Thursday, June 26, 2014

मयंक अवस्थी
















 
ग़ज़ल

बम फूटने लगें कि समन्दर उछल पड़े
कब ज़िन्दगी पे कौन बवंडर उछल पड़े

दुश्मन मिरी शिकस्त पे मुँह खोल कर हँसा
और दोस्त अपने जिस्म के अन्दर उछल पड़े

गहराइयाँ सिमट के बिखरने लगीं तमाम
इक चाँद क्या दिखा कि समन्दर उछल पड़े

मत छेड़िये हमारे चरागे –खुलूस को
शायद कोई शरार ही , मुँह पर उछल पड़े

घोड़ों की बेलगाम छलाँगों को देख कर
बछड़े किसी नकेल के दम पर उछल पड़े

गहरी नहीं थी और मचलती थी बेसबब
ऐसी नदी मिली तो शिनावर उछल पड़े

यूँ मुँह न फेरना कि सभी दोस्त हैं “ मयंक”
कब और कहाँ से पीठ पे खंज़र उछल पड़े

8 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (27.06.2014) को "प्यार के रूप " (चर्चा अंक-1656)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

Purshottam Abbi Azer said...

मेरे अज़ीज़ मयंक बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल जीते रहिए ...मेरी और से ग़ज़ल का मतला
तौहफे के रूप में स्वीकारें .........
सूरज का ताप देख के सागर उछल पड़े
बादल तमाम साथ में खुल कर उछल पड़े
आज़र

Neeraj Kumar Neer said...

सुन्दर ग़ज़ल.

नीरज गोस्वामी said...

घोड़ों की बेलगाम छलाँगों को देख कर
बछड़े किसी नकेल के दम पर उछल पड़े
Mayan aur unki Ghazalen ...dono bemisaal...lajawaab hain...

Neeraj

तिलक राज कपूर said...

मयंक उन शायरों में से हैं जो कहते हैं तो उम्‍दा वरना नहीं। यह ग़ज़ल उदाहरण है उनकी कहन की पुख्‍़तगी की।
बधाई मयंक भाई इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिये और सतपाल भाई आपको बधाई इस नगीने की प्रस्‍तुति के लिये।

Mayank Awasthi said...

Satpal bhai !! apki muhabbat ka aseer hun ki apane meri ghazal ko apane blog par jagah di --main Muhattarm Tilak Raj Kapoor sahab ka tahe dil se shukraguar hun ki unhone mujhe is post ke baare me bataya aur ye bhi bataya ki ghazal ka matla publish hone se rah gaya hai -- Dwijendra dwij sahab se baat nahin ho saki phone connectivity nahin mil saki isliye !! matla peshe khidmat hai --
बम फूटने लगें कि समन्दर उछल पड़े
कब ज़िन्दगी पे कौन बवंडर उछल पड़े
Bhai rajendra Kumar --Janab Purushottam Abi Azer sahab ( regards aut matle par daad !!) - Neeraj Kumar Neer sahab !! Neeraj Goswami sahab !!(hamare bahut purane marasim hain !!) -Aur Tilak Raj Kapoor sahab !! ( nawazish) --Main apa sabhi ka shukraguzar hun --hausla afzai ke liye --regards --Mayank

Navin C. Chaturvedi said...

Satpal bhai sap khud bhi shayri ke jaankaar hain and yah ghazal bhi internet par tamam jagah par maujud hai. Google m search ki ja sakti hai. Baghair matle k ghazal peah nahiN karma chahiye thi.

सतपाल ख़याल said...

I am etremely very sorry ,matla post kar dia hai ,aainda khayaal rakha jayega ki aise ghalti na ho ,
Naveen chaturvedi ji muafi chahta hoon.