Sunday, September 20, 2009

अब्दुल हमीद" अदम" की ग़ज़लें














अब्दुल हमीद "अदम" अपनी ख़ास शैली और भाषा के लिए जाने जाते थे। उनका जन्म 1909में तलवंडी मूसा खाँ(पाकिस्तान में) हुआ था।उन्होंने बी.ए. तक की पढ़ाई पूरी की और पाकिस्तान सरकार के ऑडिट एण्ड अकाउंट्स विभाग में ऊँचे ओहदे पर रहे। शराब के शौकीन इस शायर की ये पंक्तियां पढ़ें-

शिकन न डाल जबीं पर शराब देते हुए
ये मुस्कराती हुई चीज़ मुस्करा के पिला
सरूर चीज़ की मिक़दार पर नहीं मौकू़फ़
शराब कम है तो साकी नज़र मिला के पिला


आज वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन वो अंदाज़ आज भी ज़िंदा है।भले ही आज ग़ज़ल एक अलग पहचान बना रही है लेकिन कभी हुस्नो-इश्क़ भी इसके ज़ेवर रहे हैं और इनका भी अपना ही स्थान है शायरी में , इन्हें पढ़ने-सुनने में कोई बुराई नहीं है , आप भी इस शायर की ग़ज़लों का आनंद लें।

एक

गिरह हालात में क्या पड़ गई है
नज़र इक महज़बीं से लड़ गई है

निकालें दिल से कैसे उस नज़र को
जो दिल में तीर बनकर गड़ गई है

मुहव्बत की चुभन है क़्ल्बो-जाँ* में
कहाँ तक इस मरज़ की जड़ गई है

ज़रा आवाज़ दो दारो-रसन* को
जवानी अपनी ज़िद्द पे अड़ गई है

हमें क्या इल्म था ये हाल होगा
"अदम" साहब मुसीबत पड़ गई है

क़्ल्बो-जाँ-दिल और जान,दारो-रसन-फाँसी
दो

डाल कर कुछ तही* प्यालों में
रंग भर दो मेरे ख़यालों में

ख्वाहिशें मर गईं ख़यालों में
पेच आया न उनके बालों में

उसने कोई जवाब ही न दिया
लोग उलझे रहे सवालों में

दैरो-काबे की बात मत पूछॊ
वाकि़यत* गुम है इन मिसालों में

आज तक दिल में रौशनी है "अदम"
घिर गए थे परी जमालों में

वाकि़यत-असलियत,तही-खाली
तीन

सर्दियों की तवील* राते हैं
और सौदाईयों सी बातें हैं

कितनी पुर नूर थी क़दीम* शबें
कितनी रौशन जदीद रातें हैं

हुस्न के बेहिसाब मज़हब हैं
इश्क़ की बेशुमार रातें हैं

तुमको फुर्सत अगर हो तो सुनो
करने वाली हज़ार बातें हैं

ज़ीस्त के मुख़्तसर से वक़्फ़े* में
कितनी भरपूर वारदातें हैं

तवील-लंबी,क़दीम-पुरानी,जदीद -नई,वक़्फ़े-अवधि

6 comments:

हेमन्त कुमार said...

निकालें दिल से कैसे उस नज़र को
जो दिल में तीर बनकर गड़ गई है ।

आभार ।

dheer said...
This comment has been removed by the author.
dheer said...

maikadaa thaa chaaNdanii thii maiN na thaa
ik mujassam beKhudii thii maiN na thaa

ishq jab dam toRataa thaa tum na the
maut jab sar dhun rahii thii mai.n na thaa!!

shaaid hee koee maikash (khaas-kar sukhanfehm :) ) hogaa jisne mohataram abdul hamid "ada" saHeb ke yeh sher nah sune hoN. aap urdu shaairee meN ek alag hee muqaam rakhte haiN.
in ghazaloN ko pesh karne ke liye Satpal saHeb kaa hazaar_haa shukriyaa!

Dheer

kavi kulwant said...

ekj se ek behatar shayaron ko yahan laane ka bahut shukriyaa..

Nirmla Kapila said...

लाजवाब गज़लें हैं । धन्यवाद्

Devi Nangrani said...

waahhhhhhhhhhhhhhhh!!
ज़ीस्त के मुख़्तसर से वक़्फ़े* में
कितनी भरपूर वारदातें हैं
bahut hi sunder!

Devi nangrani