Saturday, September 13, 2008

हिन्दी दिवस







राम प्रसाद विस्मिल की दो ग़ज़लें:

न चाहूं मान दुनिया में, न चाहूं स्वर्ग को जाना ।
मुझे वर दे यही माता रहूं भारत पे दीवाना ।

करुं मैं कौम की सेवा पडे चाहे करोडों दुख ।
अगर फ़िर जन्म लूं आकर तो भारत में ही हो आना ।

लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूं हिन्दी लिखुं हिन्दी ।
चलन हिन्दी चलूं, हिन्दी पहरना, ओढना खाना ।


भवन में रोशनी मेरे रहे हिन्दी चिरागों की ।
स्वदेशी ही रहे बाजा, बजाना, राग का गाना ।

लगें इस देश के ही अर्थ मेरे धर्म, विद्या, धन ।
करुं में प्रान तक अर्पण यही प्रण सत्य है ठाना ।

नहीं कुछ गैर-मुमकिन है जो चाहो दिल से "बिस्मिल" तुम
उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना ।।







सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।









संत कबीर :

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?

खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?








अमीर खुसरो :

जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर ।

जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया
हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर ।

तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है
तुझ दोस्ती बिसियार है एक शब मिली तुम आय कर ।

जाना तलब तेरी करूँ दीगर तलब किसकी करूँ
तेरी जो चिंता दिल धरूँ, एक दिन मिलो तुम आय कर ।

मेरी जो मन तुम ने लिया, तुम उठा गम को दिया
तुमने मुझे ऐसा किया, जैसा पतंगा आग पर ।

खुसरो कहै बातों ग़ज़ब, दिल में न लावे कुछ अजब
कुदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर ।










प्यारे लाल शौकी:

जिन प्रेम रस चाखा नहीं, अमृत पिया तो क्या हुआ ।
जिन इश्क में सर ना दिया, सो जग जिया तो क्या हुआ ।।

ताबीज औ तूमार में सारी उमर जाया किसी,
सीखे मगर हीले घने, मुल्ला हुआ तो क्या हुआ ।

जोगी न जंगम से बड़ा, रंग लाल कपड़े पहन के,
वाकिफ़ नहीं इस हाल से कपड़ रँगा तो क्या हुआ ।

जिउ में नहीं पी का दरद, बैठा मशायख होय कर,
मन का रहत फिरता नहीं सुमिरन किया तो क्या हुआ ।

जब इश्क के दरियाव में, होता नहीं गरकाब ते,
गंगा, बनारस, द्वारका पनघट फिरा तो क्या हुआ ।

मारम जगत को छोड़कर, दिल तन से ते खिलवत पकड़,
शोकी पियारेलाल बिन, सबसे मिला तो क्या हुआ ।










मनोहर साग़र पालमपुरी

अपने ही परिवेश से अंजान है
कितना बेसुध आज का इन्सान है

हर डगर मिलते हैं बेचेहरा—से लोग
अपनी सूरत की किसे पहचान है

भावना को मौन का पहनाओ अर्थ
मन की कहने में बड़ा नुकसान है

चाँद पर शायद मिले ताज़ा हवा
क्योंकि आबादी यहाँ गुंजान है

कामनाओं के वनों में हिरण—सा
यह भटकता मन चलायेमान है

नाव मन की कौन —से तट पर थमे
हर तरफ़ यादों का इक तूफ़ान है

आओ चलकर जंगलों में जा बसें
शह्र की तो हर गली वीरान है

साँस का चलना ही जीवन तो नहीं
सोच बिन हर आदमी बेजान है

खून से ‘साग़र’! लिखेंगे हम ग़ज़ल
जान में जब तक हमारी जान है.














दुष्यन्त कुमार :

तुमको निहरता हूँ सुबह से ऋतम्बरा
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा

ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब
फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा—डरा

पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है
मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा—भरा

लम्बी सुरंग-से है तेरी ज़िन्दगी तो बोल
मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा

माथे पे हाथ रख के बहुत सोचते हो तुम
गंगा क़सम बताओ हमें कया है माजरा








द्विजेंन्द्र द्विज :

अँधेरे चंद लोगों का अगर मक़सद नहीं होते
यहाँ के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते

न भूलो, तुमने ये ऊँचाईयाँ भी हमसे छीनी हैं
हमारा क़द नहीं लेते तो आदमक़द नहीं होते

फ़रेबों की कहानी है तुम्हारे मापदण्डों में
वगरना हर जगह बौने कभी अंगद नहीं होते

तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी हमें कब तक
वहाँ भी तो बसेरे हैं जहाँ गुम्बद नहीं होते

चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा
सफ़र में हर जगह सुन्दर— घने बरगद नही होते















देवी नांगरानी:

गिरा हूँ मुंह के बल, ज़ख़्मी हुआ हूँ
लगा कर झूठ के पर जब उड़ा हूँ

गंवा कर होश आता जोश में जब
मैं जीती बाज़ियाँ तब हारता हूँ

मुझे पहुँचायेंगी साहिल पे मौजें
मैं तूफानों में घिरकर सोचता हूँ

मिलन का मुंतज़र हूँ मौत आजा
मुझे जीना था उतना जी लिया हूँ

उधर देखा नहीं आँखें उठाकर
नज़र से जब किसी की मैं गिरा हूँ

लगाईं तोहमतें बहरों ने मुझ पर
वो समझे बेज़ुबाँ मैं हो गया हूँ

रही हर आँख नम महफ़िल में 'देवी'
मैं बनकर दर्द हर दिल में बसा हूँ.














सतपाल ख्याल:

कुछ तो है कुछ तो है हौसला कुछ तो है
अपने दिल में अभी तक बचा कुछ तो है.

मैकदों मस्जिदों में नहीं मिल रहा
वो सकूं या खुशी या नशा कुछ तो है.

दिल के जो पास था जिस से उम्मीद थी
अब वही दिलनशीं दे दग़ा कुछ तो है.

कोंपलों से भरी झील है उस तरफ़
उस तरफ़ दूर तक नूर सा कुछ तो है.

9 comments:

शोभा said...

वाह! बहुत खूब लिखा है.आपने तो दिल खुश ही कर दिया. हिन्दी और हिन्दी दोनों को आप पैर नाज़ है. बधाई.सस्नेह

दीपक said...

बहुत सुंदर रचनाये प्रस्तुत की आपने दिलखुश कर दिया !! बिस्मील जी का एक शेर मुझे हमेशा अच्छा लगता है ॥
क्या ही लज्जत है कि रग-रग से आये यह सदा ॥
दम ना ले तलवार जब तक जान बिस्मील मे रहे ॥

आज उनकी अन्य रचनाये पढाकर आनंदित कर दिया ।

गौतम राजरिशी said...

कोंपलों से भरी झील है उस तरफ़
उस तरफ़ दूर तक नूर सा कुछ तो है.
....क्या बात है सतपाल जी...क्या खूब कही है.मजा आ गया.एक शक सा था मन में’सरफ़रोशी की तमन्ना..."प्रसिद्ध क्रांतिकारी राम प्रसाद विस्मिल की ना हो कर जहाँ तक मेरी जानकारी कहती है उन्ही के हमनाम शायर श्री विस्मिल की थी....

Udan Tashtari said...

आनन्द आ गया-इतनी सारी गज़ले, इतने सारे दिग्गज. बहुत आभार इस प्रस्तुति का.


हिन्दी में नियमित लिखें और हिन्दी को समृद्ध बनायें.

हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

-समीर लाल
http://udantashtari.blogspot.com/

सतपाल said...

Priy Dwij jee,
kuchh dinon se main samkaleen gazal ko samarpit
manch par Amir Khusro,Kabir Das,Ram Prasad Bismil,
Dushant Kumar,Manohar Sagar Palampuri,pyare lal
shauqee,Devi Nagrani,Satpal Khayal aur Dwijendra Dwij
kee behtreen gazlen padh kar lutf utha raha hoon."Aaj
kee gazal" vastuta gazal se sambandhit saraahniy kam
kar rahaa hai.Sarahniy kaam ke liye aapko aur satpal jee
jitnee ziaada badhaeean dee jaayen utnee hee kam hain.
**

Aapke shishy janab Shri Satpal vakyee kamaal
kaa kaam kar rahe hain.Khushee hotee hai ki koee
ustaad ka naam roshan kare.Shishy ho to aesa ho.
Hindi walon mein ek bahut badee bimaaree hai ki
gazal theek karvao aur baad mein too kaun.?Guru-
shishy kee paramparaa rahee hee nahin.Isliye
Hindi gazlon kaa buraa haal hai.Na chhand aur na
hee bhasha.Gazalkar ban jaate hain.Koee imandaree
se seekhta hee nahin hain.Misre theek kar-karke
diye jao.Dil mei kaee baar koft hotee hai.
Aajkal aap kya likh rahe hain?
Sad bhavnaon ke saath.

Pran Sharma

*****************
Pran ji ,
English to hamaare yahaan baDee door kee baat hai.
jo log maan(hindi) ka sammaan naheen kar sakate vo aur kisakaa karenge.
hamaare yahaaN HindI ke bahut se tathaakathit professors hain lekin v aur b ka farq nahiN jaanate.praapt ko praapat padhate hain.vishv ko vishav kahate hain.academy se puraskaar paate hain.aur baDe kaviyon men shumaar hain.
Satpal student life se hee ghazal vidhaa ki baariiqiyaan seekhane men dilachaspee letaa thaa,
mujhe KHushee hai ki usane apanee sahee raah pakad lee hai.
do teen din pahale usane mujhe jo ghazalen sunaai to mere munh se besaakhta nikal padaa."ab main tumhen faarigh-ul-islaah samajhataa hoon."
ab mujhe lagataa hai ki use meri islaah ki bhi zaroorat nahin hai,
bahut izzat detaa hai.pichale 14 varshon se phone par sampark banaae hue hai.aap yaqeen naheen karenge ham 14 varshon se nahin mile.
aap nishint rahiye aap jaise zaheen aur mehrbaan dost meri peeTh isi tarah thapathapaate rahe to main dheelaa nahin padane vaalaa.
**

aadaraNeeya sharma saahib
saadar praNaam
aajkal main to dheelaa paD gayaa hoon lekin Satpal aajkee ghazal ki bazm raushan kiye hue haiN.
aapkaa bahut dhanyavaad.
aapkaa aasheervaad hee hamaaraa sambal hai.
saadar
dwij
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Devi Nangrani said...

Dwij ji evam Satpal
Hindi diwas ki shubhkamnaon ke saath aap ko is sunder mahatvapooran diwas ki yaad mein post ki gayi gazals ke liye daad v badhayi. Pyaaas kabile-tareef hai. keet it up.

Hindi mein na likhne ke liye maafi ki talabgaar hoon

ssneh
Devi Nangrani

गौतम राजरिशी said...

satpal ji mere shak ka niwaaran to kare "sarfaroshi ki tamanna..." waali gazal ke rachiyataa ke baare me.

Kavi Kulwant said...

Bahut achcha laga sabi ki gazale padh kar.. Bismil ji ki gazale daal kar aap ne bahut achcha kaam kiya..

Anonymous said...

us taraf door tak noor sa kuchh to hai,kya khoob likha hai satpal ji.

anees