Monday, June 1, 2009

दिल अगर फूल सा नहीं होता - पहली किश्त








मिसरा-ए-तरह "दिल अगर फूल सा नहीं होता" पर पहली पाँच ग़ज़लें.

प्राण शर्मा की ग़ज़ल

जिस्म खुशबू भरा नहीं होता
दिल अगर फूल सा नहीं होता

थक गया हूँ मैं साफ़ करते हुए
दिल का कमरा सफ़ा नहीं होता

दोस्ती कर के देख ले उस से
हर कोई देवता नहीं होता

डिग्रियां उसकी क्या करे कोई
साथ जो भी खड़ा नहीं होता

जीते-जी अम्मा मर गयी होती
खोया सुत गर मिला नहीं होता

कोई चाहे नहीं उसे बिलकुल
दिल से क्यों दुःख जुदा नहीं होता

हम ही जाएँ हमेशा पास उसके
उससे पल भर को आ नहीं होता

आप बनवा के देख लें लेकिन
घर महज रेत का नहीं होता

हर खुशी सबको गर मिली होती
आदमी दिलजला नहीं होता

द्वार हर इक का खटखटाते हो
सबका ही आसरा नहीं होता

"प्राण" रिसता रहा सभी पानी
काश, ऐसा घड़ा नहीं होता



डा. दरवेश भारती की ग़ज़ल

पीठ पीछे कहा नहीं होता
तुमसे कोई गिला नहीं होता

जो ख़फ़ा है ख़फ़ा नहीं होता
हमने गर सच कहा नहीं होता

ज़िक्र उनका छिड़ा नहीं होता
ज़ख़्म दिल का हरा नहीं होता

तुम जुटाओ ज़रा-सी हिम्मत तो
देखो फिर क्या से क्या नहीं होता

ईंट-पत्थर न चलते आपस में
घर ये हरगिज़ फ़ना नहीं होता

क्या समझता ग़ुरूर क्या शय है
वो जो उठकर गिरा नहीं होता

कुछ न कर पाता कोई तूफ़ाँ भी
भाग्य में गर बदा नहीं होता

नाव क्यों उसके हाथों सौंपी थी
नाख़ुदा तो ख़ुदा नहीं होता

आज होते न वाल्मीकि अगर
वन-गमन राम का नहीं होता

दर्द की चशनी में जो न पके
ख़ुद से वो आशना नहीं होता

कोई सागर कहीं न होता अगर
इक भी दरिया बहा नहीं होता

प्रेम ख़ुद की तरह न सब से करे
फिर वो ‘दरवेश’-सा नहीं होता



जोगेश्वर गर्ग की ग़ज़ल

इश्क में मुब्तिला नहीं होता
तो मुसीबतजदा नहीं होता

बारहा हादसा नहीं होता
दिल अगर फूल सा नहीं होता

कर रहे थे उसे सभी सज़दे
कोई कैसे खुदा नहीं होता

रोज तूफ़ान भी तलातुम भी
कब यहाँ ज़लज़ला नहीं होता

बर नहीं आ रही मेरी कोशिश
उन तलक सिलसिला नहीं होता

रोज होती रही बहस कितनी
हाँ मगर फैसला नहीं होता

पस्त होती यहाँ तभी मुश्किल
पस्त जब हौसला नहीं होता

क्यों हुआ कमनसीब "जोगेश्वर"
क्यों कभी भी नफ़ा नहीं होता



तेजेन्द्र शर्मा की ग़ज़ल:

साथ तेरा अगर मिला होता
जश्न ख़ामोश सा नहीं होता

ऐसे हालात से भी गुजरा हूँ
मुझ को मेरा पता नहीं होता

मैनें ये मान लिया काफ़िर हूँ
तुम से बेहतर ख़ुदा नहीं होता

सोच में तेरी आके ग़ैर रहे
ये वफ़ा का सिला नहीं होता

हर कोई आज उड़ाता है हंसी
काश तुझ से मिला नहीं होता

हाँ शिकायत ज़रूर है तुझ से
ग़ैर से तो गिला नहीं होता

ज़ख़्म जो तुमने दिये सह लेता
दिल अगर फूल सा नहीं होता



अहमद अली बर्क़ी आज़मी की ग़ज़ल:

जब वो जलवा नुमा नहीं होता
क्या बताऊँ मैं क्या नहीं होता

दिल बहुत ही उदास रहता है
कोई दर्द आशना नहीं होता

नहीं होता सुकून-ए-क़ल्ब मुझे
उसका जब आसरा नहीं होता

याद आती है उसकी सरगोशी
जब भी उसका पता नहीं होता

वही रहता है ख़ान-ए-दिल में
जब कोई दूसरा नहीं होता

इस क़दर मुझ से है वह अब मानूस
कभी मुझ से जुदा नहीं होता

कीजिए आप सब से हुस्न-ए सुलूक
कोई अच्छा बुरा नहीं होता

तोडि़ए मत किसी का शीशा-ए-दिल
कुछ भी इस से भला नहीं होता

अस्ल में है यही फसाद की जड
पूरा अहद –ए-वफा नहीं होता

नहीं चुभते कभी यह ख़ार-ए-अलम
दिल अगर फूल सा नहीं होता

उसका तीर-ए-नज़र निशाने से
कभी बर्क़ी ख़ता नहीं होता