Friday, March 28, 2014

मासूम ग़ाज़ियाबादी












 ग़ज़ल
 
कभी तूफां, कभी कश्ती, कभी मझधार से यारी 
किसी दिन लेके डूबेगी तुझे तेरी समझदारी 

कभी शाखों, कभी ख़ारों, कभी गुल की तरफ़दारी 
बता माली ये बीमारी है या फिर कोई लाचारी

अवामी गीत हैं मेरे, मेरी बाग़ी गुलूकारी 
मुझे क्या दाद देगा वो सुने जो राग दरबारी

किसी का मोल करना और उसपे ख़ुद ही बिक जाना 

कोइ कुछ भी कहे लेकिन यही फ़ितरत है बाज़ारी 

खिज़ां में पेड़ से टूटे हुए पत्ते बताते हैं
बिछड़ कर अपनों से मिलती है बस दर-दर की दुतकारी

यहाँ इन्सां की आमद-वापसी होती तो है साहिब 
वो मन पर भारी है या फिर चराग़ो-रात पे भारी

जो सीखा है किसी "मासूम" को दे दो तो अच्छा है
सिरहाने कब्र के रोया करेगी वरना फ़नकारी
 

9 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना मंगलवार 01 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

vandana said...

जो सीखा है किसी "मासूम" को दे दो तो अच्छा है
सिरहाने कब्र के रोया करेगी वरना फ़नकारी

शानदार ग़ज़ल

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

खिज़ां में पेड़ से टूटे हुए पत्ते बताते हैं
बिछड़ कर अपनों से मिलती है बस दर-दर की दुतकारी...बहुत ही शानदार गज़ल । पढकर लगा कि कुछ पढने लायक पढा है ।

Prasanna Badan Chaturvedi said...

वाह....बेहद अच्छी और शानदार प्रस्तुति...
नयी पोस्ट@भजन-जय जय जय हे दुर्गे देवी

dinesh kumar said...

बेहतरीन ग़ज़ल दिल जीत लिया आप की रचना ने

अनुराग सिंह "ऋषी" said...

वाह आदरणीय नायाब ग़ज़ल कही है आपने | ग़ज़ल मेरे लेखन की सबसे प्रिय विधा है | वाकई नायाब
सादर

Yudhisthar raj said...

बेहतरीन ग़ज़ल

यहाँ इन्सां की आमद-वापसी होती तो है साहिब
वो मन पर भारी है या फिर चराग़ो-रात पे भारी

जो सीखा है किसी "मासूम" को दे दो तो अच्छा है
सिरहाने कब्र के रोया करेगी वरना फ़नकारी

amitsingh chandel said...

बेहतरीन

amitsingh chandel said...

बेहतरीन