Friday, February 21, 2025
नासिर काज़मी- -ग़ज़ल
Saturday, February 15, 2025
ताज़ा ग़ज़ल - सतपाल ख़याल
आख़िर उन का जवाब आ ही गया
दिल के बदले गुलाब आ ही गया
रोज़ बदला है चाँद सा चहरा
रफ़्ता -रफ़्ता शबाब आ ही गया
बस इशारा सा इक किया उस ने
लेके साक़ी शराब आ ही गया
साथ लाया उदासियाँ अपने
इश्क़ ले कर अज़ाब आ ही गया
उस ने देखा पलट-पलट के "ख़याल"
कोशिशों का जवाब आ ही गया
Friday, February 14, 2025
झील में सोने का सिक्का -नवनीत शर्मा
ईश्वर का प्रमुख गुण है कि वो रचता है ,हर पल ,सतत सृजन करता है ईश्वर और फिर यही गुण कवि का भी है | फ़र्क केवल इतना है कि ईश्वर सहजता से ,स्वभाव से रचयिता है लेकिन कवि साधता है ,पहले विधा को ,भाषा को ,छन्द को , बह्र को ,भाव को और फिर छन्द को धागा बनाकर उसमें भाषा को ,भाव को ,अलंकार को पिरोता है और पाठक के सामने प्रस्तुत करता है | पाठक तक कविता या ग़ज़ल भाव रूप में पहुंचती है और भाव को कवि ने बह्र आदि से सजाया होता है तो पाठक उदास शेर पढ़कर भी विभोर हो जाता और बरबस वाह !! वाह !! कह उठता है | बात जब ग़ज़ल की हो तो बहुत फूँक –फूँक के क़दम रखना पढ़ता है , यानी जब आप किसी औरत से मुख़ातिब होते हैं तो आपके लहज़े में नरमी बहुत ज़रूरी है ,शायद इसीलिए ग़ज़ल को कभी माशूक सी की गई गुफ़्तगू कहा गया है | बात भले आप सियासत के ख़िलाफ़ करें ,भले शायर आक्रोश में हो लेकिन वो नरमी ग़ज़ल की असली पहचान है जैसे ये शेर, मैं नवनीत जी के ग़ज़ल संग्रह “झील में सोने का सिक्का” से रख रहा हूँ-
सदियों का सारांश “ ग़ज़ल संग्रह – श्री द्विजेंद्र द्विज
“
Wednesday, February 12, 2025
शब के पहलू में | अमर दीप सिंह अमर
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Monday, February 10, 2025
Kyun (Hindi) Jaun Elia Unpublished Poetry | Masterpiece (First Time Ever) Paperback
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Kyun (Hindi) Jaun Elia Unpublished Poetry Masterpiece (First Time Ever) जौन एलिया के साथ-साथ उनकी शायरी भी अमर है। जौन एलिया अपनी शायरी के ज़रिए अपने सुनने वालों से बातें करते हैं, इसलिए वो आज भी अपने कलाम में ज़िन्दा हैं और हमेशा रहेंगे। ये किताब जौन एलिया के ऐसे ही नए मज़ामीन और ताज़ा मानी से भरपूर अप्रकाशित कलाम का संकलन है। उनके अप्रकाशित कलाम को इस किताब में पाठकों के लिए महफ़ूज़ करने की कोशिश की गई है। जौन एलिया उत्तर प्रदेश के शहर अमरोहा के एक इल्मी घराने में 1931 ई. में पैदा हुए। उनके वालिद सय्यद शफ़ीक़ हसन एलिया एक ग़रीब शायर और विद्वान थे। जौन की आरम्भिक शिक्षा अमरोहा के मदरसों में हुई जहाँ उन्होंने उर्दू, अरबी और फ़ारसी सीखी। पाठ्य पुस्तकों से कोई दिलचस्पी नहीं थी और इम्तिहान में फ़ेल भी हो जाते थे। बड़े होने के बाद उनको फ़लसफ़े से दिलचस्पी पैदा हुई। उन्होंने उर्दू, फ़ारसी और फ़लसफ़ा में एम.ए. की डिग्रियाँ हासिल कीं। वो अंग्रेज़ी, पहलवी, इबरानी, संस्कृत और फ़्रांसीसी ज़बानें भी जानते थे। नौजवानी में वो कम्यूनिज़्म की तरफ़ उन्मुख हुए। विभाजन के बाद उनके बड़े भाई पाकिस्तान चले गए थे। माँ और बाप के देहावसान के बाद जौन एलिया को भी 1956 में न चाहते हुए भी पाकिस्तान जाना पड़ा और वो आजीवन अमरोहा और हिन्दोस्तान को याद करते रहे।
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Friday, January 24, 2025
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