Friday, November 16, 2012

अशोक रावत की ग़ज़लें


 
















शिक्षा:   बी. ई. (सिविल इंजी), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़।
जन्म:   15.नवम्बर 1953, गाँव मलिकपुर। ज़िला मथुरा में भारतीय खाद्य निगम ज़ोनल आफ़िस नोएडा में डिप्टी जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत|

"थोड़ा सा ईमान" ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित

हिंदी की प्रमुख राष्ट्रीय पत्र - पत्रिकाओं, ग़ज़ल संकलनों, इंटरनेट पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन. काव्य समारोहों में काव्य पाठ, रेडिओ और दूर-दर्शन से रचनाओं का प्रसारण।

ग़ज़ल

बढ़े चलिये, अँधेरों में ज़ियादा दम नहीं होता
निगाहों का उजाला भी दियों से कम नहीं होता

भरोसा जीतना है तो ये ख़ंजर फैंकने होंगे,
किसी हथियार से अम्नो- अमाँ क़ायम नहीं होता

मनुष्यों की तरह यदि पत्थरों में चेतना होती
कोई पत्थर मनुष्यों की तरह निर्मम नहीं होता

तपस्या त्याग यदि भारत की मिट्टी में नहीं होते
कोई गाँधी नहीं होता, कोई गौतम नहीं होता

ज़माने भर के आँसू उनकी आँखों में रहे तो क्या
हमारे वास्ते दामन तो उनका नम नहीं होता

परिंदों ने नहीं जाँचीं कभी नस्लें दरख्तों की
दरख़्त उनकी नज़र में साल या शीशम नहीं होता


ग़ज़ल

तय तो करना था सफ़र हमको सवेरों की तरफ़
ले गये लेकिन उजाले ही अँधेरों की तरफ़

मील के कुछ पत्थरों तक ही नहीं ये सिलसिला
मंज़िलों भी हो गयी हैं अब लुटेरों की तरफ़

जो समंदर मछलियों पर जान देता था कभी
वो समंदर हो गया है अब मछेरों की तरफ़

साँप ने काटा जिसे उसकी तरफ़ कोई नहीं
लोग साँपों की तरफ़ हैं या सपेरों की तरफ़

शाम तक रहती थीं जिन पर धूप की ये झालरें
धूप आती ही नहीं अब उन मुडेरों की तरफ़

कुछ तो कम होगा अँधेरा रोज़ कुछ जलती हुई
तीलियाँ जो फ़ेंकता हूँ मैं अँधेरों की तरफ़.

ग़ज़ल

एक दिन मजबूरियाँ अपनी गिना देगा मुझे
जानता हूँ वो कहाँ जाकर दग़ा देगा मुझे

इस तरह ज़ाहिर करेगा मुझ पे अपनी चाहतें
वो ज़माने से ख़फ़ा होगा सज़ा देगा मुझे

वो दिया हूँ मैं जिसे आँधी बुझाएगी ज़रूर
पर यहाँ कोई न कोई फिर जला देगा मुझे

आँधियाँ ले जायेंगी सब कुछ उड़ा कर एक दिन
वक़्त फिर भी चुप रहूँ ये मश्वरा देगा मुझे

सिर्फ़ मुझको हार के डर ही दिखाए जायेंगे
या कि कोई जीत का भी हौसला देगा मुझे

हर क़दम पर ठोकरें हर मोड़ पर मायूसियाँ
ऐ ज़माने और कितनी यातना देगा मुझे

रास्ते की मुश्किलें ही बस गिनाई जायेंगी
या कि कोई मंज़िलों का भी पता देगा मुझे



स्थाई पता: 222, मानस नगर, शाहगंज, आगरा, 282010
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फोन: नोएडा: 09013567499 , आगरा: 09458400433

Tuesday, November 6, 2012

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ जी की एक ग़ज़ल












ग़ज़ल

जिनके रस्तों में उजाले ही उजाले होंगे
कौन कहता है वही मंज़िलों वाले होंगे

अज़्म की शम’अ जो साथ अपने लिये चलते हैं
उनकी राहों में उजाले ही उजाले होंगे

हिर्स ने फ़स्ल जो फ़ाक़ों की उगाई है यहाँ
सबके हाथों में भला कैसे निवाले होंगे

अपने मेहमान को भरपेट खिलाकर खाना
उसने अपने लिए पत्थर ही उबाले होंगे

अब तो दो घूँट भी पानी के ग़नीमत जानो
यूँ तो महफ़िल में पियाले ही पियाले होंगे

सोज़ खो जाएगा अल्फ़ाज़ के घेरों में कहीं
प्यार के नाम रिसाले ही रिसाले होंगे

धो चुकी होगी उन्हें वक़्त की बारिश अब तक
अब वो मंज़र वहाँ होंगे न हवाले होंगे

होश में तो था कठिन चार क़दम भी चलना
लग़्ज़िशों ने ही मेरे पाँव सँभाले होंगे

शाम है सर्द चलो चल के उन्हें भी सुन लें
दिल से कुछ शे’र नये ‘द्विज’ ने निकाले होंगे


GHazal

jinke rastoN meN ujaale hee ujaale hoNge
kaun kahtaa hai vahee manziloN waale hoNge

azm kee sham’a jo saath apne liye chalte haiN
unkee raahoN meN ujaale hee ujaale hoNge

hirs ne fasl jo faaqoN kee ugaaee hai yahaaN
sabke haathoN meN bhalaa kaise nivaale hoNge

apne mehmaan ko bhar bhar-peT khilaa kar khaanaa
usne apne liye patthar hee ubaale hoNge
ab to do ghooNT bhee paanee ke GHaneemat jaano
yooN to mahfil meN piyaale hee piyaale hoNge

soz kho jaaegaa alfaaz ke gheroN meN kaheeN
pyaar ke naam risaale hee risaale hoNge

dho chukee hogee unheN waqt kee baarish ab tak
ab wo maNzar vahaaN hoNge na hawaale hoNge

hosh meN to thaa kaTHin chaar qadam bhee chalnaa
lagzishoN ne hee mere paaNv saNbhaale hoNge

shaam hai sard chalo chalke unheN hee sun leN
dil se kuCh sher naye `dwij' ne nikaale hoNge.

Saturday, September 15, 2012

नवनीत शर्मा जी की ग़ज़ल



ग़ज़ल

मैं जाकर ख्‍वाब की दुनिया में जितना जगमगाया हूँ
खुली है आंख तो उतना ही खुद पे सकपकाया हूँ

मुझे बाहर के रस्‍तों पर नहीं कांटों का डर कोई
वो सब अंदर के हैं बीहड़ मैं जिनपे डगमगाया हूँ

हां अब भी शाम को यादों के कुछ जुगनू चमकते हैं
मैं बेशक सारे खत लहरों के जिम्‍मे छोड़ आया हूँ

तुम्‍हारे ख्‍वाब की ताबीर से वाकिफ हैं सारे ही
मैं अपने ख्‍वाब की सूरत का इक धुंधला सा साया हूँ

मुझे तुमसे नहीं शिकवा मगर "नवनीत" से तो है
मैं बन कर आंख तेरी अब तलक क्‍यों डबडबाया हूँ


-नवनीत शर्मा, समाचार संपादक, दैनिक जागरण हिमाचल प्रदेश

Tuesday, August 28, 2012

द्विजेंद्र द्विज जी की एक ताज़ा ग़ज़ल


ग़ज़ल

ये कौन पूछता है भला आसमान से
पंछी कहाँ गए जो न लौटे उड़ान से

‘सद्भाव’ फिर कटेगा किसी पेड़ की तरह
लेंगे ये काम भी वो मगर संविधान से

दंगाइयों की भीड़ थी पैग़ाम मौत का
बच कर निकल सका न वो जलते मकान से

घायल हुए वहाँ जो वो अपने ही थे तेरे
छूटा था बन के तीर तू किसकी कमान से

पागल उन्हें इसी पे ज़माने ने कह दिया
आँखों को जो दिखा वही बोले ज़बान से

`धृतराष्ट्र’ को पसंद के `संजय’ भी मिल गए
आँखों से देख कर भी जो मुकरे ज़बान से

बोले जो हम सभा में तो वो सकपका गया
`द्विज’ की नज़र में हम थे सदा बे—ज़बान—से

Tuesday, August 14, 2012

दुष्यंत कुमार



ग़ज़ल

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं


तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर
तु इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं

ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं

Monday, August 6, 2012

अंसार क़म्बरी की एक ग़ज़ल



ग़ज़ल

धूप का जंगल, नंगे पावों इक बंजारा करता क्या
रेत के दरिया, रेत के झरने प्यास का मारा करता क्या

बादल-बादल आग लगी थी, छाया तरसे छाया को
पत्ता-पत्ता सूख चुका था पेड़ बेचारा करता क्या

सब उसके आँगन में अपनी राम कहानी कहते थे
बोल नहीं सकता था कुछ भी घर-चौबारा करता क्या

तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे,
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या

ये है तेरी और न मेरी दुनिया आनी-जानी है
तेरा-मेरा, इसका-उसका, फिर बंटवारा करता क्या

टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बींच भंवर में मैंने उसका नाम पुकारा करता क्या