Wednesday, October 7, 2015

बहरें और उनके उदाहरण



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बहरें और उनके उदाहरण

आठ बेसिक अरकान:
फ़ा-इ-ला-तुन (2-1-2-2)
मु-त-फ़ा-इ-लुन(1-1-2-1-2)
मस-तफ़-इ-लुन(2-2-1-2)
मु-फ़ा-ई-लुन(1-2-2-2)
मु-फ़ा-इ-ल-तुन (1-2-1-1-2)
मफ़-ऊ-ला-त(2-2-2-1)
फ़ा-इ-लुन(2-1-2)
फ़-ऊ-लुन(1-2-2)
***

फ़ारसी मे 18 बहरें:

1.मुत़कारिब(122x4) चार फ़ऊलुन
2.हज़ज(1222x4) चार मुफ़ाईलुन
3.रमल(2122x4) चार फ़ाइलातुन
4.रजज़:(2212) चार मसतफ़इलुन
5.कामिल:(11212x4) चार मुतफ़ाइलुन
6 बसीत:(2212, 212, 2212, 212 )मसतलुन फ़ाइलुऩx2
7तवील:(122, 1222, 122, 1222) फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन x2
8.मुशाकिल:(2122, 1222, 1222) फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
9. मदीद : (2122, 212, 2122, 212) फ़ाइलातुन फ़ाइलुनx2
10. मजतस:(2212, 2122, 2212, 2122) मसतफ़इलुन फ़ाइलातुनx2
11.मजारे:(1222, 2122, 1222, 2122) मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुनx2 सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
12 मुंसरेह :(2212, 2221, 2212, 2221) मसतफ़इलुन मफ़ऊलात x2 सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
13 वाफ़िर : (12112 x4) मुफ़ाइलतुन x4 सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
14 क़रीब ( 1222 1222 2122 ) मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
15 सरीअ (2212 2212 2221) मसतफ़इलुन मसतफ़इलुन मफ़ऊलात सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
16 ख़फ़ीफ़:(2122 2212 2122) फ़ाइलातुन मसतफ़इलुन फ़ाइलातुन सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में .
17 जदीद: (2122 2122 2212) फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन मसतफ़इलुन सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
18 मुक़ातज़ेब (2221 2212 2221 2212) मफ़ऊलात मसतफ़इलुनx2 सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
19. रुबाई
***
1.बहरे-मुतका़रिब:
1.मुत़कारिब(122x4) मसम्मन सालिम
(चार फ़ऊलुन )
*सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं.
*कोई पास आया सवेरे-सवेरे
मुझे आज़माया सवेरे-सवेरे.
ये दोनों शे'र बहरे-मुतकारिब में हैं और ये बहुत मक़बूल बहर है. बहर का सालिम शक्ल में इस्तेमाल हुआ है यानि जिस शक्ल में बहर के अरकान थे उसी शक्ल मे इस्तेमाल हुए.ये मसम्मन बहर है इसमे आठ अरकान हैं एक शे'र में.तो हम इसे लिखेंगे: बहरे-मुतका़रिब मफ़रद मसम्मन सालिम.अगर बहर के अरकान सालिम या शु्द्ध शक्ल में इस्तेमाल होते हैं तो बहर सालिम होगी अगर वो असल शक्ल में इस्तेमाल न होकर अपनी मुज़ाहिफ शक्ल में इस्तेमाल हों तो बहर को मुज़ाहिफ़ कह देते हैं.सालिम मतलब जिस बहर में आठ में से कोई एक बेसिक अरकान इस्तेमाल हुआ हो. हमने पिछले लेख मे आठ बेसिक अरकान का ज़िक्र किया था जो सारी बहरों का आधार है.मुज़ाहिफ़ मतलब अरकान की बिगड़ी हुई शक्ल.जैसे फ़ाइलातुन सालिम शक्ल है और फ़ाइलुन मुज़ाहिफ़. सालिम शक्ल से मुज़ाहिफ़ शक्ल बनाने के लिए भी एक तरकीब है जिसे ज़िहाफ़ कहते हैं.तो हर बहर या तो सालिम रूप में इस्तेमाल होगी या मुज़ाहिफ़ मे, कई बहरें सालिम और मुज़ाहिफ़ दोनों रूप मे इस्तेमाल होती हैं. अरकानों से ज़िहाफ़ बनाने की तरकीब बाद में बयान करेंगे.हम हर बहर के मुज़ाहिफ़ और सालिम रूप की उदाहरणों का उनके गुरु लघू तरकीब से , अरकानों के नाम देकर समझेंगे जो मैं समझता हूँ कि आसान होगा , नहीं तो ये खेल पेचीदा हो जाएगा.
बहरे-मुतका़रिब मुज़ाहफ़ शक्लें:
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊ (फ़ऊ या फ़+अल)
122 122 122 12
गया दौरे-सरमायादारी गया
तमाशा दिखा कर मदारी गया.(इक़बाल)
दिखाई दिए यूँ कि बेखुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले.(मीर)(ये महज़ूफ ज़िहाफ़ का नाम है)
नबर दो:
फ़ऊल फ़ालुन x 4
121 22 x4
(सौलह रुक्नी)
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ न लेहु काहे लगाये छतियाँहज़ार राहें जो मुड़के देखीं कहीं से कोई सदा न आई.

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बड़ी वफ़ा से निभाई तूने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई.नंबर तीन:फ़ऊल फ़ालुन x 2
121 22 x 2
वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था.
हवाओं का रुख दिखा रहा था.
नंबर चार:फ़ालुन फ़ऊलुन x2
22 122 x2
नै मुहरा बाक़ी नै मुहरा बाज़ी
जीता है रूमी हारा है काज़ी (इकबाल)
नंबर पाँच:
फ़ाइ फ़ऊलुन
21 122 x 2
सोलह रुक्नी
21 122 x4
नंबर छ:22 22 22 22
चार फ़ेलुन या आठ रुक्नी.
इस बहर में एक छूट है इसे आप इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
211 2 11 211 22
दूसरा, चौथा और छटा गुरु लघु से बदला जा सकता है.
एक मुहव्ब्त लाख खताएँ
वजह-ए-सितम कुछ हो तो बताएँ.
अपना ही दुखड़ा रोते हो
किस पर अहसान जताते हो.(ख्याल)
नंबर सात:(सोलह रुक्नी)
22 22 22 22 22 22 22 2(11)
यहाँ पर हर गुरु की जग़ह दो लघु आ सकते हैं सिवाए आठवें गुरु के.
* दूर है मंज़िल राहें मुशकिल आलम है तनहाई का
आज मुझे अहसास हुआ है अपनी शिकस्ता पाई का.(शकील)
* एक था गुल और एक थी बुलबुल दोनों चमन में रहते थे
है ये कहानी बिल्कुल सच्ची मेरे नाना कहते थे.(आनंद बख्शी)
* पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है.(मीर)
और..
एक ये प्रकार है
22 22 22 22 22 22 22
इसमे हर गुरु की जग़ह दो लघु इस्तेमाल हो सकते हैं.
नंबर आठ:
फ़ालुन फ़ालुन फ़ालुन फ़े.
22 22 22 2
अब इसमे छूट भी है इस को इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं
211 211 222
* मज़हब क्या है इस दिल में
इक मस्जिद है शिवाला है
अब मुद्दे की बात करते हैं आप समझ लें कि मैं संगीतकार हूँ और आप गीतकार या ग़ज़लकार तो मैं आपको एक धुन देता हूँ
जो बहरे-मुतकारिब मे है. आप उस पर ग़ज़ल कहने की कोशिश करें. इस बहर को याद रखने के लिए आप चाहे इसे :
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
(122 122 122 122)
या
छमाछम छमाछम छमाछम छमाछम
या
तपोवन तपोवन तपोवन तपोवन
कुछ भी कह लें महत्वपूर्ण है इसका वज़्न, बस...
1.बहरे- मुत़कारिब
(122x4)
(चार फ़ऊलुन )एक बहुत ही मशहूर गीत है जो इस बहर मे है वो है.
अ- के ले- अ -के -ले क- हाँ जा- र- हे -हो
(1 2 2 1 2 2 1 2 2 1 2 2)
मु- झे सा- थ ले -लो य -हाँ जा र -हे हो.
(1 2 2 1 2 2 1 2 2 1 2 2)
2 .
हज़ज मसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन(1222x4)
ये सबसे मक़बूल और आसान बहर है.शायर इस बहर से ही अमूमन लिखना सीखता है.
उदाहरण:
अँधेरे चंद लोगों का अगर मकसद नही होते
यहाँ के लोग अपने आप मे सरहद नहीं होते(द्विज)
हज़ारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले.(गा़लिब)
नुमाइश के लिए गुलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
मै शायर हूँ ज़बां मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी
कि मैने शौक़ से बोली कभी उर्दू कभी हिंदी( सतपाल ख्याल)2 हज़ज मसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ मक़सूर महज़ूफ़:
मफ़ऊल मफ़ाईल मुफ़ाईल फ़लुन या मफ़ाईल
22 11 22 11 22 11 2 2 (1)
या यूँ 22 11 22 11 22 11 22
उदाहरण:
गो हाथ मे जुंबिश नहीं हाथों मे तो दम है
रहने दो अभी साग़रो-मीना मेरे आगे.(गालिब)
रंज़िश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिए से मुझे छोड़के जाने के लिए आ.( फ़राज़)
अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिये हैं
कुछ शे'र फ़कत तुमको सुनाने के लिए हैं.( जां निसार अखतर)
3 हज़ज मसम्मन मक़बूज़:
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1212 X4
ये बहुत ही सुंदर बहर है.
उदाहरण:
*सुना रहा है ये समां सुनी -सुनी सी दास्तां.
* जवां है रात साकिया शराब ला शराब ला.
* अभी तो मै जवान हूँ, अभी तो मै ज़वान हूँ.
4.हज़ज मसम्मन अशतर:
फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन
212 1222 212 1222
उदाहरण:
ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयान अपना
बन गया रक़ीब आखिर था जो राज़दाँ अपना.(गालिब)
5.हज़ज अशतर मक़बूज़:
फ़ाइलुन मफ़ाइलुन फ़ाइलुन मफ़ाइलुन
212 1212 212 1212
6.हज़ज मुसद्द्स मक़सूर महज़ूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122.
उदाहरण:
*तेरे बारे मे जब सोचा नहीं था
मै तनहा था मगर इतना नही था.
*अकेले हैम चले आऒ कहाँ हो
कहाँ आवाज़ दें तुमको कहाँ हो.
* मुसाफिर चलते-चलते थक गया है
सफर जाने अभी कितना पड़ा है.
* दरीचा बेसदा कोई नही है
अगरचे बोलता कोई नहीं है
7.मुसद्दस अख़रब मक़बूज़ मक़सूर महज़ूफ़ :
मफ़ऊलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
222 212 122
या 2211 212 122
मिलती है ज़िंदगी कहीं क्या...
8. हज़ज मसम्मन अखरबमफ़ऊल मुफ़ाईलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन
221 1222 221 1222
उदाहरण:
*हंगामा है क्योम बर्पा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नही डाला चोरी तो नहीं की है.( अकबर अलाहाबादी)
3.बहरे-मुतदारिक मसम्मन सालिम:फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन(212 212 212 212 )
उदाहरण:
या ख़ुदा तुम रखो अब मेरी आबरू
ग़श न आए मुझे जब वो हों रूबरु.
आपको देखकर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया.
दौड़ती भागती सोचती ज़िंदगी
हर तरफ़ हर ज़गह हर गली ज़िंदगी.( ख्याल)
हर तरफ़ हर ज़गह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी.
सौलह रुक्नी:
212 x8
मसद्दस:
फ़ाइलुन X 3उदाहराण:
आज जाने की ज़िद न करो
यूँ ही पहलू मे बैठे रहो.
सारे सपने कहीं खो गए
हाय हम क्या से क्या हो गए.
तुम ये कैसे जुदा हो गए
हर तरफ़ हर ज़गह हो गए.
मुज़ाहिफ़ शक्लें:
1.फ़ालुन फ़ालुन फ़ालुन फ़ालुन22 x4
ये तरक़ीब मुतकारिब मे भी आती है.
2.फ़'इ'लुन .फ़'इ'लुन .फ़'इ'लुन .फ़'इ'लुन112 x4
और 112x8.
बहुत कम इस्तेमाल होता है
.
3.फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा और फ़'212 212 212 2 (1)
किस के ख्वाबे-निहां से है आई
गुलबदन तू कहाँ से है आई.
4.फ़ाइलुन फ़'इल फ़ाइलुन फ़'इल
212 12 212 12
5. 22 x 8 या 112x 8
***
4.
बहरे-रमल( मसम्मन सालिम)1.फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 x4
( बहुत कम इस्तेमाल होती है )
मुज़ाहिफ़ शक्लें:1.फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
सबसे आसान और मक़बूल बहर है.हर शायर इस्तेमाल करता है.
उदाहरण:
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है
देखना है जोर कितना बाज़ु-ए-कातिल मे है.
हो गई है पीर परबत सि पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.(दुशयंत)
आपकी कश्ती मे बैठे ढूँढते साहिल रहे
सरफ़रोशी का वो जज़्बा अब भि अपने दिल मे है
खौलता है खून हरदम चुप नहीं बैठेंगे हम.( ख्याल)
चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है.
2.फ़ाइलातुन .फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
(2122 2122 212 )
उदाहरण:
रंज़ की जब ग़ुफ़्तगू होने लगी
आप से तुम तुम से तू होने लगी.कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जि मे हमने ठानी और है.
जब सफ़ीना मौज़ से टकरा गया
नाख़ुदा की भी खु़दा याद आ गया.
दिल गया तुमने लिया हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें.3.
फ़ाइलातुन फ़'इ'लातुन फ़'इ'लातुन फ़'लान(फ़ालुन)
2122 1122 1122 112
या
2122 1122 1122 22
उदाहरण:
मुझसे मिलने को वो करता था बहाने कितने
अब ग़ज़ारेगा मेरे साथ ज़माने कितने.
अपनी आँखों के समंदर मे उतर जाने दे
तेरा मुज़रिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे.
रस्मे-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे
हर तरफ़ आग है दामन को बचाएँ कैसे
मुझको इस रात की तनहाई मे आवाज़ न दो
जिसकी आवाज़ रुलादे मुझे वो साज़ न दो.
इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाउंगा...
4. बहरे-शिकस्ता.फ़'इ'लात फ़ाइलातुन फ़'इ'लात फ़ाइलातुन
1121 2122 1121 2122
उदाहरण:
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता.
5. बहरे-मज़ारे: मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुनx2
(1222, 2122, 1222, 2122) सालिम शक्ल मे इसका इस्तेमाल नही होता .
सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में.
मुज़ाहिफ़ शक्लें:
1. फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन
2212 122 2212 122
उदाहरण:
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसितां हमारा
मत ज़िक्र कर तू सबसे मत पूछ हर कि्सी को
ज़ख्मों का तेरे मरहम मालूम है तुझी को.(ख्याल)
मुझको बता कि मैने ये क्या गुनाह किया है
चाहा है दिल तुमारा तुमको जो दिल दिया है.(रौशन)
2. मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन
221 2121 1221 2 12
उदाहरण:
मुद्द्त हुई है यार को महमां किये हुए
जोशे क़दा से बज़्म चरागां किए हुए.
आई हयात आए कज़ा ले चली चले
अपनि खुशि से आये न अपनि खु्शी चले.
वो और हैं जो मरते हैं बस देखकर तुझे
आशिक तो मै हूँ जो बिना देखे जीया नही.
जिस तरह हस रहा हूं मै पी-पी के अशके-ग़म
यूँ दूसरा हसे तो कलेजा निकल पड़े.( कैफ़ी आज़मी)
6.बहरे-रजज़ :मसम्मन सालिम
मसतफ़इलुन मसतफ़इलुन मसतफ़इलुन मसतफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
उदाहरण:
ये दिल ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया आवारगी
इस दश्त मे इक शहर था वो क्या हुआ आवारगी.
ऐ मुझ से तुझ को सौ मिले तुझ सा न पाया एक मै
सौ- सौ कही तूने मगर मुंह पर न लाया एक मै.
मुजाहिफ़ शक्लें:
नं: 1.
मुफ़’त’इ’लुन म’फ़ा’इ’लुन मुफ़’त’इ’लुन म’फ़ा’इ’लुन
2 11 2 1212 2112 1212
उदाहरण:
दिल ही तो है न संगो-खिश्त दर्द से भर न पाये क्यों
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमे सताए क्यों,
शामे-फ़िराक अब ना पूछ आई और आके टल गई
दिल था कि फ़िर बहल गया जां थी कि फिर संभल गई.
नं:2.
मफ़’त’इ’लुन मफ़’त’इ’लुन मफ़’त’इ’लुन मफ़’त’इ’लुन
2112 2112 2112 2112
उदाहरण:
आज हो तौफ़ीके-मुलाकात तो कुछ बात बने
आएँ लबों तक मेरे जज़्बात तो कुछ बात बने.
* 7. बहरे-मजतसइस बहर की मुज़ाहिफ़ शक्लें ही इस्तेमाल होती हैं.सालिम का इस्तेमाल नहीं होता. इसके सालिम अरकान हैं: (1222, 2122, 1222, 2122) मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुनx2
मुज़ाहिफ़ शक्लें:
1. म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112
उदाहरण:
सुना है लूट लिया है किसी को रहबर ने
ये वाक्या तो मेरी दास्तां से मिलता है.(22)
गज़ब किया तिरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात कयामत का इंतज़ार किया.(112)
वो मै नही था जो इक हर्फ़ भी न कह पाया
वो बेबसी थी कि जिसने तेरा सलाम लिया.
करूँ न याद उसे किस तरह भूलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे.
हरेक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है
तुमी कहो कि ये अंदाज़े-गुफ़्तगू क्या है.
**वो चीज़ जिस के लिए हमको हो बहिशत अज़ीज
1212 1122 1212 112
सिवाए वाद-ए-गुलफ़ामे-मिशकबू क्या है.
1212 1122 1212 22.
अंत मे 112 or 22 का इस्तेमाल हो सकता है.
आखिरी रुक्न 22 कि वजाए112/ 212/ 221/ 1121 मे से कोई भी हो सकता है.
नं: 8 बहरे-मुंसरेह :
मसतफ़इलुन मफ़ऊलात x2 सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत ही इस्तेमाल होती है.
(2212, 2221, 2212, 2221)
मुज़ाहिफ़ शक्लें:
1.मुफ़'त'इ"लुन फ़ा'इ'लुन(फ़ा'इ'ला'त) मुफ़'त'इ'लुन फ़ा'इ'लुन(फ़ा'इ'ला'त)
2112 212 (2121) 2112 212(2121)
उदाहरण:
सिलसिला-ए-रोज़ो-शब नक्शबारे-हादिसात
सिलसिला-ए-रोज़ो शब अस्ले-हयातो-मुमात (Iqbal)
2. मुफ़'त'इ'लुन फ़ा'इ'लात मुफ़'त'इ'लुन फ़े या फ़ा
2112 2121 2112 1 or 2.
उदाहरण:
आ के मेरी जान को करार नही है.
ताकते-बेदादे-इंतज़ार नही है.
3. मुफ़’त’इ’लुन फ़ाइलुन मुफ़’त’इ’लुन फ़ या फ़ा
2112 212 2112 1or 2
बहर नंबर: 9मुक़ातज़ेब
मफ़ऊलात मसतफ़इलुनx2 सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरतें इस्तेमाल होती है.
(2221 2212 2221 2212)
मुज़ाहिफ़ सूरतें :
न:1
फ़ा’इ’ला’त मुफ़’त’इ’लुन फ़ा’इ’ला’त मुफ़’त’इ’लुन
2121 2 11 2 2121 211 2
बहुत कम इस्तेमाल होती है.
न: 2
फ़ा’इ’ला’त मफ़’ऊ’लुन फ़ा’इ’ला’त मफ़’ऊ’लुन
2121 222 2121 222
उदाहरण:
ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना
बन गया रक़ीब आखिर था जो राज़दां अपना.
बहर न>10: बहरे-खफ़ीफ़
फ़ाइलातुन मसतफ़इलुन फ़ाइलातुन
(2122 2212 2122)
सालिम रूप मे इस्तेमाल नही होती.सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ शक्लें इस्तेमाल होती हैं.
मुज़ाहिफ़ शक्लें:सिर्फ़ मुसद्दस शक्ल इस्तेमाल होती है.
न:1
फ़ा’इ’ला’तुन (फ़’इ’ला’तुन) म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन(फ़’इ’ला’न)
2122 (1122) 1212 22 (1121)
यानि ये बहर नीचे दिए दोनो प्रकार से इस्तेमाल हो सकती है.
फ़ा’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन
( 2122 1212 22 ) ,
फ़’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़’इ’ला’न
( 1122 1212 1121)
उदाहरण:
इब्ने मरीयम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई.
जल बोझी शमा रौशनी के लिए
ये भी जीना हुआ किसी के लिए.
हर हक़ीकत मजाज़ हो जाए
काफ़िरों की नमाज़ हो जाए.
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है.गा़लिब के इस शे’र मे पहले मिसरे मे(दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है)
1122 1212 22
और दूसरे मे
2122 1212 22
का इस्तेमाल हुआ है.
नंबर: 11::बहरे-तवील:
फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन
122, 1222, 122, 1222
सालिम शक्ल का ही इस्तेमाल होता है केवल.
बहुत कम इस्तेमाल होती है लेकिन एक मिसरा लिखने की कोशिश कर रहा हूँ.
सिर्फ़ समझने के लिए.
*कहो क्या है उस ज़ानिब ,चलो उस तरफ यारो.
**
बहर न:12:
बहरे-मदीद :मसम्मन सालिम
फ़ाइलातुन फ़ाइलुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
(2122, 212, 2122, 212)
सिर्फ़ सालिम शक्ल मे इस्तेमाल होती है लेकिन बहुत कम.
एक मिसरा कहने की कोशिश कर रहा हूँ:
आशिकी है ज़िंदगी ज़िंदगी है आशिकी.
न:13
बहरे-बसीत:मसतलुन फ़ाइलुऩ मसतलुन फ़ाइलुऩ
(2212, 212, 2212, 212 )
सालिम शक्ल मे ये इस्तेमाल नही होती सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ शक्लें इस्तेमाल होती है.
लेकिन बहुत कम.
मुज़ाहिफ़ शक्ल:
1.मुफ़’त’इ’लुन फ़ा’इ’लुन .मुफ़’त’इ’लुन फ़ा’इ’लु्न
2112 212 2112 212
एक मिसरा कहने कि कोशिश करता हूँ सिर्फ़ समझने के लिए:
दिल ने कहा सच जिसे हमने कहा सच उसे.
न:14
बहरे-कामिल:(मसम्मन सालिम)ये मसद्दस शक्ल मे कम इस्तेमाल होती है.
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
(11212x4)
ये सालिम रूप मे इस्तेमाल होती है.
उदाहरण:
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
*11212 11212 11212 11212
वो जो हम मे तुम मे करा था तुझे याद हो कि न याद हो.
वो ही यानि वादा निबाह का तुझे याद हो कि न याद हो.
मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बनके दगा न दे
मैं हूँ दर्दे-इशक से जां-बलब मुझे ज़िंदगि कि दुआ न दे.न:15
बहरे- वाफ़िर :मुफ़ाइलतुन मुफ़ाइलतुन मुफ़ाइलतुन मुफ़ाइलतुन
(12112 x4)
सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ शक्ल इस्तेमाल होती है.न के बराबर इस्तेमाल होता है.
एक मिसरा कहने की कोशिश करता हूँ:
*कहाँ तू सनम कहाँ मै सनम कहा मैने क्या सुना तूने क्या.
16.बहरे-सरीअमसतफ़इलुन मसतफ़इलुन मफ़ऊलात
2212 2212 2221
सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत इस्तेमाल होती है.
मुजाहिफ़ शक्ल:
मफ़’त’इ’लुन (मफ़’ऊ’लुन) मफ़’त’इ’लुन (मफ़’ऊ’लुन) फ़ा’इ’लुन( फ़ा’इ’लात)
2112 (222) 2112 (222) 212 (2121)
*मफ़’त’इ’लुन की जगह मफ़ऊलुन और फ़ाइलुन की जगह फ़ाइलात इस्तेमाल करने की छूट है.
उदाहरण:
दारस-ए-मुल्क अस्त मुहम्मद हाकिम
बिस्मिलाह इर-रहमान अर-रहीम.
17
बहरे-जदीद:फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन मसतफ़इलुन
(2122 2122 2212)
सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में इस्तेमाल होती है:
1.फ़’इ’ला’तुन फ़’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन
11 22 1122 1212
इस्तेमाल नही होती.
एक मिसरा लिखने की कोशिश करता हूँ
**न कहो कुछ, न सुनो कुछ ,न सहो कुछ
18. बहरे-क़रीबमुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन
( 1222 1222 2122 )
सिर्फ़ मुज़ाहिफ़ सूरत में इस्तेमाल होती है.
मुज़ाहिफ़ शक्ल:
म’फ़ा’ई’ल म’फ़ा’ई’ल फ़ाइलातुन
1221 1221 2122
फ़ारसी मे ज़्यादा इस्तेमाल होती है.
एक मिसरा समझने के लिए
कहो कु्छ तो सुनो कुछ तो ज़िंदगी है.
19.
बहरे-मुशाकिल
सालिम शक्ल इस्तेमाल नही होती और ये उर्दू मे इस्तेमाल नही होता.
मुज़ाहिफ़ शक्ल:
फ़ा'इ'लात मु'फ़ा'ई'ल मु'फ़ा'ई'ल
2121 1221 1221
एक मिसरा कहने की क ओशिश कर रहा हूँ सिर्फ़ समझने के लिए
ज़िंदगी ये मिरी शूल सी बिन तेरे

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Saturday, April 25, 2015

नवनीत शर्मा जी की तीन ग़ज़लें














एक ही ज़मीन में नवनीत जी की तीन ग़ज़लें जो इस नायाब शे’र की बदौलत आप तक पहुँची-
 
मौत के आखिरी जज़ीरे तक
ज़िन्दगी तैरना सिखाती है


ग़ज़ल १

झूठ की रौशनी बताती है
तीरगी भी ज़िया कमाती है

जब भी चिडि़या नज़र उठाती है
बाज़ की आंख सकपकाती है

सच के तेज़ाब में नहाती है
तब महब्बत को नींद आती है

क्यों अंधेरों में जगमगाती है
चीख़ जो रौशनी से आती है

दूर क़ुरबत ही ले के जाती है
मुद्दतों में ये अक़्ल आती है

मेरी आंखों के अश्क़ कहते हैं
टीस क्याो दोस्ती निभाती है

मौत आती है एक झपकी में
ज़िन्दगी आते-आते आती है

जबसे मां ढल रही है ग़ज़लों में 
‘इश्तेढहारों के काम आती है’

मौत के आखिरी जज़ीरे तक
ज़िन्दगी तैरना सिखाती है

ख़ार माज़ी के हैं कई जिनसे
दिल की सीवन उधड़ ही जाती है

इक समंदर उदास है कबसे
इक नदी राह भूल जाती है

कल तो सूरज मिरा मिलेगा मुझे
देर तक आस टिमटिमाती है

दिन में है ज़िन्दगी ख़मोश मगर
रात को ख़ूब बड़बड़ाती है

देख मुस्तैबद मेरे अश्कों को
नींद आने में हिचकिचाती है

तू मिरा आफ़ताब है लेकिन
तेरी गर्मी बदन जलाती है

देख अदालत को महवे-ख़ाब मियां
रूहे-इंसाफ कांप जाती है

ग़ज़ल २

बन के सिक्के जो खनखनाती है
वो हंसी पिक्चंरों में आती है

रूह चर्खा है, ऊन उल्फीत की
जितना मुमकिन था उतनी काती है


उतने ज़ाहिर कहां हैं वार उनके
जितनी शफ्फ़ाक अपनी छाती है

दूर वालों से क्याी भला शिकवा
वो जो कुरबत है कह्र ढाती है

एक मुस्कान रख ले चेहरे पर
ये सियासत के काम आती है


जिंदगी आ बसी है आंखों में
अब नज़र किसको मौत आती है

ग़ज़ल ३


दिल की बातों में आ ही जाती है
ज़िन्दगी फिर फ़रेब खाती है

तेरी यादों की इक नदी में मिरे
ज़ब्‍त की नाव डूब जाती है

सारे पर्दे हटा दिए मैंने
धूप अब मुस्कुराती आती है

उसने तक़सीम कर दिया सूरज
कब ये दीवार जान पाती है

धूप ससुराल जा बसी जबसे
चांदनी बन के मिलने आती है

जब से चिट्ठी ने ख़ुदकुशी कर ली
फ़ोन पर ‘हाय’ घनघनाती है


पहले दफ्तर शिकार करता है
फिर रसोई उन्‍हें पकाती है