Tuesday, November 1, 2011

शमीम फ़ारूक़ी

१९४३ में "गया" बिहार में जन्में सैयद मोहम्मद शमीम अहमद उर्फ़ शमीम फ़ारूक़ी बहुत अच्छे शायर हैं और इनका एक ग़ज़ल संग्रह "ज़ायक़ा मेरे लहू का" प्रकाशित हो चुका है । बहुत से अवार्ड आपको मिल चुके हैं। इनके अशआर ही इनका परिचय हैं-

सच है कि अपना रुख भी बदलना पड़ा मुझे
मैं क़ाफ़िले के साथ था चलना पड़ा मुझे














ग़ज़ल

डूबते सूरज का मंज़र वो सुहानी कश्तियाँ
फिर बुलाती हैं किसी को बादबानी कश्तियाँ

एक अजब सैलाब सा दिल के निहां-ख़ाने में था
रेत, साहिल, दूर तक पानी ही पानी कश्तियाँ

मौजे-दरिया ने कहा क्या, साहिलों से क्या मिला
कह गईं कल रात सब अपनी कहानी कश्तियाँ

खामशी से डूबने वाले हमें क्या दे गए
एक अनजाने सफ़र की कुछ निशानी कश्तियाँ

एक दिन ऐसा भी आया हल्क़-ए- गरदाब में
कसमसा कर रह गईं ख़्वाबों की धानी कश्तियाँ

आज भी अश्कों के इस गहरे समुंदर में "शमींम"
तैरती फिरती हैं यादों की पुरानी कश्तियाँ