Monday, August 6, 2012

अंसार क़म्बरी की एक ग़ज़ल



ग़ज़ल

धूप का जंगल, नंगे पावों इक बंजारा करता क्या
रेत के दरिया, रेत के झरने प्यास का मारा करता क्या

बादल-बादल आग लगी थी, छाया तरसे छाया को
पत्ता-पत्ता सूख चुका था पेड़ बेचारा करता क्या

सब उसके आँगन में अपनी राम कहानी कहते थे
बोल नहीं सकता था कुछ भी घर-चौबारा करता क्या

तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे,
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या

ये है तेरी और न मेरी दुनिया आनी-जानी है
तेरा-मेरा, इसका-उसका, फिर बंटवारा करता क्या

टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बींच भंवर में मैंने उसका नाम पुकारा करता क्या

17 comments:

सदा said...

तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे,
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या

ये है तेरी और न मेरी दुनिया आनी-जानी है
तेरा-मेरा, इसका-उसका, फिर बंटवारा करता क्या
बहुत खूब।

शारदा अरोरा said...

bahut khoobsoorat likha hai...

NEET-NEET said...

Dhup Ka Van Pag Nirvasan..,
Raj Renu Charanaa Raj Par Jharanaa.....

प्रतीक माहेश्वरी said...

क्या बेहतरीन ग़ज़ल है!
बहुत खूब..

NEET-NEET said...

Agan Lagi..,
Bunde Biharan Bah Chuki Biravan Nyaaraa Karataa Kyaa.....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कुछ तो बात है

नीरज गोस्वामी said...

टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बींच भंवर में मैंने उसका नाम पुकारा करता क्या

Waah...Waah...Kya ghazal padhvayi hai ...tabiyat khush ho gayi.

Agar Kumbari Sahab ki Koi Kitaab Hindi men shaya hui ho to mujhe use lene ka aasaan tariika jaroor batayen...Pls.

Neeraj

Anonymous said...

तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे,
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या
बहुत खूब

kanu..... said...

टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बींच भंवर में मैंने उसका नाम पुकारा करता क्या
bahut hi acchi lines....

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट कल 9/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

चर्चा - 966 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

veerubhai said...

ये है तेरी और न मेरी दुनिया आनी-जानी है
तेरा-मेरा, इसका-उसका, फिर बंटवारा करता क्या
अपने ही आवेग से तरबतर है यह गजल .हर अश आर एक गत्यात्मकता लिए है धरती धरती परबत परबत गाता जाए बंजारा का राग बांधे रहता है गेयता को .बहुत उम्दा पाए की गज़ल .
बृहस्पतिवार, 9 अगस्त 2012
औरतों के लिए भी है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली
औरतों के लिए भी है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली

सुशील said...

तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे,
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या

बहुत खूबसूरत लिख दिया
लिखता नहीं तो करता क्या !

yashoda agrawal said...

शनिवार 11/08/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

Asha Saxena said...

बढ़िया गजल|
आशा

राहुल कुमार पाण्डेय said...

awesome hai bole to superb hai .......shabd kam hain taareef ke liye

Purshottam Abbi 'Azer' said...

शब्दों में रस घोल दिया है गीत मिलन का हो जैसे
मैं भी तुझको दाद न देता प्यार का मारा करता क्या
आज़र

निर्झर'नीर said...

टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बींच भंवर में मैंने उसका नाम पुकारा करता क्या

kya bat hai ..bahut khoob