Friday, April 23, 2010

प्रेमचंद सहजवाला - परिचय और ग़ज़लें














18 दिसम्बर 1945 को जन्मे प्रेमचंद सहजवाला हिंदी के चर्चित कथाकार हैं। इनके अब तक तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । बहुत सी पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं और आप अच्छे शायर भी हैं। इनकी दो ग़ज़लें आपकी नज़्र कर रहा हूँ-

एक

ज़िन्दगी में कभी ऐसा भी सफ़र आता है
अब्र इक दिल में उदासी का उतर आता है

शहृ में खु़द को तलाशें तो तलाशें कैसे
हर तरफ भीड़ का सैलाब नज़र आता है

अजनबीयत सी लिपटती है बदन से उस के
रोज़ जब शाम को वो लौट के घर आता है

पहले दीवानगी के शहृ से तारुफ़ रक्खो
बाद उस के ही मुहब्बत का नगर आता है

दो घड़ी बर्फ के ढेरों पे ज़रा सा चल दो
संगमरमर सा बदन कैसे सिहर आता है

जिस के साए में खड़े हो के मेरी याद आए
क्या तेरी राह में ऐसा भी शजर आता है

रमल की मुज़ाहिफ़ सूरत
फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फेलुन

दो

हो गए हैं आप की बातों के हम मुफ़लिस शिकार
है खिज़ां गुलशन में फिर भी लग रहा आई बहार

रोशनी दे कर मसीहा ने चुनी हँस कर सलीब
रोशनी फिर रौंदने आए अँधेरे बेशुमार

रहबरों के हाथ दे दी ज़िन्दगी की सहरो-शाम
ज़िन्दगी पर फिर रहा कोई न अपना इख़्तियार

मिल नहीं पाते नगर की तेज़ सी रफ़्तार में
याद आते हैं वही क्यों दोस्त दिल को बार बार

जिन के साए में लिखी रूदादे-उल्फ़त वक़्त ने
हो गए हैं आज वो सारे शजर क्यों शर्मसार

रमल की मुज़ाहिफ़ सूरत
फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

12 comments:

नीरज गोस्वामी said...

प्रेमचंद जी की दोनों ग़ज़लें बेहद कमाल की हैं और उनके ख्यालों को पुख्तगी से पेश करती हैं...आप का बहुत बहुत शुक्रिया ऐसे नायाब शायरों की ग़ज़लें पढवाने के लिए...
नीरज

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi said...

हैँ सहजवाला की यह ग़ज़लेँ नेहायत शानदार
है उरूस-ए –शायरी का हुस्न जिन से आशकार
है सभी अशआर से ज़ाहिर शऊर-ए-फिक्रो फन
गुलशन-ए-उर्दू मेँ उनकी ज़ात है मिसल-ए-बहार
अहमद अली बर्क़ी आज़मी

तिलक राज कपूर said...

ज़िन्दगी में कभी ऐसा भी सफ़र आता है
अब्र इस दिल में उदासी का उतर आता है
और
शहृ में खु़द को तलाशें तो तलाशें कैसे
हर तरफ भीड़ का सैलाब नज़र आता है।
क्‍या बात कही साहब। जिस सहजता से आपने गंभीर सोच ग़ज़ल के अशआर में पिरोई है उससे आपका सहजवाला होना सार्थक हो गया। बधाई।

Shekhar Kumawat said...

wow !!!!!!!!

bahut khub


shkehar kumawat

रंजना [रंजू भाटिया] said...

दोनों ही गजले बहुत ही बेहतरीन है ताजगी है इन में ..शुक्रिया इनको पढवाने के लिए ..

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

इतनी खूबसूरत ग़ज़ल से रु ब रु करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !
अजनबीयत सी लिपटती है बदन से उस के
रोज़ जब शाम को वो लौट के घर आता है
बेहतरीन शेर है !
जिन के साए में लिखी रूदादे-उल्फ़त वक़्त ने
हो गए हैं आज वो सारे शजर क्यों शर्मसार
क्या बात है !

chandrabhan bhardwaj said...

Bhai Prem chand Sahazwala ki dono hi ghazale bahut achchhi-
jiske saaye men khade hoke meri yaad aaye,
kya teri raah men aisa bhi shajar aataa hai
bahut sunder, Satpal bhai aapko shukriya aur Sahajwala ji ko badhai.

sumita said...

शहृ में खु़द को तलाशें तो तलाशें कैसे
हर तरफ भीड़ का सैलाब नज़र आता है।
vaah! vaah!vaah! kya bat hai,premji itni khubsurat gazhal ab tak kahan chupa rakhi tahee. dono hi badi pyari hain. bahut-bahut badhai apko sunder rachanao ke liye.

mamta said...

dono hi gazlein bahut khoob...badhai....

mamta kiran

शिव कुमार "साहिल" said...

दोनों ही गजले बहुत ही खूबसूरत है ..शुक्रिया

अनूप भार्गव said...

>जिस के साए में खड़े हो के मेरी याद आए
>क्या तेरी राह में ऐसा भी शजर आता है

बहुत खूब ......

बेहतरीन गज़ल

Deepali Sangwan said...

uncle, aapko yahan dekha khushi hui, us se bhi jyada khushi hui aapki behtareen gazlein padh kar.. bahut nayaab gazlein kahi hain. daad kubool karein