Monday, November 16, 2009

चौथी क़िस्त















मिसरा-ए-तरह "तुझे ऐ ज़िंदगी , हम दूर से पहचान लेते हैं" पर अगली दो ग़ज़लें

प्रेमचंद सहजवाला

सफ़र मंज़िल का मुश्किल है क़दम ये जान लेते हैं
तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

ग़ज़ल कहना तो आला शाइरों का काम होता है
मगर नादाँ इसे कहना समझ आसान लेते हैं

चुनावों में तो रौनक़ सी नज़र आती है हर जानिब
हमारे गाँव में डाकू भी मूंछें तान लेते हैं

हमें तहज़ीब का रस्ता वो लाठी से सिखाते हैं
मगर हम लोग उन की असलियत को जान लेते हैं

अगरचे आप फ़ितरत से ही तानाशाह लगते हैं
कहा हम आप का फिर भी हमेशा मान लेते हैं

जवानों की न हिम्मत पर कभी हैरान हो साथी
वही करते हैं वो जांबाज़ जो कुछ ठान लेते हैं

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

बुज़ुर्गों के तजुर्बे का कहां अहसान लेते हैं
वही करते हैं बच्चे दिल में जो भी ठान लेते हैं.

हमारी कश्तियाँ हैं सब की सब सागर की हमजोली
हमारे *अज़्म से टक्कर कहां तूफान लेते हैं

महक जाती हैं ये सांसें तेरे आने की आहट से
तुझे ऐ जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

मुहब्बत की अदालत में दलीलें चल नहीं पातीं
वो खु़द को बावफ़ा कहते हैं तो हम मान लेते हैं

हमारी गु़फ्तगू में एक ये मुश्किल तो है 'शाहिद'
ग़ज़ल के वास्ते अल्फाज़ भी आसान लेते हैं

*अज्म-दृढ़ प्रतिज्ञा, मज़बूत इरादा

6 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बेहतरीन गजलो की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.

Nirmla Kapila said...

सहज वाला जी और शाहिद मिर्ज़ा जी की गज़लों की बहर के साथ साथ बह रहे हैं लाजवाब चल रहा है आपका ये मुशायरा। हर गज़ल काबिले तारीफ है। धन्यवाद और शुभकामनायें

MUFLIS said...

जवानों की न हिम्मत पर कभी हैरान हो साथी
वही करते हैं वो जांबाज़ जो कुछ ठान लेते हैं

प्रेम सहजवाला जी की ग़ज़ल का ये शेर
यक़ीनन हमारे मुल्क की दिलो-जान से हिफाज़त
करने वाले जवानो की शान में ही कहा गया है
प्रेम जी के साथ-साथ मैं भी उन्हें इन अलफ़ाज़ के
हवाले से सलाम कहता हूँ

और "आज की ग़ज़ल" में
शाहिद जी की हाज़िरी का हम सब इस्तेक़बाल
करते हैं .....

मुहब्बत की अदालत में दलीलें चल नहीं पाती
वो खुद को बावफ़ा कहते हैं तो हम मान लेते हैं

रवायती ग़ज़ल कि तर्जुमानी करता हुआ ये शेर
वाक़ई दिल फरेब-सा लगता है ....
gzl ke sabhi ash`aar lubhaate haiN

दुआओं के साथ ....
'मुफलिस'

कुलदीप "अंजुम" said...

mirza ji ki gazal ka jabab nahi
badhayi

RC said...

मुहब्बत की अदालत में दलीलें चल नहीं पातीं
वो खु़द को बावफ़ा कहते हैं तो हम मान लेते हैं

blackboyfriend said...

बुज़ुर्गों के तजुर्बे का कहां अहसान लेते हैं
वही करते हैं बच्चे दिल में जो भी ठान लेते हैं.
सही बात