Monday, February 8, 2010

मात्रिक छंद और बहर

चलिए आज बात करते हैं क़तील शिफ़ाई साहब की। इनका वास्तविक नाम औरंगज़ेब खान था और क़तील इनका तखल्लुस और शिफ़ाई इनके उस्ताद शिफ़ा से प्रेरित है। इस नाम से हर कोई वाकि़फ़ है और क़तील साहब ने हिंदी मीटर में काफ़ी ग़ज़लें कही। जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में भी ज़िक्र किया ,ये बड़ा पेचीदा विषय है लेकिन दिलचस्प भी। उर्दू बहरों के अनुरूप हिंदी के कई छंद हैं ।बात शुरू करते हैं बहरे-मुतका़रिब की मुज़ाहिफ़(modofied) शक़्ल से- मुज़ाहिफ़ शक़्लों के अपने-अपने नाम हैं जो याद रखने मुशकिल हैं। उससे कुछ ज़्याद फ़र्क़ नहीं पड़ता। ये मुज़ाहिफ़ शक़्ल बहरे-मुतदारिक में भी रिपीट होती है। ये मुज़ाहिफ़ शक़्ल है-

बहरे-मुतकारिब की मुज़ाहिफ़ शक़्ल-
15 फ़ेलुऩ
22 22 22 22 22 22 22 2

इसका एक उदाहरण-

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

अब किस एक गुरू(फ़ेलुन) के स्थान पर दो लघु(फ़’इ’लुन) आने हैं इसके भी नियम हैं जिनका सख़्ताई से पालन नहीं होता । अमूमन पहले और अंतिम गुरू(फ़ेलुन) को छोड़कर बीच का कोई गुरू दो लघुओं से रिपलेस कर लिया जाता है जैसे कि इस उदाहरण मे-
तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
S SS S S । ।S SS SS S S। । S
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
S | | S S S S S S S| | S S S| | S

पहले मिसरे में छटे स्थान पर १४ वें स्थान पर, दूसरे में दूसरे, दसवें और १४ वें स्थान का गुरू दो लघुओं से रिपलेस हुआ। ( हिंदी मे स्थानों की गिनती और होगी)सो ये दूसरी ग़ज़लों में कुछ और हो सकता है । अमूमन पहले और अंतिम स्थान पर गुरू का प्रयोग होता है। अब बात करते हैं मात्रिक छंद की -

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
S SS S S । ।S SS SS S S। । S = 30 मात्राएँ

एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
S | | S S S S S S S| | S S S| | S = 30 मात्राएँ

कुछ शायर बहर(फ़ेलुन) की इस तरकीब को नहीं निभाते बस मात्रा गिनकर ग़ज़ल का हिंदीकरण कर देते हैं और इसे मात्रिक छंद बता देते हैं। मैनें इसी विषय पर आर.पी शर्मा जी से भी बात की । मैनें उनसे ये पूछा कि छंद या बहर लय के लिए ही बने हैं । आपको इन दो प्रकारों में "मात्रिक और बहर अनुरूप" किस रूप में लगता है कि लय बेहतर है तो उन्होंने कहा कि बहर में तो लय शत-प्रतिशत सुनिश्चित ही है लेकिन अगर ग़ज़ल मात्रिक है तो भी सही है मुझे मेरा जवाब मिल गया और आइए अब एक काम करते हैं-

एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

इस मिसरे में थोड़ा सा हेर-फ़ेर करते हैं फ़िर देखते हैं कि लय पर क्या असर पड़ता है-

इस मिसरे को यूँ कर देते हैं-

ज़रा एक ये दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

अब पूरा शे’र इसी रूप में-

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
ज़रा एक ये दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

और अब इसे पढ़िए-

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं


फ़र्क़ आपके सामने है। मात्राएँ दोनों तरह ३० ही हैं लेकिन लय बिगड़ गई। क्योंकि बहर के अनुरूप पहला शे’र नहीं है। क़तील साहब ने इस मीटर में कई ग़ज़लें कहीं और इसे अमूमन हिंदी मीटर या मीर का मीटर भी कह लेते हैं। इस मीटर में जो लय है वो दूसरी बहरों में नहीं, बहुत आनंद आता है इस मीटर में लिखी ग़ज़लों को पढ़कर । जब मात्रिक छंदों के लिहाज़ से बात करते हैं तो मुफ़ाईलुन(1222)और फ़ाइलातुन (2122) में कोई फ़र्क नहीं मिलता दोनों की मात्राओं की गिनती एक जैसी है और बहर के लिहाज़ से ज़मीन आसमान का फ़र्क़ पड़ जाता है। अगर हम छंद के हिसाब से भी लिखें तो उस छंद के कायदे-क़ानून का तो पालन करें और कम से कम मात्रिक छंदों में मात्रा तो न गिराएँ। अगर मात्रिक छंद मे मात्रा को ही गिरा दिया तो फिर क्या फ़ायदा। जिस छंद में लिख रहे हैं उसका पालन तो कर लें।

उदाहरण के लिए-

बहरे-मुतकारिब

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

हिंदी में में इससे मिलता-जुलता भुजंगपयात के वर्ण वृत प्रति चरण चार रगण(।SS) और मात्रिक के हिसाब से प्रति चरण बीस मात्राएँ और मात्रिक रूप में भी ये शर्त है कि पहली, छठी,ग्यारवीं और सोलवीं मात्रा लघु हो। अब कम से कम इस शर्त को तो हम मान लें और अगर हम वर्ण व्रुतों में लिखें फिर तो झगड़ा ही ख़त्म हो जाता है। आखिर ये बहर-विज्ञान भी तो संस्कृत से ही निकला है। थोड़ी सी मेहनत तो लाज़िमी है ही। सारी बहरें हर शायर के अवचेतन मन में होती हैं ,जब थोड़ा ज्ञान हो जाता है तो पता चल जाता है कि ये मिसरा जो मैं गुनगुना रहा था ये तो फ़लां बहर में है।
और द्विज जी ने एक बार समझाया था कि बहर तो खाल या साँचे की की तरह होती है और शब्द उसमें ठूसा जाने वाला भूसा मात्र है, शब्द टूट सकते हैं( कबीरा , कबिरा हो सकता है) लेकिन लय/बहर नहीं। बहर सही में आत्मा है और शब्द शरीर।इस लिंक को ज़रूर पढ़े बहुत महत्वपूर्ण लिंक है-
http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2005/ghazal/ghazal10.htm

ये मेरा निजी विचार है कि अगर हम बहरों को ज्यूँ का त्यूँ स्वीकार कर लें और उर्दू के तय नियमों को मानकर देवनागरी में लिखें तो ज़्यादा अच्छा है जो कई शायर कर भी रहे हैं और जिस भाषा का दामन जितना बड़ा होता है वो उतनी अमीर होती है। ये बहर-विज्ञान स्वीकार कर लेने में किसी के अहम को ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए। एक भाषा दूसरी भाषा से सीखती है और अमीर होती है। और मैं तो ये मानता हूँ कि हिंदी और उर्दू भारत की भाषाएँ हैं और रहेंगी।

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है

यही हमारी तहजीब है जो आज भी हम सब को बांधे हुए है।

हाँ बात तो क़तील साहब से शुरू हुई थी । क़तील साहब का जन्म पाकिस्तान में १९१९ में हुआ और उनके गीत ग़ज़ल बड़े-बड़े गायकों ने गाए और फ़िल्मों में भी उन्होंने कई गीत लिखे। जगजीत- चित्रा नें भी कई ग़ज़लें गाईं। २००१ में वो चल बसे । उन्होंने हिंदी मीटर में कई गज़लें कहीं। उनमें से दो ग़ज़लें मुलाहिज़ा कीजिए-

एक

मैनें पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठायेगा
आई इक आवाज़ कि तू जिसका मोहसिन कहलायेगा

पूछ सके तो पूछे कोई रूठ के जाने वालों से
रोशनियों को मेरे घर का रस्ता कौन बतायेगा

लोगो मेरे साथ चलो तुम जो कुछ है वो आगे है
पीछे मुड़ कर देखने वाला पत्थर का हो जायेगा

दिन में हँसकर मिलने वाले चेहरे साफ़ बताते हैं
एक भयानक सपना मुझको सारी रात डरायेगा

मेरे बाद वफ़ा का धोखा और किसी से मत करना
गाली देगी दुनिया तुझको सर मेरा झुक जायेगा

सूख गई जब इन आँखों में प्यार की नीली झील "क़तील"
तेरे दर्द का ज़र्द समन्दर काहे शोर मचायेगा

दो

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे
हम जब उसके शहर से निकले सब रस्ते सँवलाये थे

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात
प्यार की बातें करते करते नैन उस के भर आये थे

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे

कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे

रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका कहना हाए "क़तील"
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे

जाते-जाते मुन्नी बेगम की आवाज़ में क़तील शिफ़ाई साहब की ये ग़ज़ल ज़रूर सुनें-
तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं



13 comments:

रंजना said...

ग़ज़ल के तकनीकी ज्ञान में तो हम शून्य हैं,पर हाँ शब्दों और उसके भावों को समझने और महसूस करने का ह्रदय ईश्वर ने दिया है...और आप जिन ग़ज़लों से परिचय करवाते हैं,वह ऐसे आनंदित कर जाया करती हैं की हम स्वतः ही यहाँ तक खिंचे चले आते हैं...

बहुत बहुत आभार आपका,इन सुन्दर प्रस्तुतियों के लिए...

Udan Tashtari said...

बहुत जानकारीपूर्ण आलेख रहा. आभार!

तिलक राज कपूर said...

एक लाजवाब प्रस्‍तुति।

कतील शिफाई साहब का मकाम शायरी में जहॉं है उसपर तो कहा जा सकता है कि 'हाथ कंगन को आरसी क्‍या..'।

आदरणीय आर पी शर्मा साहब तो पिंगलाचार्य की उपाधि से विभूषित हैं और जो कहते हैं उनके द्वारा किये गये प्रामाणिक अध्‍ययन पर ही होगा अत: उनकी बात सर माथे पर।

मात्रिक छंद हों या बह्र आधारित तो मात्रिक क्रम पर पूर्व निर्धारित हो तो गेयता सरल रहेगी यदि मात्रिक छंद में मात्राओं की कुल अथवा चरणवार गणना के स्‍थान पर मात्रिक क्रम लिया गया हो और यमाताराजभानसलगा का ध्‍यान रखा गया हो। अगर एक शेर से दूसरे शेर में क्रम तोड़ दिया गया तो वह शेर ग़ज़ल से बाहर हो जायेगा।
2 को 1 1 में तोड़ने की व्‍यवस्‍था तो स्‍थापित बह्रों और उनकी मुज़ाहिफ शक्‍लों में भी है लेकिन उसके स्‍पष्‍ट नियम हैं। जाहीर है कि काफिया और रदीफ तो इस मामले में स्थिर ही रहेंगे बाकी शब्‍दों में ये खेल हो सकता है और इसपर निर्भर करेगा कि उस स्‍थान पर 'फा' है, 'ई' है, 'ला' है 'तुन' है 'लुन' वगैरह-वगैरह क्‍या है। ये तो बारीक बाते हैं जो मुझे लगता है कि लगभग 80 प्रतिशत तक ग़ज़ल सीख चुके शायर ही जानते होंगे।
आपने एक अच्‍छा प्रयास प्रारंभ किया है इस गंभीर विषय को सरल उदाहरणों के माध्‍यम से समझाने का।
आगे आने वाली पोस्‍ट अगर इसी क्रम में और स्‍पष्‍टता ला सकें तो मुझ जैसे बहुत से जिझासु लाभान्वित होंगे।

बहुत बहुत बधाई अच्‍छी ग़ज़लों और आलेख की प्रस्‍तुति के लिये।

गौतम राजरिशी said...

लगा मन की मुराद पूरी हो गयी सतपाल भाई। मैं आपसे कहने ही वाला थी कि "आज की ग़ज़ल" के पन्नों पर बीच-बीच में ग़ज़ल-शास्त्र से संबधित चर्चायें भी होती रहनी चाहिये।

इसकी जानकारी ति थी तनिक-मनिक किंतु इतने विस्तार से बताने के लिये आभार। इस बहर पे मेरी एक सर्वकालिन पसंदीदा ग़ज़ल है "देर लगी आने में तुमको शुक्र है फिर भी आये तो"...

और कतील शफ़ाई की ग़ज़लें तो जैसे एक सदी से गुनगुनाते आ रहे हैं हमसब।

सुलभ § सतरंगी said...

विस्तार से बताने के लिए आपका बहुत शुक्रिया. कातिल शिफाई के अंदाजे बयान पर हम क्या कहें.

devmanipandey.blogspot.com said...

क़तील शिफाई की ग़ज़लें पढ़कर पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। वो जब भी मुम्बई आते थे तो मुझे भी फोन करते थे। बहुत गर्मजोशी से मिलते थे। कानपुर में उनकी एक शागिर्द हैं- रश्मि(सिंह)बादशाह। अच्छी शायरा हैं मगर उनकी रचनाएं कहीं नज़र नहीं आतीं।

निर्मला कपिला said...

मेरे लिये तो बहुत काम की पोस्ट है इसे बूक मार्क कर लिया कई बार पढूँगी। बहुत बहुत धन्यवाद फिर आती हूँ

"अर्श" said...

सतपाल जी आज की पोस्ट सार्थक हुई वाली बात है . पहली बात तो उस्ताद शाईर कतील शिफाई के बारे में और दूसरी बात बह'र-ओ-वज्न को लेकर.. बिच बिच में ऐसी पोस्ट आते रहने से दिमाग का धुल साफ़ होता रहता है ... बहुत ही अछि बात की है आपने ... बढ़ाई आपको..


अर्श

chandrabhan bhardwaj said...

भाई सतपाल जी,
आपकी बहर और मात्रिक छंद पर टिप्पणी पढी।
उसमें कही गई बात कि 'अगर गज़ल मात्रिक है तो भी
सही है'।से यदि यह तात्पर्य कि यदि गज़ल बहर में नही है
पर मात्रिक छंद के अनुसार है तो सही है इससे सहमत नही हुआ जा सकता।
असल में हिन्दी काव्य में गज़ल विधा ही नही है अतः जिस भाषा के काव्य से गज़ल आई
है उसे यदि हिन्दी में अपनाना है तो उसके नियमों का पालन करना नितान्त आवश्यक है
चूंकि गज़ल में बहर की मुख्य भूमिका होती है अतः उसे बहर में रखना आवश्यक है।
अपनॆ जिस शेर का उदाहरण दिया है उससे भी स्पष्ट है कि ज़रा से हेरफेर से लय अवरुद्ध हो जाती है।

navneet sharma said...

जनाब सतपाल ख्‍याल साहब, जनाब कतील शिफाई साहब पर आपकी जानकारी बहुत अच्‍छी लगी...वाह वाह... कतील एक शायर जो शोलानवा था...। कतील साहब मुझे हमेश हिंदी सोच के लगे हैं। उनपे कुर्बान कई भाव। इक धूप सी जमी है निगाहों के आस-पास, ये आप हैं तो आप पे कुर्बान जाइए। और
ले मेरे तजरुबों से सबक ऐ मेरे रकीब
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूं मैं।
धन्‍यवाद। अच्‍छी पोस्‍ट के लिए।

सतपाल ख़याल said...

Bhardwaj ji, namaste
aapki baat sahi hai lekin aisa shayad ab hone laga hai aur mai niji taur par iske khilaf hoon lekin RP sharma ji jaise aroozee bhi ab ise certify karne lage hain .
maine yih bhi kaha ki bahar ke anuroop lay behtar hai aur mai bahar me likhne ke paksh me hoon. aapka virodh sahi hai lekin kya karen , hindi meter me to mana lekin paramprik baharoN me bhi yih ho raha hai. mai bhi aapki tarah iske khilaf hoon lekin kisko samjhaeN..

कृष्णसिंह पेला said...

सतपाल जी
जनकारीयुक्त पोष्ट के लिए धन्यवाद ।
गजल बहर में है तब तो बेहतर है ही परन्तु जिस तरह मात्राएँ समान होने के बावजुद बहर में अन्तर पड जाता है उसी तरह हिन्दी छन्द में लिखी कोई कविता की एक पंक्ति लें और उसमें वर्णों को आगे पीछे स्थानान्तरण कर के देखें तो मात्रा तो समान रहेगी पर छन्द बिगड जायेगा । अतः कविता हिन्दी मात्रिक छन्द में नियमपूर्वक लिखि गई हो तो ही वह छन्दयुक्त कविता बनती है । उसी प्रकार नियमपूर्वक हिन्दी मात्रिक छन्द में लिखी गई गजल में मात्रा , लय, तथा वज्न की समस्या नहीं आ सकती बसर्ते कि वह गजल के ही आधारभूत और अपरिहार्य अन्य नियम (विशेषतः काफिया और रदिफ) के अन्तर्गत रहकर रचित हो । फिर भी बहरों में गजल का जो सौन्दर्य है , जो बहार है , वह सभी हिन्दी छन्दों में गजल को बलपूर्वक घसिटने से सायद नहीं प्रकट हो सकेगा ।
यह तो मैने अपनी मन की बात कह डाली । अब एक अनुरोध भी है । उर्दू गजलों की सभी ज्ञात और प्रचलित बहरों की जानकारी सिद्धान्त एवम् उदाहरणसहित यदि आपके किसी पोष्ट में आईं हों तो कृपया उस के लिए लिंक उपलब्ध करायें तो बहुत आभारी रहूँगा ।

Dipendra Dev said...

नमस्कार

अापकी यिन जानकारीअो कि प्रयासका मै सम्मान करता हूँ । हालाकी मै हिन्दू अच्छा नहीँ लिखता, इसका अभ्यास जो नही है । लेकिन मै संस्कृतभाषा व्याकरणका जानकार हूँ । मै अनुरोध करता हूँ कि अापकी यस पोष्ट मै संस्कृत मात्रा छन्दकी चिन्ह लघु/गुरू कि जो उदाहरण मे पेश किये है, वो त्रुटीपूर्ण है । कृपया कुछ अध्ययन करके उसकी सही चिन्ह प्रयोगमे प्रयास करे या किसि व्याकरणविद्का सहयोग लें ।

धन्यवाद ।