Wednesday, October 21, 2009

जतिन्दर परवाज़ की ग़ज़लें और परिचय













1975 में जन्में जतिन्दर "परवाज़" की तीन ग़ज़लें हम पेश कर रहे हैं। "ग़ज़ल दुश्यंत के बाद" भाग-२ में इनकी ग़ज़लें शामिल हैं । युवा शायर हैं और बहुत अच्छे शे’र कहते हैं। आल इंडिया मुशायरों में शिरकत कर चुके हैं। इनसे अदब को बहुत उम्मीदें हैं। इनका ग़ज़ल संग्रह भी जल्द ही आ रहा है।

एक

शजर पर एक ही पत्ता बचा है
हवा की आँख में चुभने लगा है

नदी दम तोड़ बैठी तिशनगी से
समंदर बारिशों में भीगता है

कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है

सभी के खून में गैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है

जवानी क्या मेरे बेटे पे आई
मेरी आँखों में आँखे डालता है

चलो हम भी किनारे बैठ जायें
ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है

बहरे-हज़ज की मुज़ाहिफ़ शक्ल
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122.

दो

ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ
मुश्किलें हैं सफ़र में क्या क्या कुछ

फूल से जिस्म चाँद से चेहरे
तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ

तेरी यादें भी अहले-दुनिया भी
हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ

ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता
था हमारे भी घर में क्या क्या कुछ

शाम तक तो नगर सलामत था
हो गया रात भर में क्या क्या कुछ

हम से पूछो न जिंदगी 'परवाज़'
थी हमारी नज़र में क्या क्या कुछ

बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
फ़ा’इ’ला’तुन म’फ़ा’इ’लुन फ़ा’लुन
2122 1212 22

तीन

यार पुराने छूट गए तो छूट गए
कांच के बर्तन टूट गए तो टूट गए

सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं
तीर कमाँ से छूट गए तो छूट गए

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे
मेरे सपने टूट गए तो टूट गए

इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये
भाग किसी के फूट गए तू फूट गए

छोड़ो रोना धोना रिश्ते नातों पर
कच्चे धागे टूट गए तो टूट गए

अब के बिछड़े तो मर जाएंगे 'परवाज़'
हाथ अगर अब छूट गए तो छूट गए

पाँच फ़ेलुन+एक "फ़े"


संपर्क -
गाँव - शाहपुर कंडी ,
तहसील - पठानकोट,पंजाब -145029
मोबाइल- +919868985658
ईमेल -jatinderparwaaz@gmail.com

18 comments:

chandrabhan bhardwaj said...

teenon hi ghazalen bahut sunder. padhakar aanand aa gaya. Badhai sweekaren.

Udan Tashtari said...

अंतिम गज़ल बहुत पसंद आई.

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi said...

जतिन्द्र परवाज़ की ग़ज़ल मेँ नए ज़माने की रोशनी है
तमाम अशआर मेँ ग़ज़ल के सुरूरो कैफ और दिलकशी है
अहमद अली बर्क़ी आज़मी

गौतम राजरिशी said...

जतिन्द्र जी को पढ़ा है पहले भी...उनका ये शेर तो बहुत दिनों से पसंद है मुझे "चलो हम भी किनारे बैठ जायें/ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है"

"अर्श" said...

परवाज़ साहिब की तीनो ही गज़लें आपने आप में मुकम्मल हैं क्या खूब चुन चुन कर के शे'र निकालें हैं इन्होने .. पहली ग़ज़ल का मतला पढ़ते ही दिल से वाह वाह निकल गया और जैसे जैसे निचे उतारते गए फिर पूछने से क्या फायदा मैं बता नहीं पौँगा ... मजा आगया जनाब...आभार

अर्श

योगेश स्वप्न said...

behatareen prastuti, aabhaar.

Sameer Kabeer said...

सभी के खून में गैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है
nothing to say behind this

singhsdm said...

परवाज़ साहब
पहली बार आपको देखा - पढ़ा मज़ा आ गया क्या खूब कहा है

शजर पर एक ही पत्ता बचा है
हवा की आँख में चुभने लगा है

नदी दम तोड़ बैठी तिशनगी से
समंदर बारिशों में भीगता है

कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही खूबसूरत गज़लों का संकलन है ........... परवाज़ साहब कमाल का लिखते हैं ............

MUFLIS said...

कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है

तेरी यादें भी अहले-दुनिया भी
हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे
मेरे सपने टूट गए तो टूट गए

जतिंदर 'परवाज़' को कई बार रिसालों में पढा है
उनकी शायरी meiN जहां नयेपन की दस्तक है , वहाँ एक बात ये भी साफ़ नज़र आती है क वो ग़ज़ल की अमीर रिवायत को भी संभाल के रक्खे हुए हैं ...
मुक्तलिफ़ मुशायरों में शिरक़त करना उन्हें इस बात में मददगार साबित होता है ...ऐसा ज़ाहिर है
उर्दू अदब को और एहल-ए-इल्म को उनसे काफी उम्मीदें हैं
मेरी दुआएं 'परवाज़' के साथ हैं
---मुफलिस---

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह.... बहुत दिनों के बाद कुछ अच्छी ग़ज़लें पढ़ी.. मजा आ गया.. वाह..

kavi kulwant said...

rwaaj ji ki udaan dekh kar bahut subdar lagaa... hardik badhayee...
Kulwant singh

निर्झर'नीर said...

फूल से जिस्म चाँद से चेहरे
तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ

khoobsurat laga..

pahli gazal kuch jyada hi pasand aayi..
bandhai swikaren

श्रद्धा जैन said...

Teeno hi gazlen bahut sunder
har sher ke ek ek shabd ka chayan soch kar kiya gaya hai
bahut pasand aayi

भूपेन्द्र कुमार said...

तीनों ही ग़ज़लें बहुत उम्दा हैं और तीसरी ग़ज़ल का तो जवाब ही नहीं। ग़ज़लों में नए दौर की ताज़गी साफ झलकती है जिससे इस युवा शायर की निश्चय ही एक अलग पहचान बनेगी।

भूपेन्द्र कुमार said...

तीनों ही ग़ज़लें बहुत उम्दा हैं और तीसरी ग़ज़ल का तो जवाब ही नहीं। ग़ज़लों में नए दौर की ताज़गी साफ झलकती है जिससे इस युवा शायर की निश्चय ही एक अलग पहचान बनेगी।

नीरज गोस्वामी said...

कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है
*******
फूल से जिस्म चाँद से चेहरे
तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ
*******
सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं
तीर कमाँ से छूट गए तो छूट गए

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे
मेरे सपने टूट गए तो टूट गए

एक से बढ़ कर एक यादगार शेरों से सजी इन ग़ज़लों के लिए परवाज़ जी को सलाम...और आपको तहे दिल से शुक्रिया जो इन्हें पढने का मौका दिया...

नीरज

जतिन्दर परवाज़ said...

'आज की ग़ज़ल' पर प्रकाशनार्थ मेरी ग़ज़लों को पसंद करने और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देने के लिए मैं सभी पाठकों का आभारी हूँ , तथा पत्रिका के सम्पादक मंडल का भी शुक्रिया अदा करता हूँ कि उन्होंने प्रकाशनार्थ मेरी ग़ज़लों का चयन किया ,
मौक़ा मिला तो दोबारा रु-ब-रु होऊंगा ,
आपका ...
जतिन्दर परवाज़ ,
mob - +91 9868985658
email - jatinderparwaaz@gmail.com