
विलास पंडित "मुसाफ़िर" के इस खूबसूरत शे’र के साथ -
उसमें विष का वास भरा है
शब्द है जो विश्वास रे जोगी
और माहक साहब के इस फ़लसफ़े-
बीता जीवन,जी लीं साँसें
बीत गया मधुमास रे जोगी
-के साथ हाज़िर हैं सातवीं क़िस्त की तीन ग़ज़लें।
डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी
प्रीत न आई रास रे जोगी
ले लूँ क्या बनवास रे जोगी
दर-दर यूँ ही भटक रहा हूँ
आता नहीँ क्यों पास रे जोगी
कब तक भूखा प्यासा रहूँ मैं
आ के बुझा जा प्यास रे जोगी
देगा कब तू आख़िर दर्शन
मन है बहुत उदास रे जोगी
कितना बेहिस है तू आख़िर
तुझको नहीं एहसास रे जोगी
मन को चंचल कर देती है
अब भी मिलन की प्यास रे जोगी
छोड़ के तेरा जाऊँ कहाँ दर
मैं तो तेरा दास रे जोगी
सब्र की हो गई हद ‘बर्क़ी’ की
तेरा सत्यानास रे जोगी
विलास पंडित "मुसाफ़िर"
हुक़्म है तेरा ख़ास रे जोगी
मैं तो तेरा दास रे जोगी
जीवन का इक रूप है ये तो
खेले सारे रास रे जोगी
सब कुछ मेरा नाम है तेरे
जो भी मेरे पास रे जोगी
खूब ठिठौली कर लेता है
तू भी है बिंदास रे जोगी
जब से रूठा है तू मुझसे
टूटी मेरी आस रे जोगी
दुनिया को देना है,क्या दें
पत्थर या अल्मास रे जोगी
जोगन तेरी राह तके है
आया सावन मास रे जोगी
बस में होता तो मैं देता
रावण को बनवास रे जोगी
उसमें विष का वास भरा है
शब्द है जो विश्वास रे जोगी
तुझको देख के मुझको रब का
होता है एहसास रे जोगी
शायर तो दुनिया में लाखों
एक "मुसाफ़िर" ख़ास रे जोगी
डा.अजमल ख़ान "माहक" लखनऊ से
ओ जोगी तुम ख़ास रे जोगी
हमको तुम से आस रे जोगी
राम सिया संग जाई बसे वन
तज कर भोग विलास रे जोगी
देख रहे हैं अपने सारे
कौन चला बनवास रे जोगी
मोह में जब तुम इतने उलझे
काहे का सन्यास रे जोगी
जिन को भूख की आदत पड़ गई
उनको क्या उपवास रे जोगी
बीता जीवन,जी लीं साँसें
बीत गया मधुमास रे जोगी
ज्ञानी ध्यानी सब दुखियारे
मोह रचाऐ रास रे जोगी
घर छोड़ा पर जग नांहि छूटा
तू माया का दास रे जोगी
सच मिलता रोता- चिल्लाता
सहता है उपहास रे जोगी
“माहक” दुनिया देख रहा है
आई उसको रास रे जोगी







