Tuesday, July 28, 2009

सात समन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है-तीसरी किश्त







भूपेन्द्र कुमार जी के इस खूबसूरत शे’र के साथ इस किश्त की शुरूआत करते हैं..

इक भाषा को बाँट दिया है लिपियों की शमशीरों ने
हिन्दी-उर्दू का वरना तो पैदाइश से नाता है


हाज़िर हैं अगली चार तरही ग़ज़लें:

एक: एम.बी.शर्मा मधुर

बुलबुल के सुर बदले से सय्याद का मन घबराता है
सुर्ख स्याही बन जब खूं तारीख़ नई लिखवाता है

उलफ़त की राहों पे अक्सर देखे मैंने वो लम्हे
जब मैं दिल को समझाता हूँ दिल मुझ को समझाता है

दिलकश चीज़ें तोडेंगी दिल कौन यहां नावाकिफ़ है
फिर भी क्या मासूम लगें दिल धोखा खा ही जाता है

मेहनत के हाथों ने दाने हिम्मत के तो बीज दिए
बाकी रहती रहमत उस की देखें कब बरसाता है

सीना तान के चलने वाले खंजर से कब खौफ़ज़दा
आंख झुका कर वो चलता जो मौत से आंख चुराता है

घर की तल्ख़ हकीकत जब जब पांओं की ज़ंजीर बने
सात समुन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है

दो: भूपेन्द्र कुमार

जेबें ख़ाली हों तो अपना पगला मन अकुलाता है
भरने गर लग जाएँ तो वह बोझ नहीं सह पाता है

इन्सानों की आँखों में भी दरिय़ा सी तुग़ियानी है
पानी लेकिन आँखों का अब कमतर होता जाता है

इक भाषा को बाँट दिया है लिपियों की शमशीरों ने
हिन्दी-उर्दू का वरना तो पैदाइश से नाता है

महलों में रहने वाला जब कहता है संतोषी बन
झुग्गी में रहने वाला तब मन ही मन मुस्काता है

टीवी चैनल बन जाएँ जब सच्चाई के व्यापारी
सच दिखलाने में आईना मन ही मन शरमाता है

बारिश के पानी में देखूँ, जब भी काग़ज़ की कश्ती
मुझको अपना बीता बचपन बरबस याद आ जाता है

इस जीवन में केवल उसका सपना पूरा होता है
चट्टानें बन कर पल-पल जो लहरों से टकराता है

तूफ़ानों से डर कर जो भी साहिल पर रहता उसका
सात समन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है

तीन: गौतम राजरिशी

शाम ढ़ले जब साजन मेरा बन-ठन कर इतराता है
चाँद न जाने क्यूं बदली में छुप-छुप कर शर्माता है

रोटी की खातिर जब इंसां दर-दर ठोकर खाता है
सात समंदर पार का सपना सपना ही रह जाता है

देखा करता है वो हमको यूं तो छुप-छुप के अक्सर
राहों में मिलता है जब भी फिर क्यूं आँख चुराता है

तैर के दरिया पार करे ये उसके बस की बात नहीं
लहरों की गर्जन सुन कर जो साहिल पर थर्राता है

रस्ते में आते-जाते वो आँखें भर देखे जब भी
ख्वाहिश की धीमी आँचों को और जरा सुलगाता है

उसको यारों की गिनती में कैसे रखना मुमकिन हो
काम निकल जाने पर जो फिर मिलने से कतराता है

सूरज गुस्से में आकर जब नींद उड़ाये धरती की
बारिश की थपकी पर मौसम लोरी एक सुनाता है

चार: कवि कुलवंत सिंह

मेरा दिल आवारा पागल नगमें प्यार के गाता है
ठोकर कितनी ही खाई पर बाज नही यह आता है

मतलब की है सारी दुनिया कौन किसे पहचाने रे
कौन करे अब किस पे भरोसा, हर कोई भरमाता है

खून के रिश्तों पर भी देखो छाई पैसे की माया
देख के अपनो की खुशियों को हर चेहरा मुरझाता है

कहते हैं अब सारी दुनिया सिमटी मुट्ठी में लेकिन
सात समंदर पार का सपना सपना ही रह जाता है

आँख में मेरी आते आंसू जब भी करता याद उसे
दूर नही वह मुझसे लेकिन पास नही आ पाता है

12 comments:

दिगम्बर नासवा said...

कवि कुलवंत सिंह, गौतम राजरिशी, भूपेन्द्र कुमार और एम.बी.शर्मा मधुर जी की लाजवाब गलें पढने के बाद बस दिल से वाह वाह ही निकल रही है............... शानदार एक से बढ़ कर एक हैं सब की सब गज़लें

अर्चना तिवारी said...

आप सभी की ग़ज़लें बेहद खूबसूरत हैं...मजा आ गया..वाह !!

नीरज गोस्वामी said...

जनाब एम् बी.शर्मा मधुर, भूपेंद्र कुमार, गौतम और कुलवंत सिंह ने बेहद खूबसूरत कहे हैं अपनी अपनी ग़ज़लों में और इस तरही मुशायरे को नयी बुलंदी पर पहुँचाया है. गौतम जी ने तरही पर जो गिरह लगायी है उस शेर को मैं अपने साथ लिए जा रहा हूँ:
रोटी की खातिर जब इंसां दर-दर ठोकर खाता है
सात समंदर पार का सपना सपना ही रह जाता है
सभी शायरों को उम्दा कलाम के लिए और सतपाल जी आपको इस तरही मुशायरे को इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए, दिली मुबारकबाद पेश करता हूँ
नीरज

ओम आर्य said...

sabhi nazame ek se badhakar ek hai ......bahut hi khubsoorat rachnaye ......bahut hi sundar

ओम आर्य said...

sabhi nazame ek se badhakar ek hai ......bahut hi khubsoorat rachnaye ......bahut hi sundar

MUFLIS said...

मेहनत के हाथों ने दाने हिम्मत के तो बीज दिए
बाकी रहती रहमत उस की देखें कब बरसाता है

बारिश के पानी में देखूँ, जब भी काग़ज़ की कश्ती
मुझको अपना बीता बचपन बरबस याद आ जाता है

तैर के दरिया पार करे ये उसके बस की बात नहीं
लहरों की गर्जन सुन कर जो साहिल पर थर्राता है

खून के रिश्तों पर भी देखो छाई पैसे की माया
देख के अपनो की खुशियों को हर चेहरा मुरझाता है

इस बार भी अछि ग़ज़लें पढने को मिलीं ...
मुन्तखब अश`आर ने बहुत मुतआसिर किया

कामयाबी का सेहरा यकीनन "ख़याल" जी आपके सर ही है
बधाई . . . .

---मुफलिस---

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सतपाल जी.
सारी ग़ज़लें बहुत ही अच्छी लगीं....बहुत उम्दा शेर...बहुत बहुत बधाई

venus kesari said...

सभी गजलें पसंद आई

शाम ढ़ले जब साजन मेरा बन-ठन कर इतराता है
चाँद न जाने क्यूं बदली में छुप-छुप कर शर्माता

गौतम जी का लिखा मतला ख़ास पसंद आया

वीनस केसरी

योगेन्द्र मौदगिल said...

सभी ग़ज़लें बेहतरीन हैं...

योगेश स्वप्न said...

sabhi gazalen khoobsurti men bejod, gautam ji vishesh pasand bane.

गौतम राजरिशी said...

भूपेन्द्र जी का ये शेर तो कालजयी शेर है..अहा!

बेहतरीन ग़ज़लें ..
मधुर जी का ये शेर "मेहनत के हाथों ने दाने हिम्मत के तो बीज दिए/बाकी रहती रहमत उस की देखें कब बरसाता है" और कुलवंत जी का "खून के रिश्तों पर भी देखो छाई पैसे की माया/देख के अपनो की खुशियों को हर चेहरा मुरझाता है" खूब भाया...

अपने मतले के लिये मुफ़लिस जी का शुक्रगुजार हूँ।

kavi kulwant said...

satpal ji bahut umda kaam kar rahe hain..badhayee..