Monday, May 10, 2010

कौन चला बनवास रे जोगी- पहली क़िस्त












"कौन चला बनवास रे जोगी" राहत इन्दौरी साहब की ग़ज़ल से लिए इस मिसरे पर कई शायरों ने ग़ज़लें कहीं है या यों कहो कि राहत साहब की ज़मीन पर शायरों ने हल चलाने की हिम्मत की है। कई ग़ज़लें आईं है जो कि़स्तों मे पेश की जाएँगी।पहले हाज़िर हैं दो ग़ज़लें-

एम.बी.शर्मा "मधुर"

यूँ लेकर सन्यास रे जोगी
आएँ न भगवन पास रे जोगी

मन का द्वार न खुल पाया तो
वन भी कारावास रे जोगी

रावण आज अयोध्या में जब
राम ले क्यूँ बनवास रे जोगी

जो दुनिया से भागा उसपे
कौन करे विश्वास रे जोगी

युग बीते जो मिट न सकी वो
जीवन अनबुझ प्यास रे जोगी

जो ख़ुद से ही हारा उसको
कौन बँधाए आस रे जोगी

इंसानों में ज़ह्र जब इतना
साँपों में क्या ख़ास रे जोगी

सत्य ‘मधुर’ भी कड़वा लगता
आए किसको रास रे जोगी

पवनेंद्र "पवन"

बाहर योग-अभ्यास रे जोगी
भीतर भोग-विलास रे जोगी

रात सुरा यौवन की महफ़िल
दिन को है उपवास रे जोगी

घर में चूल्हे-सी,जंगल में
दावानल-सी प्यास रे जोगी

सन्यासी के भेस में निकला
इन्द्रियों का दास रे जोगी

झोंपड़ छोड़ महल में रहना
ये कैसा सन्यास रे जोगी

मर्यादा को बंधन समझा
घर को कारावास रे जोगी

लोग हैं जितने ख़ास वतन में
उन सब का तू ख़ास रे जोगी

घर सूना कर ख़ूब रचाता
वृंदावन में रास रे जोगी

जब सुविधाएँ पास हों सारी
सब ऋतुएँ मधुमास रे जोगी

दूर ‘पवन’ को अब भी दिल्ली
तेरे बिल्कुल पास रे जोगी

14 comments:

navneet sharma said...

तरही मुशायरे के लिए जनाब सतपाल जी और आदरणीय द्विज का आभार। इस जमीन पर अच्‍छे फूल उगाए गए हैं। पहली किस्‍त में दो शयरों का कलाम अच्‍छा है। जो अश्‍आर अच्‍छे लगे वे यूं हैं :

जनाब एम.बी.शर्मा "मधुर" :

मन का द्वार न खुल पाया तो
वन भी कारावास रे जोगी

श्री पवनेंद्र "पवन"

रात सुरा यौवन की महफ़िल
दिन को है उपवास रे जोगी

लोग हैं जितने ख़ास वतन में
उन सब का तू ख़ास रे जोगी

सबसे अच्‍छा शे'र है यह :

दूर ‘पवन’ को अब भी दिल्ली
तेरे बिल्कुल पास रे जोगी

आशा है इसी प्रकार अच्‍छा कलाम पढ़ने को मिलेगा।

तिलक राज कपूर said...

Gysn aur Kataksh dono kaa put liye achhi shurooaat hei.

kavi kulwant said...

o ghazalon ki khoobsurati dekhate hi banati hai..
bahut khoob...
ati sundar

MUFLIS said...

राहत साहब ,,, ग़ज़ल किसी भी ज़मीन पर कहें
उसे लेकर कुछ अश`आर कहने की कोशिश करना
खुद अपने आप को आज़माईश में डालने वाली ही बात होगी
लेकिन ....अब तर`ही मिसरा दिया गया है ,, तो
मधुर जी और पवन जी दोनों ने ही कामयाब कोशिशें की हैं
मधुर जी के ये शेर ....
"मन का द्वार न खुल पाया तो
वन भी कारावास रे जोगी "
"जो खुद से ही हारा, उसको
कौन बँधाए आस रे जोगी"
बहुत ज़्यादा पसंद आये.....
और पवन जी के अश`आर ...
"जब सुविधाएं पास हो सारी
सब ऋतुएं मधुमास रे जोगी"
"रात सुरा-यौवन की महफ़िल
दिन को है उपवास रे जोगी"
बहुत अछे और असरदार हैं
बधाई .

girish pankaj said...

achchhi shuruaat hui hai. badhai shayaron ko.

kumar zahid said...

एम.बी.शर्मा "मधुर"

मन का द्वार न खुल पाया तो
वन भी कारावास रे जोगी
जो दुनिया से भागा उसपे
कौन करे विश्वास रे जोगी
जो ख़ुद से ही हारा उसको
कौन बँधाए आस रे जोगी

पवनेंद्र "पवन"
घर में चूल्हे-सी,जंगल में
दावानल-सी प्यास रे जोगी
झोंपड़ छोड़ महल में रहना
ये कैसा सन्यास रे जोगी
घर सूना कर ख़ूब रचाता
वृंदावन में रास रे जोगी
जब सुविधाएँ पास हों सारी
सब ऋतुएँ मधुमास रे जोगी



बहुत अच्छा चित्रण

योगेन्द्र मौदगिल said...

दोनों ग़ज़लें बढ़िया हैं.....

dheer said...

मन का द्वार न खुल पाया तो
वन भी कारावास रे जोगी !

यूँ लेकर सन्यास रे जोगी
आएँ न भगवन पास रे जोगी!

bahut khoob!
Madhur saHeb aur Pavan ji ko badhaayii!

-Dheeraj Ameta "Dheer"

Devi Nangrani said...

Gazal ka har misra ek nazuk khayal ko prastuk kar raha hai. vaise bhi choti beher ki gazal mein radeef bahut kam shabdon ke liye soch ko sochne par majboor karta hai..
Bahut abhibhut karta prayaas

वीनस केशरी said...

बेहतरीन आगाज हुआ है

मन का द्वार न खुल पाया तो
वन भी कारावास रे जोगी

बाहर योग-अभ्यास रे जोगी
भीतर भोग-विलास रे जोगी

रात सुरा यौवन की महफ़िल
दिन को है उपवास रे जोगी


वाह मज़ा आ गया

सुलभ § सतरंगी said...

तरही की ये दोनों ग़ज़लें बहुत पसंद आई.

जनाब एम.बी.शर्मा "मधुर" और श्री पवनेंद्र "पवन" जी को बधाई.

प्रकाश बादल said...

किस शेर को सराहूँ किसे छोड़ दूँ। वाह दोनों ग़ज़लें एक से बढ़कर एक। भाई पवनेन्द्र की ग़ज़ल काफी समय बाद पढ़ी। उनकी धार आज भी वही पैनापन लिए है उन्हें मेरी बधाई।
दूर पवन को अब भी दिल्ली,
तेरे बिल्कुल पास रे जोगी। बहुत खूब वाह!

नीरज गोस्वामी said...

मन का द्वार न खुल पाया तो

वन भी कारावास रे जोगी

जो ख़ुद से ही हारा उसको
कौन बँधाए आस रे जोगी

एम्.बी.शर्मा

सन्यासी के भेस में निकला
इन्द्रियों का दास रे जोगी

जब सुविधाएँ पास हों सारी
सब ऋतुएँ मधुमास रे जोगी

पवनेन्द्र पवन


क्या खूबसूरत ग़ज़लें पढवाई हैं आपने सतपाल जी वाह...दोनों शायरों ने कमाल के शेर कहे हैं...मेरी दिली दाद उनतक पहुंचा दें..वाह...
नीरज

गौतम राजरिशी said...

बेहतरीन तरही दोनों की दोनों....