ़िज़ूल है.

तेरी नवाज़िशें हों तो कांटा भी फूल है
ग़म भी मुझे क़बूल, खुशी भी क़बूल है

उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
कच्चे घड़े पे तैर के जाना फ़िज़ूल है

जब भी मिला है ज़ख्म का तोहफ़ा दिया मुझे
दुश्मन ज़रूर है वो मगर बा-उसूल है

और अंजुम जी की आवाज़ में सुनिए-



राहत साहब की वेब-साइट का लिंक -
http://www.rahatindori.co.in/

14 comments:

navneet sharma said...

राहत साहब की ग़ज़लें आज की ग़ज़ल पर देख कर आनंद आ गया। उहें बचपन से सुनता पढ़ता आ रहा हूं। अब इसे नालायकी कहें मेरी कि यह 'आज की ग़ज़ल' से ही पता चला कि श्रीमती अंजुम रहबर राहत साहब की शरीक-ए-हयात भी हैं। उनकी यह ग़ज़ल सच बात मान लीजिए चेहरों पे धूल है, इल्‍ज़ाम आईनों पे लगाना फज़ूल है....कालेज के दिनों में कई भाषण प्रतियोगिताओं में बोला करता था। जाहिर है, निर्णायक मंडल फ़्लैट हो जाता था। पहली बार मंझले भाई साहब कमल नयन शर्मा जी एक ऑडियो कैसेट मुशायरे की लाए थे जिसमें श्रीमती अंजुम की आवाज़ में ही ये अश्‍आर सुने थे और द्विज भाई साहब ने भी पसंद किए थे। तब मैं नौंवीं में पढ़ता था। यूं कहें कि ये भी उन अश्‍आर में हैं जिन्‍हें जनाब मनोहर साग़र पालमपुरी की सोहबत में रहते सुनते मैं बड़ा हुआ हूं।

सोहनी महिवाल की त्रासद गाथा को कौन सा शे'र इतनी उदासी के साथ बया कर सकता है कि पाठक या श्रोता ताली बजाने या वाह-वाह कहने के बजाय सदमा खाकर बरसों इस शे'र की गिरफ्त में रहे...उस पार अब तो तेरा मुंतजि़र नहीं, कच्‍चे घड़े पे तैर के जाना फ़जूल है।

आज की ग़ज़ल को बधाई कि ऐसी हस्तियां इधर तशरीफ़ लाईं।

नवनीत शर्मा

sahespuriya said...

राहत साहब के बारे मैं क्या कहें? उस्ताद लोगो के बारे कॉमेंट करना बेअदबी होगी.
बस उनकी लंबी उम्र की दुआ करते हैं

devmanipandey said...

हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो

Udan Tashtari said...

राहत साहब, अंजुम जी-क्या कहने!! दोनों को ही कभी भी सुनना और पढ़ना-हमेशा ही सुखकर रहा है और आज ताजा गज़लें देख आनन्द आ गया. आपका बहुत आभार.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

सतपाल 'ख्याल' साहब
वाह वाह वाह
राहत साहब के अश'आर पर दाद देने लायक अल्फाज़ कहां
ये 'वाह वाह' तो आपके लिये है, कि आपने उनका कलाम यहां पढ़वाया है..
राहत भाई, आदाब,
भूल तो नहीं गये न...

मोहतरमा अंजुम साहिबा,
मुशायरा हो, या कवि सम्मेलन
आप हर महफिल की ज़ीनत हैं..
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

गौतम राजरिशी said...

आह..."आज की ग़ज़ल" का आज का पन्ना तो बेशकीमती हो गया।

एक मुशायरे की रिकार्डिंग देख रहा था टीवी पर, जिसमें राहत साब को आना था लेकिन किसी कारणवश वो नहीं पहुंच पाये थे...मंच पर श्रीमति अंजुम भी थीं तो उन्होंने जिस अदा से राहत साब की अनुपस्थिति की बाबत जिक्र छेड़ा कि पूछिये मत और फिर उन्होंने अपनी आवाज में "सच मान लीजिये.." वाली ग़ज़ल पढ़नी शुरु की तो उफ़्फ़्फ़!

सतपाल जी ये "नाराज" किस प्रकाशन से निकली है? कब से हम प्रतिक्षा में है राहत साब के ग़ज़ल-संग्रह के हिंदी संस्करण की....

"अर्श" said...

satpaal ji deri ke liye muaafi, magar bechain main bhi apne sabse ajiz shayeer se milne aur unki gazalon se rubaru hone ke liye,.. inki gazlen hameshaa se mujhe priya rahi hai ... jahan kahin bhi padhta hun hosh thikane lag jaate hain mere aur shrimati anjum ji ki gazal bhi achhi lagi galti meri hai ke maine kabhi unhe sunaa nahi ... magar rahat sahib ki aawaz me to purjor kashish hai uske baare me kya kahi jaaye ... natmastak hun unki gazalon ke aage... is baar anjum sahibaa ko sun dili taskin mili hain aur ye sab aapki koshish ke badaulat hi hui hai...
rahat sahib ki kisi gazal ka ye she'r.. hameshaa mujhe jhkjhorta hai ..
ham apne hone ka is tarah pataa dete hain
khak muththi me uthaate hain udaa dete hain...

agar she'r me koi galti hui hai to muaafi chahunga magar mere khayaal se sahi hai...

aabhaar aapka satpaal ji

arsh

सुलभ 'सतरंगी' said...

राहत इन्दौरी साहब और मोहतरमा अंजुम साहिबा, को आज आपने प्रस्तुत किया.

बहुत शुक्रिया सतपाल जी आपका.

तिलक राज कपूर said...

आज आपने दो काम एक साथ कर डाले। राहत साहब मोहतरमा अंजुम रहबर से ग़ज़ल का कौनसा शौकीन परिचित न होगा, लेकिन उनका रिश्‍ता, मुझे तो आज तक पता नहीं था। दोनों ने बेहतरीन ग़ज़लें का खजाना ज़माने को दिया है। दोनों का पढ़ने का अंदाज़ निराला है, जब पढ़ते हैं तो लगता है कि आस-पास मीलों तक और कुढ नहीं है बस एक आवाज़ है जो ज़ेह्न की गहराईयों में कहीं बसती जा रही है।
बधाई इस लाजवाब प्रस्‍तुति पर।

psingh said...

रहत साहब की गज़लें पढ़ कर
बेहद मज़ा आया बहुत खुबसूरत ग़ज़ल
बहुत बहुत आभार

महावीर said...

जनाब राहत साहब की ताज़ा ग़ज़लें पढ़कर बड़ा सुखा लगा. मोहतरमा अंजुम साहिबा की मधुर आवाज़ ने मुग्ध कर दिया. सतपाल जी, ऎसी खूबसूरत पोस्ट के लिए बधाई.

kavi kulwant said...

राहत इंदौरी जी तो हमारे पसंदीदा शायर हैं..अंजुम जी भी बहुत उम्दा शायरा हैं यहां उनको लाने के लिये आप का बहुत शुक्रिया...

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

हर शेर उम्दा...लाजवाब.....वाह...एक से बढ़कर एक....
राहत इन्दौरी साहब और श्रीमती अंजुम रहबर की रचनायें तो मैं बहुत साल से दूरदर्शन पर सुनता आ रहा हूँ। आज उन्हें यहाँ पढ़ना सुखद लगा....राहत साहब से अनुरोध है कि मेरे ब्लाग पर `बनारस के ग़ज़लकार' और 'समकालीन ग़ज़ल पत्रिका' par जरूर एक नज़र डालें .....

sumita said...

राहत साहब और अंजुम जी को दूरदर्शन पर देखा आज आपकी बदौलत इन्हें यहां देख कर अच्छा लग रहा है...आभार आपका!