Saturday, February 19, 2011

नज़ीर बनारसी









(1909-1996)


हमने जो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर करके ..नज़ीर बनारसी

ग़ज़ल

इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ
मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ

जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ
सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ

कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ

सब एक नज़र फेंक के बढ़ जाते हैं आगे
मैं वक़्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूँ

वो आईना हूँ जो कभी कमरे में सजा था
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ

दुनिया का कोई हादसा ख़ाली नहीं मुझसे
मैं ख़ाक हूँ, मैं आग हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ

मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया
सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ ,मैं दरिया से जुदा हूँ

हर दौर ने बख़्शी मुझे मेराजे मौहब्बत
नेज़े पे चढ़ा हूँ कभी सूली पे चढ़ा हूँ

दुनिया से निराली है 'नज़ीर' अपनी कहानी
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ

मफ़ऊल मफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ऊलुन
22 1 1 221 1221 122
(हज़ज की मुज़ाहिफ़ शक्ल)

9 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

nazeer saab ki is khoobsurat gazal ke liye sadhuwad swikaren....

Kajal Kumar said...

नज़ीर साहब की बात ही कुछ और है.

रचना दीक्षित said...

मेरे पास तो शब्द ही नहीं हैं. बस लाजवाब सीधी सी भाषा में इतनी गहरी बातें

अर्चना तिवारी said...

bahut hi khoobsorat ghazal...ek ek sher jeewan ki sachchai ka bayaan kar rahe hain...

Kunwar Kusumesh said...

मत्ले से मक्ते तक लाजवाब/बेहतरीन ग़ज़ल

गौतम राजरिशी said...

"कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ"

लाजवाब शेर...नज़ीर साब को पढ़ना तो हमेशा से ट्रीट रहा है।

आप बहुत व्यस्त हैं आजकल, सतपाल जी...लगता है। बड़े दिनों बाद कोई ग़ज़ल लगी है यहाँ।

निर्मला कपिला said...

शब्द नही हैं प्रशंसा के लिये। हर एक शेर लाजवाब। धन्यवाद।

शारदा अरोरा said...

मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया
सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ ,मैं दरिया से जुदा हूँ
bahut khoob

"अर्श" said...

दुनिया का कोई हादसा ख़ाली नहीं मुझसे
मैं ख़ाक हूँ, मैं आग हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ!

नज़ीर साब का ये शे'र दंग रह गया मैं तो ......