Thursday, September 25, 2008

द्विजेन्द्र द्विज जी की एक ग़ज़ल









ग़ज़ल

अगर वो कारवाँ को छोड़ कर बाहर नहीं आता
किसी भी सिम्त से उस पर कोई पत्थर नहीं आता

अँधेरों से उलझ कर रौशनी लेकर नहीं आता
तो मुद्दत से कोई भटका मुसाफ़िर घर नहीं आता

यहाँ कुछ सिरफिरों ने हादिसों की धुंध बाँटी है
नज़र अब इसलिए दिलकश कोई मंज़र नहीं आता

जो सूरज हर जगह सुंदर—सुनहरी धूप लाता है
वो सूरज क्यों हमारे शहर में अक्सर नहीं आता

अगर इस देश में ही देश के दुशमन नहीं होते
लुटेरा ले के बाहर से कभी लश्कर नहीं आता

जो ख़ुद को बेचने की फ़ितरतें हावी नहीं होतीं
हमें नीलाम करने कोई भी तस्कर नहीं आता

अगर ज़ुल्मों से लड़ने की कोई कोशिश रही होती
हमारे दर पे ज़ुल्मों का कोई मंज़र नहीं आता

ग़ज़ल को जिस जगह 'द्विज', चुटकुलों सी दाद मिलती हो
वहाँ फिर कोई भी आए मगर शायर नहीं आता

द्विजेंन्द्र द्विज

4 comments:

जितेन्द़ भगत said...

अच्‍छी गजल- ये पंक्‍ति‍यॉं वि‍शेष प्रभावी -
जो खुद को बेचने की फि‍तरतें हावी नहीं होतीं
हमें नीलाम करने कोई भी तस्‍कर नहीं आता।

Anwar Qureshi said...

बहुत अच्छा लिखा है आप ने ..

महावीर said...

द्विज साहेब, आपकी ग़ज़ल को बार बार पढ़ा है और हर दफ़ा पहले से ज़्यादा लुत्फ़ आया। हर शेर क़बिले-तारीफ़ है। बेहद आला और नफ़ीस ख़यालात हैं। दाद क़ुबूल कीजिए।
महावीर शर्मा

प्राण शर्मा said...

Gazal ke sabhee ashaar behtreen hain. Dwij jee ko badhaee.