Monday, April 5, 2010

जनाब नवाज़ देवबन्दी














जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ में हर किसी ने इस खूबसूरत ग़ज़ल-

तेरे आने कि जब ख़बर महके
तेरी खुश्बू से सारा घर महके


को ज़रूर सुना होगा। इस ग़ज़ल के शायर हैं जनाब नवाज़ देवबन्दी । ऐसी बेमिसाल कहन के मालिक जनाब मुहम्मद नवाज़ खान उर्फ़ नवाज़ देवबन्दी का जन्म 16 जुलाई 1956 को उत्तर प्रदेश में हुआ। उर्दू में आपने एम.ए किया फिर बाद में पी.एच.डी की। दो ग़ज़ल संग्रह "पहला आसमान" और "पहली बारिश" प्रकाशित हुए हैं। इनकी शायरी गुलाबों पर बिखरे ओंस के क़तरों की तरह है। हज़ारों मुशायरों में शिरक़त करने वाले देवबन्दी साहब का हर शे’र ताज़गी और सुकून समेटे रहता है-

अंजाम उसके हाथ है आग़ाज़ कर के देख
भीगे हुए परों से ही परवाज़ कर के देख

गो वक़्त ने ऐसे भी मवाक़े हमें बख़्शे
हम फिर भी बज़ुर्गों के सिराहने नहीं बैठे


ओ शहर जाने वाले ! ये बूढ़े शजर न बेच
मुमकिन है लौटना पड़े गाँव का घर न बेच

ऐसी सादा अल्फ़ाज़ी में इतने पुरअसर शे’र कहना क़ाबिले-तारीफ़ है। मुझे बहुत खुशी है कि उन्होंने अपनी ग़ज़लें शाया करने की अनुमति हमें दी। ये पोस्ट आज की ग़ज़ल का एक सुनहरा पन्ना है।

ग़ज़ल मुलाहिज़ा कीजिए-

सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे

वैसे तो हम वही हैं जो पहले थे दोस्तो
हालात जैसे पहले थे वैसे नहीं रहे

खु़द मर गया था जिनको बचाने में पहले बाप
अबके फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे

दरिया उतर गया है मगर बह गए हैं पुल
उस पार आने-जाने के रस्ते नहीं रहे

सर अब भी कट रहे हैं नमाज़ों में दोस्तो
अफ़सोस तो ये है कि वो सजदे नहीं रहे

बहरे-मज़ारे की मुज़ाहिफ़ शक़्ल
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन
221 2121 1221 212


एक और नायाब ग़ज़ल-

वो अपने घर के दरीचों से झाँकता कम है
तअल्लुका़त तो अब भी हैं मगर राब्ता कम है

तुम उस खामोश तबीयत पे तंज़ मत करना
वो सोचता है बहुत और बोलता कम है

बिला सबब ही मियाँ तुम उदास रहते हो
तुम्हारे घर से तो मस्जिद का फ़ासिला कम है

फ़िज़ूल तेज़ हवाओं को दोष देता है
उसे चराग़ जलाने का हौसला कम है

मैं अपने बच्चों की ख़ातिर ही जान दे देता
मगर ग़रीब की जां का मुआवज़ा कम है

बहरे मुजास वा मुज्तस की मुज़ाहिफ़ शक्ल:
मु'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन मु'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112

गज़ल

ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है
बेटे से समझौता करना पड़ता है

जब औलादें नालायक हो जाती हैं
अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है

सच्चाई को अपनाना आसान नहीं
दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है

जब सारे के सारे ही बेपर्दा हों
ऐसे में खु़द पर्दा करना पड़ता है

प्यासों की बस्ती में शोले भड़का कर
फिर पानी को महंगा करना पड़ता है

हँस कर अपने चहरे की हर सिलवट पर
शीशे को शर्मिंदा करना पड़ता है

पाँच फ़ेलुन+एक फ़े

गज़ल

दिल धड़कता है तो आती हैं सदाएँ तेरी
मेरी साँसों में महकने लगी साँसें तेरी

चाँद खु़द महवे-तमाशा था फ़लक पर उस दम
जब सितारों ने उतारीं थीं बलाएँ तेरी

शे’र तो रोज़ ही कहते हैं ग़ज़ल के लेकिन
आ! कभी बैठ के तुझसे करें बातें तेरी

ज़हनो-दिल तेरे तस्व्वुर से घिरे रहते हैं
मुझको बाहों में लिए रहती हैं यादें तेरी

क्यों मेरा नाम मेरे शे’र लिखे हैं इनमें
चुग़लियाँ करती हैं मुझसे ये किताबें तेरी

बेख़बर ओट से तू झाँक रहा हो मुझको
और हम चुपके से तस्वीर बना लें तेरी

रमल की मुज़ाहिफ़ सूरत
फ़ाइलातुन फ़’इ’लातुन फ़’इ’लातुन फ़ालुन
2122 1122 1122 22

ग़ज़ल

सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुर्रत और बढ़ती है
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है

मेरी कमज़ोरियों पर जब कोई तनक़ीद करता है
वो दुशमन क्यों न हो उस से मुहव्बत और बढ़ती है

अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक़सर
न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है

बहरे-हज़ज सालिम

चंद अशआर-

अँधेरा ही अँधेरा छा गया है
सवेरा भी उजाला खा गया है

मीं वालों की ओछी हरक़तों पर
समंदर को भी गुस्सा आ गया है

एक खूबसूरत नज़्म देवबन्दी साहब की ज़ुबानी -




कुछ और शे’र-

ज़्में-दिलनवाज़ हो जाती
तुम मेरे शे’र गुनगुनाते तो

तो दिलनवाज़ दुशमन को
दोस्तों में शुमार करते हैं

जो झूठ बोलके करता है मुत्मइन सबको
वो झूठ बोलके ख़ुद मुत्मइन नहीं होता

बुझते हुए दीये पे हवा ने असर किया
माँ ने दुआएँ दीं तो दवा ने असर किया

जो तेरे साथ रहके कट जाए वो सज़ा भी सज़ा नहीं लगती
जिसने माँ-बाप को सताया हो उसे कोई दुआ नहीं लगती

धू को साया ज़मीं को आस्मां करती है माँ
हाथ रखकर मेरे सर पर सायाबां करती है माँ

मेरी ख़्वाहिश और मेरी ज़िद्द उसके क़दमों पर निसार
हाँ की गुंज़ाइश न हो तो फिर भी हाँ करती है माँ

नहाई का जश्न मनाता रहता हूँ
ख़ुद को अपने शे’र सुनाता रहता हूँ

वो भाषण से आग लगाते रहते हैं
मैं ग़ज़लों से आग बुझाता रहता हूँ

ज़न्नत की कुन्जी है मेरी मुठ्ठी में
अपनी माँ के पैर दबाता रहता हूँ

नोट: आप नवाज़ देवबन्दी साहब का ग़ज़ल संग्रह" पहली बारिश" का हिंदी या उर्दू संस्करण यहाँ फोन करके हासिल कर सकते हैं-09045631819

16 comments:

तिलक राज कपूर said...

शायरी का इल्‍म ही काफ़ी नहीं, कहन की तहज़ीब, ग़ज़ल से खेलने की तमीज़ और शब्‍दों को पिरोने की तरकीब भी जरूरी है अच्‍छी शायरी के लिये और जहॉं नवाज़ देवबन्‍दी हों ये सब एक साथ न हों ये हो नहीं सकता।
एक एक शेर पुख्‍़ता सबूत है नवाज़ देवबन्‍दी साहब की शायरी का।

इस्मत ज़ैदी said...

जनाब नवाज़ देवबंदी साहब किसी त’आरुफ़ के मोहताज नहीं ख़ूब्सूरत और उम्दा ग़ज़लें उन की पहचान हैं ,

वैसे तो हम वही हैं जो पहले थे दोस्तो
हालात जैसे पहले थे वैसे नहीं रहे

खु़द मर गया था जिनको बचाने में पहले बाप
अबके फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे

दरिया उतर गया है मगर बह गए हैं पुल
उस पार आने-जाने के रस्ते नहीं रहे


बहुत ख़ूब ,लाजवाब

मैं अपने बच्चों की ख़ातिर ही जान दे देता
मगर ग़रीब की जां का मुआवज़ा कम है

लासानी शेर

प्यासों की बस्ती में शोले भड़का कर
फिर पानी को महंगा करना पड़ता है

सुबहान अल्लाह

अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अकसर
न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है

बेनज़ीर ,हक़ीक़त बयानी का ये अंदाज़ भी नवाज़ साहब की ही ख़ुसूसियत है

बहुत बहुत शुक्रिया अच्छी ग़ज़लें पढ़्वाने के लिए

kavi kulwant said...

देवबंदी जी को पढ़ना बहुत सुखद रहा...
सतपाल जी का भी शुक्रिया...

रंजन गोरखपुरी said...

खु़द मर गया था जिनको बचाने में पहले बाप
अबके फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे

दरिया उतर गया है मगर बह गए हैं पुल
उस पार आने-जाने के रस्ते नहीं रहे

बिला सबब ही मियाँ तुम उदास रहते हो,
तुम्हारे घर से तो मस्जिद का फासिला कम है

सादे शब्दों से शायर कितनी गहरी चोट कर सकता है ये नवाज़ साहब के शेरों से स्पष्ट है!

सुलभ § सतरंगी said...

शुक्रिया.

नीरज गोस्वामी said...

सतपाल आपका शुक्रिया किन लफ़्ज़ों में अदा करूँ?...एक से बढ़ कर एक खूबसूरत और बेशकीमती अशआर पढने का मौका दिया है आपने...वाह... देवबंदी साहब की शायरी यक़ीनन बा कमाल है...उनकी किताब मंगवाने की जुगत अभी बिठाता हूँ...
नीरज

देवमणि पाण्डेय said...

देवबंदी साहब की शायरी अच्छी लगी। मगर-

खु़द मर गया था जिनको बचाने में पहले बाप
अबके फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे

हम शायरी के क़द्रदानों को नवाज़ देवबन्‍दी से यह सवाल पूछना चाहिए कि हम इसे अच्छा शेर क्यों मानें ? किसी अख़बार में अगर यह ख़बर छपी हो कि पहले फ़साद में बाप और दूसरे फ़साद में बच्चे मारे गए तो इस मंज़र को ज्यों का त्यों रख देने से क्या शायरी हो गई ? फिर शायर ने इसमें जोड़ा क्या ? मुझे लगता है कि कोई ख़बर अगर अख़बार से बाहर निकलकर ज़िंदगी के फलसफ़े से जुड़ती है तभी अच्छे शेर की शक्ल अख़्तियार करती है । इस बारे में आप लोग कुछ कहना चाहेंगे ?

- देवमणि पाण्डेय (मुम्बई)

तिलक राज कपूर said...

मैं देवमणि भाई द्वारा उठाये गये प्रश्‍न के विवाद से अलग रहते हुए एक प्रश्‍न कर रहा हूँ कि एहसास कहॉं से आता ? क्‍या एहसास की जड़ में अख़बार की कोई ख़बर नहीं हो सकती ? क्‍या इस शेर में जि़न्‍दगी का फ़लसफ़ा अनुपस्थित है? शेर को फिर से देखें, शेर साफ़ साफ़ कह रहा है कि'न तुम बचाने वाले, न तुम मिटाने वाले'।
देवमणि भाई आ तो खुद अच्‍छे शायर हैं, इस शेर में उतर कर देखिये, अख़बार की ख़बरें लोग भूल जाते हैं, शेर जिन्‍दा रहते हैं और किसी घटना को शेर के रूप में पिरोना गुनाह तो नहीं।
भाई आपके प्रस्‍ताव से मेरी सहमति तो नहीं है।

kumar zahid said...

अंजाम उसके हाथ है आग़ाज़ कर के देख
भीगे हुए परों से ही परवाज़ कर के देख

सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे

खु़द मर गया था जिनको बचाने में पहले बाप
अबके फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे


तुम उस खामोश तबीयत पे तंज़ मत करना
वो सोचता है बहुत और बोलता कम है

सच्चाई को अपनाना आसान नहीं
दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है

प्यासों की बस्ती में शोले भड़का कर
फिर पानी को महंगा करना पड़ता है

बुझते हुए दीये पे हवा ने असर किया
माँ ने दुआएँ दीं तो दवा ने असर किया

तनहाई का जश्न मनाता रहता हूँ
ख़ुद को अपने शे’र सुनाता रहता हूँ


ज़न्नत की कुन्जी है मेरी मुठ्ठी में
अपनी माँ के पैर दबाता रहता हूँ










कुछ कहे बगैर इन तमाम गज़लों को , उनके सलीक़े को और उनकी आला जहजीब को बस सलाम करता हूं
सतपाल जी आपका खास शुक्रिया! आप नायाब हीरे अपने ग़ज़ल-नौलखा में जड़ रहे हैं

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi said...

DilnasheeN haiN nawaaz ki ghazleiN
Jin meiN hai zindagi ka soz o saaz

Rooh parvar hai un ka husn e bayaaN
Jo hai un ke zameer ki aawaaz

Fikr o fun meiN hai um ke rooh e sukhan
HaiN ayaaN jis se sab nasheb o faraaz
MahfilooN meiN hain woh bahut maqbool
Kaamyaabi ka unki hai yeh raaz

Pesh karte haiN woh haqeeqat e haal
Shairi meiN hai unki soz o gudaaz

Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi
598/9,Zakir Nagar,New Delhi-110025

सतपाल ख़याल said...

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दंगे-फ़साद, लूट-पाट, हत्या, धोखाधड़ी की ख़बरें इतनी आम सी हो गईं हैं कि हम सुबह
का नाश्ता इन ख़बरों के साथ करते हैं लेकिन संवेदनहीनता इतनी बढ़ गई है कि हम खुशी-खुशी, बातें करते हुए , चाय की चुस्कियां लेते हुए
इन ख़बरों को सुनते हैं और मैं तो ये कहता हूँ हम आजकल इन ख़बरों से रोमांचित होने लगे हैं। ये आज के दौर की त्रासदी है।
देवमणि साहब ने जो इस शे’र के बारे में कहा-
खु़द मर गया था जिनको बचाने में पहले बाप
अबके फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे
शे’र तो लासानी है।और ये बहुत मक़बूल शे’र है।
कभी-कभी ऐसा हो जाता है। आप किस वक्त, किस मनोस्थित में शे’र पढ़ते हैं, ये भी मायने रखता है।
बशीर साहब के ये शे’र इसी बात पर आप सब की नज़्र
इन लफ़्ज़ों की चादर सरकाओगे तो देखोगे
एहसास के घूंघट में शर्माई हुई ग़ज़ल

देवमणि पाण्डेय said...

भाई तिलक राज कपूर की असहमति का स्वागत है। लेकिन सभी मित्रों से मैं यह निवेदन करूँगा कि इसे विवाद के रूप में न लेकर विमर्श के रूप में लें ताकि हम एक दूसरे से कुछ सीख सकें। तिलक जी का कहना सही है कि किसी घटना को शेर के रूप में पिरोना गुनाह तो नहीं। जब से दुनिया बनी है तभी से घटनाएं घट रही हैं और उन पर शायरी भी हो रही है। किसी घटना से गुज़रकर ही ग़ालिब ने कहा होगा-

ज़िंदगी अपनी जब इस हाल में गुज़री ग़ालिब
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे

मैं समझता हूँ कि किसी घटना को अपना तजुर्बा बनाकर शेर के रूप में ढालना ही तो शायर का हुनर है। देवबंदी जी ने हादसे की ख़बर तो हमें दे दी लेकिन वे ख़ुद इसमें कहाँ हैं ? हिंदुस्तान का विभाजन एक घटना है लेकिन शायरी तब है जब यह शायर के एहसास का हिस्सा बने। अहसन अली ख़ाँ (पाकिस्तान) का इस घटना पर एक शेर है-

इस अजनबी जहाँ में हमको कहीं शनासा
दुश्मन भी गर मिला है रोकर लिपट गए हैं

भ्रष्टाचार की ख़बरें तो रोज़ ही अख़बार में छपती हैं मगर दुष्यंत कुमार ने क्या लिखा-

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

अख़बार की ख़बर पर आधारित शेर हासिले-मुशायरा तो हो सकता है लेकिन किताब में उसकी क्या अहमियत होगी , इस पर ख़ुद शायर को ग़ौर करने की ज़रूरत है। जोश मलीहाबादी की लाइने हैं-

जिस शेर पे मुशायरे में मिलती है दाद
वो शेर मेरी नज़र से गिर जाता है

जहाँ तक मुझे याद है , जाँ निसार अख़्तर ने कहा है-

हमसे पूछो कि ग़ज़ल क्या है ! ग़ज़ल का फ़न क्या
चंद लफ़्जों में कोई आग छुपा दी जाए

यहाँ भी चंद लफ़्जों में आग छुपाने पर ज़ोर दिया गया है। नवाज़ देवबंदी जी हमारे सीनियर शायर हैं। ऐसे शायरों को पढ़कर और सुनकर ही हम अपना रास्ता बनाते हैं। उन्हें ऐसे मुद्दों पर ग़ौर करना चाहिए। और भाई सतपाल यह भी बशीर बद्र साहब का ही शेर है-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

-देवमणि पाण्डेय (मुम्बई)

सतपाल ख़याल said...

अगर इस संवाद का विश्लेषण करें तो देवमणि जी को यूँ लग रहा है कि-
मानो जैसे कोई ख़बर हो कि-
पिछ्ले दंगों में बाप मारा गया और अबके दंगों में वो बच्चे ..लेकिन मुझे तो ये लगता है कि शायर ने इस एहसास को ओढ़कर बहुत अच्छा शे’र कहा है-
खु़द मर गया था जिनको बचाने में पहले बाप
अबके फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे

अगर इस मौज़ू पर किसी को शे’र कहने के लिए कहा जाए तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है।हर शायर का अंदाज़े-बयां जुदा होता है और कुछ पर्दादारी में शे’र कहते हैं, कुछ खास चुट्कीले अंदाज़ में, कुछ नये शब्दों पर प्रयोग करते हैं।हाँ ऐसा आप कह सकते हैं कि शिल्पकारी कम है। बाक़ी हो सकता है कि मैं ग़ल्त कह रहा होऊं, लेकिन शे’र असर तो छोड़ता है-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में..ये शे’र तो माशाअल्लाह अच्छा है ही।

देवमणि पांडेय जी बहुत अच्छे शायर और गीतकार हैं और शायरी की तमाम बारीकियों से वाकि़फ़ हैं ,उनके लिए बशीर साहब का ये शे’र अर्ज़ है कि-

वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे
चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे

उन्हें शायद मनमाफ़िक शे’र न लगा हो। ऐसा हो सकता है और अकसर होता है। अच्छे-अच्छे शायरों के कई शे’र कई बार बाल नोचते नज़र आते हैं लेकिन ये शे’र मुझे अच्छा लगा बाक़ी रब जाने।

देवमणि पाण्डेय said...

http://devmanipandey.blogspot.com/

Devi Nangrani said...

Lajawaab Shayri hai Janab Nawaz Devbanadin saheb ji ki jise padwane ke liye Is manch v satpal ji ji bahri hai hum sabhi ghazal premi..
O shahar jaane valo ye boodhe shahar n bech
mumkin hai lautna pade gaaon ka ghar n bech

ati sunder jazbaat bhavnatmak abhivyakti mein..

krishna chandra said...

अब्दुल्लाह जी का बहुत शुक्रिया.......

मैंने जितनी भी गज़लें सुनी हैं आज तक उनमें नव़ाज देवबंदी साहब की गज़लों में समाज को लेकर, मुहब्बत, देश, दुनिया और आपसी रिश्तों पर जो बेबाकी है वह कहीं और किसी की गज़ल में बहुत कम देखने को मिलता है, आप से गुजारिश है कि जब नया एडिशन 'पहली बारिश' का मुकम्मल हों मुझ तक जरूर पहुचायें मैं आपका एहसानमंद रहूंगा......

केसी सोनकर,
1066/1 अहियापुर,रायबरेली
09450047235