Tuesday, June 22, 2010

अनमोल शुक्ल और वीरेन्द्र जैन की ग़ज़लें

1957 में हरदोई(उ.प्र) में जन्में अनमोल शुक्ल पेशे से सिविल इंजीनियर हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। इनकी इस ग़ज़ल ने मुझे बहुत प्रभावित किया जिसे आज हम पेश करेंगे। अच्छे शे’र की बड़ी सीधी सी पहचान है कि इन्हें सुनकर बरबस मुँह से वाह निकल जाती है। एक ग़ज़ल संग्रह भी आपका शाया हो चुका है जिसे ये जल्द मुझ तक पहुँचा रहे हैं तो फिर कुछ और ग़ज़लों इसी मंच पर सांझा करेंगे। इनकी कई ग़ज़लें ग़ज़ल संकलनों में शामिल की गईं हैं। "ग़ज़ल दुश्यंत के बाद" में भी कुछ ग़ज़लें शाया हो चुकी हैं। सो मुलाहिज़ा कीजिए ये खूबसूरत ग़ज़ल-

अनमोल शुक्ल

आपने किस्मत में मेरी क्यों लिखा ऐसा सफ़र
मोम की बैसाखियां और धूप में तपता सफ़र

हमसफ़र,हमराज़ हो,हमदर्द हो या हमख़याल
फिर तो कट जाता है मीलों दूर तक लंबा सफ़र

भीड़ चारों ओर जितनी है यहाँ रह जाएगी
मुझको भी करना पड़ेगा एक दिन तनहा सफ़र

मंज़िलों की, काफ़िलों की, हौसलों की बात कर
क्या हुआ जो बीच रस्ते में तेरा टूटा सफ़र

जिन परिंदों के परों के हौसले ज़ख्मी रहे
उनसे हो पाया न कोई भी, कभी ऊँचा सफ़र

मुश्किलों, दुश्वारियों से जूझते "अनमोल" ने
जितना भी काटा है हँसकर, बोलकर काटा सफ़र

रमल की मुज़ाहिफ़ शक्ल
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212


अनमोल जी से आप इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं-09412146255

अब आज के दूसरे शायर हैं श्री वीरेन्द्र जैन इन्होंने बैंक निराक्षक के रूप में उत्तर प्रदेश में काम किया है। आप जनवादी लेखक संघ भोपाल की इकाई के अध्यक्ष भी रहे हैं और व्यंग्य की चार पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं और ग़ज़ल भी बाखूबी कहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद पूरे समय लेखन व पत्रकारिता में जुटे हुए हैं।
पिछले पोस्ट में सदा अम्बालवी की ग़ज़लें प्रकाशित की तो सोचा इस बार सबको मेल नहीं करूँगा , लोग चिड़ जाते हैं ऐसे स्पैम मेल से। जब कामेंट देखे तो तीन। द्विज जी कहने लगे ब्लाग तो अच्छा है लेकिन कामेंट ३ ही हैं। फिर अचानक ओशो की किताब पढ़ रहा था जिसमें एक रोचक कहानी थी कि एक बार एक इश्तिहार वाला किसी बड़ी कंपनी के मालिक के पास शाम के वक़्त विज्ञापन लेने गया तो मालिक ने कहा - भई हमारी कंपनी तो स्थापित हो चुकी है। हम क्यों विज्ञापन दें, तो थोड़ी देर बाद चर्च के घंटे की आवाज़ सुनाई दी तो वो आदमी तपाक से बोला हज़ूर ये चर्च कोई २०० साल पुरानी है लेकिन फिर भी घंटा बजा के चेताती है कि आ जाइए। सो यहाँ भी कुछ ऐसा ही है मेल करना भी घंटा बजाने जैसा ही है। प्रसार के साथ-साथ प्रचार भी ज़रूरी है। खैर मुलाहिज़ा कीजिए वीरेन्द्र जी की ये ग़ज़ल

वीरेन्द्र जैन

हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
उधेड़ा रात भर दिन भर बुना है

न हो संगीत सन्नाटा तो टूटे
गज़ल के नाम पर इक झुनझुना है

समझते खूब हो नज़रों की भाषा
मिरा अनुरोध फिर क्यों अनसुना है

तुम्हारे साथ बीता एक लम्हा
बकाया उम्र से लाखों गुना है

जहाँ पर झील में धोया था चेहरा
वहाँ पानी अभी तक गुनगुना है

हज़ज की मुज़ाहिफ़ शक्ल
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122

शायर का पता:
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल (म.प्र) 462023
फोन 0755-2602432 मोबाइल 9425674629
Email- j_virendra@yahoo.com

22 comments:

सुलभ § Sulabh said...

अनमोल शुक्ल जी के जो शेर पसंद आये...

हमसफ़र,हमराज़ हो,हमदर्द हो या हमख़याल
फिर तो कट जाता है मीलों दूर तक लंबा सफ़र

मंज़िलों की, काफ़िलों की, हौसलों की बात कर
क्या हुआ जो बीच रस्ते में तेरा टूटा सफ़र

वीरेंद्र जैन जी का व्यंग्य पढ़ा है, पर आज की यह ग़ज़ल तो बहुत ख़ास है.

तुम्हारे साथ बीता एक लम्हा
बकाया उम्र से लाखों गुना है

जहाँ पर झील में धोया था चेहरा
वहाँ पानी अभी तक गुनगुना है

वाह !! बहुत खूब !!

Maria Mcclain said...

interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this site to increase visitor.Happy Blogging!!!

अमिताभ मीत said...

शुक्रिया .... शुक्रिया .... इन ख़ूबसूरत के लिए शुक्रिया !!

हिमान्शु मोहन said...

अच्छी ग़ज़लें पढ़वाने का शुक्रिया। कई अश'आर बहुत-बहुत अच्छे हैं।
और टिप्पणी का ग़म न कीजिये - मैं आपके यहाँ अक्सर आता रहता हूँ, टिप्पणी नहीं करता - सो अब ध्यान रखूँगा।

नीरज गोस्वामी said...

सतपाल जी जिंदाबाद...क्या अशार पढवाएं हैं आपने...वाह वाह वा...आज तो सुबह सुबह आंनद वर्षा हो गयी...अनमोल जी की ग़ज़ल का मतला और पहला शेर अपने साथ साथ लिए जा रहा हूँ...लाजवाब ग़ज़ल कही है उन्होंने....उन्हें फोन करके बधाई देता हूँ...
जैन साहब की छोटी बहर की ग़ज़ल ने दिल लूट लिया झुनझुना और गुनगुना वाले शेर तो क़यामत ढ़ा रहे हैं...
ऐसे नायाब शायरों की ग़ज़लें हम तक पहुँचाने का जो नेक काम आप कर रहे हैं उसका कोई मुकाबला नहीं है...ऐसा काम कोई फ़रिश्ता ही कर सकता है...वाह...इस नेक काम के बदले खुदा आपको दुनिया की हर ख़ुशी अता करे...आमीन.
नीरज

सुभाष नीरव said...

सही कहा है ख़याल साहिब आपने कि अच्छी ग़ज़ल या अच्छा शे'र वही है जो बरबस मुँह से 'वाह' निकलवा दे। अनमोल शुक्ल और वीरेन्द्र जैन की इन दोनों ग़ज़लों में यह खूबी है।

आपने किस्मत में मेरी क्यों लिखा ऐसा सफ़र
मोम की बैसाखियां और धूप में तपता सफ़र
(अनमोल शुक्ल)

हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
उधेड़ा रात भर दिन भर बुना है
(वीरेन्द्र जैन)

इन्हें पढ़कर या सुनकर सचमुच मुँह से दाद निकल जाती है।

सतपाल ख़याल said...

जब बात अच्छे शायरों और अदबशनासों तक पहुँच रही हो तो एक-आध टिप्पणी भी काफ़ी है। सुभाष जी , अमिताभ जी और नीरज जी जैसे अदीब जिस अंजुमन में विराजमान हों तो भीड़ की क्या ज़रूरत।

तिलक राज कपूर said...

अनमोल जी ने एक बेहतरीन शेर दिया है, उसका जवाब शेर में ही देना चाहूँगा कि:
वो ही जाने किसलिये उसने लिखा ऐसा सफ़र
मोम की बैसाखियॉं और जेठ का तपता सफर।
पहली बार पढ़ा है अनमोल जी को, अच्‍छे शेर कहते हैं।
वीरेन्‍द्र जैन जी के शेर:
हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
उधेड़ा रात भर दिन भर बुना है
में उधेड़बन मुहावरे का प्रयोग बहुत खूबसूरत है वहीं
समझते खूब हो नज़रों की भाषा
मिरा अनुरोध फिर क्यों अनसुना है
में बहुत खूबसूरत प्रश्‍न है।

chandrabhan bhardwaj said...

Bhai Satpal ji
Anmol Shukla aur Veerendra Jain donon ki ghazalen bahut sunder hain khaskar anmol Shukla ka matala to achchha ban pada hai Apko aur donon shayaron ko hardik badhai

sanu shukla said...

umda prastuti..

देवमणि पाण्डेय said...

अनमोल शुक्ल और वीरेन्द्र जैन दोनों की ग़ज़लें काबिले-तारीफ़ हैं।

देवमणि पाण्डेय

Dr.Ajmal Khan said...

इस बार की पोस्ट मे अनमोल शुक्ल जी और वीरेंद्र जैन जी, दोनो ही की ग़ज़लें बेहद खूबसूरत है.
सतपाल जी अच्छी ग़ज़लें पढ़वाने का शुक्रिया।
आप का ये काम काबिले दाद है.
मुबारकबादी क़ुबूल किजिये........

वीरेन्द्र जैन said...

बुन्देली में एक शब्द आता है "लगेठा" इसका एक अर्थ उन लोगों की पहचान कराता है जो बिना बुलाये किसी खास मेहमान के साथ लग कर दावत जीम आते हैं। [आप चाहें तो इन्हें अमर सिंह कह सकते हैं} वैसे ही मैं भी अनमोल शुक्ल जैसे बेहतरीन गज़लगो के साथ लग कर कुछ दाद बटोर सका उसके लिए आपको बधाई। मेरी घ्सीटी हुयी पंक्तियों में आपने बहर भी तलाश करके बता दी उसके लिए और भी धन्यवाद। अब मैं अपने मित्र अनवारे इस्लाम और राम मेश्राम को बताउंगा कि देखो भाई - हम भी गज़लगो की तरह पहचाने गये।

सतपाल ख़याल said...

वीरेन्द्र जी,
फलदार दरख्तों की टहनियाँ झुकी रहती हैं। इसीलिए आप ऐसा कह रहे हैं।आप ने शायद ग़ज़लें कम कहीं हैं लेकिन आप में अच्छे शायर वाली हर बात है और अच्छे इन्सान होने का परिचय आपकी हलीमी से मिल ही गया।अनवारे-इस्लाम साहब को मेरी तरफ़ से आदाब कहिएगा।
बाकी बहर का ज़िक्र मेरे जैसे नये शायरों के लिए है। जो शुरूआत में भाग खड़े होते हैं इनका नाम सुनकर। मैं भी बहुत भटका हूँ, कोई और न भटके इसके लिए ये एक कोशिश है-सिर्फ़ सीखने की..निरंतर सीखने की..
धन्यवाद

निर्मला कपिला said...

अनमोल जी के शेर बहुत अच्छे लगे
मंज़िलों की, काफ़िलों की, हौसलों की बात कर
क्या हुआ जो बीच रस्ते में तेरा टूटा सफ़र

जिन परिंदों के परों के हौसले ज़ख्मी रहे
उनसे हो पाया न कोई भी, कभी ऊँचा सफ़र
वाह क्या खूब कहा है
वीरेन्द्र जी ने भी कमाल के शेर घडे हैं
हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
उधेड़ा रात भर दिन भर बुना है

तुम्हारे साथ बीता एक लम्हा
बकाया उम्र से लाखों गुना है
इनकी जितनी तारीफ की जाये कम है। सतपाल जी पिछले दिनो बहुत व्यस्त रही इस लिये नियमित नही रह पाई मुझे तो मेल जरूर किया करें। धन्यवाद दोनो शायरों को बधाई।

चैन सिंह शेखावत said...

जहाँ पर झील में धोया था चेहरा
वहाँ पानी अभी तक गुनगुना है

behtareen ashaar h...dono hi ghazlen dil ko choo gai... satpal ji..aapka bahut bahut shukriya..

dwij said...

वाह-वाह
आज तो महफ़िल ख़ूब जमी है
.
भाई अनमोल शुक्ल और भाई वीरेन्द्र जैन की ग़ज़लों ने ख़ूब समा बाँधा है. बहुत ख़ूब.

भाई वीरेन्द्र जैन की ग़ज़ल का मतला:

हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
उधेड़ा रात भर दिन भर बुना है

तो बहुत ही उम्दा है.
अगर भाई अनमोल जी अगर इजाज़त दें तो उनके इस शेर :


भीड़ चारों और जितनी है यहाँ रह जाएगी
मुझको भी करना पड़ेगा एक दिन तनहा सफ़र

को मैं कुछ इस तरह पढ़ना
चाहता हूँ:

भीड़ चारों और जितनी है यहाँ रह जाएगी
सबको ही करना पड़ेगा एक दिन तनहा सफ़र

कृपया इसे इस्लाह न समझें. प्यार भरा अनुरोध ही समझें.

इन ख़ूबसूरत ग़ज़लों के लिए सतपाल जी को भी बधाई.

dwij said...

और हाँ

अनमोल जी के इस शेर में शब्द `चारों ओर '
कीजिए. यह टंक़ण त्रुटि है मैं भी इसे कापी पेस्ट कर गया.

PRAN SHARMA said...

JANAAB VEERENDRA JAIN AUR JANAAB
ANMOL SHUKLA KEE GAZALEN ACHCHHEE
LAGEE HAIN.JANAAB VEERENDRA JAIN
KAA MATLAA PADHAA TO MUJHE SURYA
BHANU GUPT KAA YE SHER YAAD AA
GAYAA HAI --
AESEE CHAADAR MILEE HAMEN GAM MEIN
SEE IDHAR TO UDHAR FATEE SAHIB
KABHEE -KABHEE DO SHAYRON KE
KHYAAL MIL JAATE HAIN.ANMOL SHUKL KE DO ASHAAR MERE GAZAL SANGARAH
" GAZAL KAHTA HOON " MEIN SHAMIL
MERE IN SHERON KE KITNE SAMEEP HAIN-
KAUN AKELA RAH KAR JAG MEIN
KARTAA HAI KUCHH HAASIL PYARE
SAATH NAHIN GAR SANGEE-SAATHI
HAR RASTAA HAI MUSHKIL PYARE
--------- ----------
KUCHH TO CHALO TUJHKO ANJANEE
RAAHON KEE PAHCHAAN HUEE HAI
KAESA RANJ , NIRASHA KAESEE
PAA N SAKAA JO MANZIL PYARE

सतपाल ख़याल said...

BAHUT ARSE BAAD AAP IS ANJUMAN ME AAYE HAIN. TAHE DIL SE AAP KA SWAGAT AUR SHUKRIA. AAP AUR MAHAVIR JI TO AB HAMEN AASHIRVAAD DENA HI BHOOL GAYE HAIN.

AAPKE AANE SE MEHFIL GULZAR HO GAYEE HAI.

THANKS

ओमप्रकाश यती said...

भाई अनमोल जी कि घज्लों का एक-एक शेर ताज़ी हवा के झोंके जैसा है....साधुवाद..."ओमप्रकाश यती"

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

भीड़ चरों ओर जितनी है यहां यहीं) रह जायेगी,
मुझको भी करना होग एक दिन तन्हा सफ़र।

समझते हो ख़ूब नज़रों की भाषा,
मिरा अनुरोध फिर क्यूं अनसुना है।

शुक्ला जी और जैन साहब के अशआर दिल को छूने वाले हैं>