Monday, November 15, 2010

मुशायरे के अगले दो शायर

मिसार-ए-तरह" सोच के दीप जला कर देखो" पर अगली दो ग़ज़लें मुलाहिज़ा कीजिए ।

जोगेश्वर गर्ग

जागो और जगा कर देखो
सोच के दीप जला कर देखो

खूब हिचक होती है जिन पर
वो सब राज़ बता कर देखो

आग लगाने वाले लोगो
इक दिन आग बुझा कर देखो

बारिश चूती छत के नीचे
सारी रात बिता कर देखो

कोई नहीं जिनका उन सब को
सीने से चिपका कर देखो

बच्चों के नन्हे हाथों को
तारे चाँद थमा कर देखो

"जोगेश्वर" उनकी महफ़िल में
अपनी ग़ज़ल सुना कर देखो

कुमार ज़ाहिद

लरज़ी पलक उठा कर देखो
ताब पै आब चढ़ा कर देखो

गिर जाएंगी सब दीवारें
सर से बोझ गिरा कर देखो

दुनिया को फिर धोक़ा दे दो
हँसकर दर्द छुपा कर देखो

तुम पर्वत को राई कर दो
दम भर ज़ोर लगा कर देखो

बंजर में भी फूल खिलेंगे
कड़ी धूप में जा कर देखो

अँधियारे में सुबह छुपी है
सोच के दीप जला कर देखो

लिपट पड़ेगी झूम के तुमसे
कोई शाख़ हिला कर देखो

ख़ाली हाथ नहीं है कोई
बढ़कर हाथ मिला कर देखो

ज़िन्दा हर तस्वीर है ‘ज़ाहिद’
टूटे कांच हटा कर देखो

9 comments:

M VERMA said...

दोनों गजले लाजवाब

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

जोगेश्वर गर्ग-बच्चों के नन्हे हाथो को, तारे चांद थमा कर देखो।

कुमार ज़ाहिद-दुनिया को फिर धोका दे दो, हंस कर दर्द छिपा कर देखो।

अच्छे अशआर , अच्छे गज़लियात।

तिलक राज कपूर said...

इस बार की तरही में जो खास बात है वह यह कि रदीफ़ खूबसूरत है, ए‍क तरफ़़ तो यह हल के रूप में 'देखो' कहता है दूसरी ओर चुनौती के रूपी में 'देखो' कहता है। वहीं फैलुन् का मात्रिक क्रम है जो और आनंदमय स्थिति पैदा करता है कहने के लिये।
जोगेश्‍वर जी ने इस बात को खूबसूरती से कैद किया है मत्‍ले की प्रथम पंक्ति में जहॉं चुनौती भी है और स्थिति विशेष के लिये हल भी है।
वहीं दूसरे शेर में जब वो कहते हैं कि 'खूब हिचक होती है जिन पर, वो सब राज़ बता कर देखो' तो ऐसा लगता हे जैसे शाइर कह रहा है कि 'परदे सारे गिर जायेंगे, परदा एक गिराकर देखो'; शायद यही स्थिति होती है जो एक स्‍वस्‍थ संबंध की बुनियाद होती है अब इसे ही अगर शायर यूँ कहे कि ‘रिश्‍ते सारे मिट जायेंगे, दिल के राज़ बता कर देखो’ तो एक विपरीत स्थिति बनती है जो आज की दुनिया के अस्‍वस्‍थ व्‍यवहार की बात करती है जिसमें राज़ दबाकर रखना श्रेयस्‍कर होता है।
कुमार ज़़ाहिद कहते हैं कि ‘गिर जाएंगी सब दीवारें, सर से बोझ गिरा कर देखो’, सोचने की बात है कि हम सभी अपनी अपनी तरह के बोझ सर या मन में लिये तरह तरह की दीवारें खड़़ी कर लेते हैं, कयूँ? खत्‍म करें ये बोझ, निज़ात पायें इससे और स्‍वस्‍थ संबंधों का आनंद पायें।
और जब वे कहते हैं कि ‘अँधियारे में सुबह छुपी है, सोच के दीप जला कर देखो’ तो सीधे-सीधे नैसर्गिक नियम सामने आते हैं और साथ ही ‘Think, there must be a solution’ का स‍कारात्‍मक नज़़रिया।
बहुत खूबसूरत शेर हैं दोनों ग़ज़लों में, सभी अश’आर पर चर्चा तो लंबी हो जायेगी, दोनों शायर के दो दो शेर पर ही सीमित कर रहा हूँ।

Rajeev Bharol said...

वाह.
दोनों ग़ज़लें बेहतरीन.
जोगेश्वर जी और कुमार जाहिद जी को बहुत बहुत बधाई.

अरुण चन्द्र रॉय said...

दोनों ग़ज़लें बेहतरीन.

रचना दीक्षित said...

दोनों ही गज़लें बेमिसाल लगीं आभार

jogeshwar garg said...

सभी का आभार !
कपूर साहब का विशेष धन्यवाद !

navneet sharma said...

दोनों शायर ग़ज़ब के और गज़लें भी।

kumar zahid said...
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