Wednesday, October 14, 2015

रूबाई



रूबाई
पहले दो मिसरे मतले की तरह होते हैं. दोनो मे काफ़िया इस्तेमाल होता है और तीसरे को छोडकर चौथे मे काफ़िया इस्तेमाल होता है.चारो मिसरों मे भी काफ़िए का प्रयोग हो सकता है.रुबाई मे
चौथे मिसरे मे अपनी बात खत्म करनी होती है नही तो रूबाई किता बन जायेगी. ये बहुत अहम बात है.

मूल मीटर है:
2222 222 222

अब इसमे तीन मुजाहिफ़ कहें या इस्तेमाल होने वाली सूरतें हैं

एक:....
22 11 2 222 222

दूसरी सूरत:

2222 2112(1212) 222

तीसरी सूरत:

2222 222 2112 (1)

and as by sh RP sharma ji:
"S" denoted for guru 2 and I for laghu 1


rub

फिराक गोरखपुरी की लिखी हुई 'रूप' की स्र्बाइयां

दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने, जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पे लिए नर्म दमक
बच्चों के घरौंदे में जलाती है दिए
मंडप तले खड़ी है रस की पुतली
जीवन साथी से प्रेम की गांठ बंधी
महके शोलों के गिर्द भांवर के समय
मुखड़े पर नर्म छूट सी पड़ती हुई

ये हल्के सलोने सांवलेपन का समां
जमुना जल में और आसमानों में कहां
सीता पे स्वयंवर में पड़ा राम का अक्स
या चांद के मुखड़े पे है जुल्फों का धुआं

मधुबन के बसंत सा सजीला है वो रूप
वर्षा ऋतु की तरह रसीला है वो रूप
राधा की झपक, कृष्ण की बरजोरी है
गोकुल नगरी की रास लीला है वो रूप

जमुना की तहों में दीपमाला है कि जुल्फ
जोबन शबे - क़द्र ने निकाला है कि जुल्फ
तारीक़ो - ताबनाक़* शामे हस्ती (अंधेरी तथा प्रकाशमान)
जिंदाने - हयात* का उजाला है कि जुल्फ (जीवन रूपी कारागार)

भीगी ज़ुल्फों के जगमगाते कतरे
आकाश से नीलगूं शरारे फूटे
है सर्वे रवां* में ये चरागां*का समां (१. बहती नदी २. दीपमाला)
या रात की घाटी में जुगनू चमकें

है तीर निगाह का कि फूलों की छड़ी
कतरे हैं पसीने के कि मोती की लड़ी
कोमल मुस्कान और सरकता घूंघट
है सुबहे - हयात* उमीदवारों में खड़ी ( जीवन प्रभात)

ये रंगे निशात, लहलहाता हुआ गात
जागी - जागी सी काली जुल्फेंा की ये रात
ऐ प्रेम की देवी ये बता दे मुझको
ये रूप है या बोलती तस्वीरे हयात

जब प्रेम की घाटियों में सागर उछले
जब रात की वादियों में तारे छिटके
नहलाती फिजां का आई रस की पुतली
जैसे शिव की जटा से गंगा उतरे

किस प्यार से होती है खफा बच्चे से
कुछ त्यौरी चढ़ाए हुए, मुंह फेरे हुए
इस रूठने पर प्रेम का संसार निसार
कहती है ' जा तुझसे नहीं बोलेंगे'

चौके की सुहानी आंच, मुखड़ा रौशन
है घर की लक्ष्मी पकाती भोजन
देते हैं करछुल के चलने का पता
सीता की रसोई के खनकते बर्तन
1. लहरों में खिला कंवल नहाए जैसे
दोशीज़: ए सुबह गुनगुनाए जैसे
ये रूप, ये लोच, ये तरन्नुम, ये निखार
बच्चा सोते में मुसकुराए जैसे



2. दोशीज़: ए बहार मुसकुराए जैसे
मौज ए तसनीम गुनगुनाए जैसे
ये शान ए सुबकरवी, ये ख्नुशबू ए बदन
बल खाई हुई नसीम गाए जैसे



3. ग़ुनचे को नसीम गुदगुदाए जैसे
मुतरिब कोई साज़ छेड़जाए जैसे
यूँ फूट रही है मुस्कुराहट की किरन
मन्दिर में चिराग़ झिलमिलाए जैसे



4. मंडलाता है पलक के नीचे भौंवरा
गुलगूँ रुख्नसार की बलाऎं लेता
रह रह के लपक जाता है कानों की तरफ़
गोया कोई राज़ ए दिल है इसको कहना



5. माँ और बहन भी और चहीती बेटी
घर की रानी भी और जीवन साथी
फिर भी वो कामनी सरासर देवी
और सेज पे बेसवा वो रस की पुतली



6. अमृत में धुली हुई फ़िज़ा ए सहरी
जैसे शफ़्फ़ाफ़ नर्म शीशे में परी
ये नर्म क़बा में लेहलहाता हुआ रूप
जैसे हो सबा की गोद फूलोँ से भरी



7. हम्माम में ज़ेर ए आब जिसम ए जानाँ
जगमग जगमग ये रंग ओ बू का तूफ़ाँ
मलती हैं सहेलियाँ जो मेंहदी रचे पांव
तलवों की गुदगुदी है चहरे से अयाँ



8. चिलमन में मिज़: की गुनगुनाती आँखें
चोथी की दुल्हन सी लजाती आँखें
जोबन रस की सुधा लुटाती हर आन
पलकोँ की ओट मुस्कुराती आँखें



9. तारों को भी लोरियाँ सुनाती हुई आँख
जादू शब ए तार का जगाती हुई आँख
जब ताज़गी सांस ले रही हो दम ए सुब:
दोशीज़: कंवल सी मुस्कुराती हुई आँख



10. भूली हुई ज़िन्दगी की दुनिया है कि आँख
दोशीज़: बहार का फ़साना है कि आँख
ठंडक, ख्नुशबू, चमक, लताफ़त, नरमी
गुलज़ार ए इरम का पहला तड़का है कि आँख



लहरों में खिला कंवल नहाए जैसे
दोशीज़: ए सुबह गुनगुनाए जैसे
ये रूप, ये लोच, ये तरन्नुम, ये निखार
बच्चा सोते में मुसकुराए जैसे



दोशीज़-ए-बहार मुस्कुराए जैसे
मौज ए तसनीम गुनगुनाए जैसे
ये शान ए सुबकरवी, ये ख़ुशबू-ए-बदन
बल खाई हुई नसीम गाए जैसे



ग़ुनचे को नसीम गुदगुदाए जैसे
मुतरिब कोई साज़ छेड़ जाए जैसे
यूँ फूट रही है मुस्कुराहट की किरन
मन्दिर में चिराग़ झिलमिलाए जैसे



मंडलाता है पलक के नीचे भौंवरा
गुलगूँ रुख़सार की बलाएँ लेता
रह रह के लपक जाता है कानों की तरफ़
गोया कोई राज़ ए दिल है इसको कहना



माँ और बहन भी और चहेती बेटी
घर की रानी भी और जीवन साथी
फिर भी वो कामनी सरासर देवी
और सेज पे बेसवा वो रस की पुतली



अमृत में धुली हुई फ़िज़ा ए सहरी
जैसे शफ़्फ़ाफ़ नर्म शीशे में परी
ये नर्म क़बा में लेहलहाता हुआ रूप
जैसे हो सबा की गोद फूलोँ से भरी



हम्माम में ज़ेर ए आब जिस्म ए जानाँ
जगमग जगमग ये रंग-ओ-बू का तूफ़ाँ
मलती हैं सहेलियाँ जो मेंहदी रचे पांव
तलवों की गुदगुदी है चहरे से अयाँ



चिलमन में मिज़: की गुनगुनाती आँखें
चोथी की दुल्हन सी लजाती आँखें
जोबन रस की सुधा लुटाती हर आन
पलकों की ओट मुस्कुराती आँखें



तारों को भी लोरियाँ सुनाती हुई आँख
जादू शब ए तार का जगाती हुई आँख
जब ताज़गी सांस ले रही हो दम ए सुब:
दोशीज़: कंवल सी मुस्कुराती हुई आँख



भूली हुई ज़िन्दगी की दुनिया है कि आँख
दोशीज़: बहार का फ़साना है कि आँख
ठंडक, ख्नुशबू, चमक, लताफ़त, नरमी
गुलज़ार ए इरम का पहला तड़का है कि आँख




किस प्यार से दे रही है मीठी लोरी
हिलती है सुडौल बांह गोरी-गोरी
माथे पे सुहाग आंखों मे रस हाथों में
बच्चे के हिंडोले की चमकती डोरी




किस प्यार से होती है ख़फा बच्चे से
कुछ त्योरी चढ़ाए मुंह फेरे हुए
इस रूठने पे प्रेम का संसार निसार
कहती है कि जा तुझसे नहीं बोलेंगे




है ब्याहता पर रूप अभी कुंवारा है
मां है पर अदा जो भी है दोशीज़ा है
वो मोद भरी मांग भरी गोद भरी
कन्या है , सुहागन है जगत माता


हौदी पे खड़ी खिला रही है चारा
जोबन रस अंखड़ियों से छलका छलका
कोमल हाथों से है थपकती गरदन
किस प्यार से गाय देखती है मुखड़ा


वो गाय को दुहना वो सुहानी सुब्हें
गिरती हैं भरे थन से चमकती धारें
घुटनों पे वो कलस का खनकना कम-कम
या चुटकियों से फूट रही हैं किरनें

मथती है जमे दही को रस की पुतली
अलकों की लटें कुचों पे लटकी-लटकी
वो चलती हुई सुडौल बाहों की लचक
कोमल मुखड़े पर एक सुहानी सुरखी

आंखें हैं कि पैग़ाम मुहब्बत वाले
बिखरी हैं लटें कि नींद में हैं काले
पहलू से लगा हुआ हिरन का बच्चा
किस प्यार से है बग़ल में गर्दन डाले


आँगन में सुहागनी नहा के बैठी हुई
रामायण जानुओं पे रक्खी है खुली
जाड़े की सुहानी धूप खुले गेसू की
परछाईं चमकते सफ़हे* पर पड़ती हुई

मासूम जबीं और भवों के ख़ंजर
वो सुबह के तारे की तरह नर्म नज़र
वो चेहरा कि जैसे सांस लेती हो सहर
वो होंट तमानिअत** की आभा जिन पर

अमृत वो हलाहल को बना देती है
गुस्से की नज़र फूल खिला देती है
माँ लाडली औलाद को जैसे ताड़े
किस प्यार से प्रेमी को सज़ा देती है

प्यारी तेरी छवि दिल को लुभा लेती है
इस रूप से दुनिया की हरी खेती है
ठंडी है चाँद की किरन सी लेकिन
ये नर्म नज़र आग लगा देती है


सफ़हे – माथा, तमानिअत - संतोष

प्रेमी को बुखार, उठ नहीं सकती है पलक
बैठी हुई है सिरहाने, माँद मुखड़े की दमक
जलती हुई पेशानी पे रख देती है हाथ
पड़ जाती है बीमार के दिल में ठंडक

चेहरे पे हवाइयाँ निगाहों में हिरास*
साजन के बिरह में रूप कितना है उदास
मुखड़े पे धुवां धुवां लताओं की तरह
बिखरे हुए बाल हैं कि सीता बनवास

पनघट पे गगरियाँ छलकने का ये रंग
पानी हचकोले ले के भरता है तरंग
कांधों पे, सरों पे, दोनों बाहों में कलस
मंद अंखड़ियों में, सीनों में भरपूर उमंग

ये ईख के खेतों की चमकती सतहें
मासूम कुंवारियों की दिलकश दौड़ें
खेतों के बीच में लगाती हैं छलांग
ईख उतनी उगेगी जितना ऊँचा कूदें
निदा जी के अनुसार:
रुबाई एक काव्य विधा का नाम है. रुबाई अरबी शब्द रूबा से निकला है. जिसका अर्थ होता है चार.
रुबाई चार पंक्तियों की कविता है जिसकी पहली दो और चौथी पंक्तियाँ तुकात्मक होती है और तीसरी लाइन आज़ाद रखी जा सकती है. डॉक्टर इक़बाल की एक रुबाई है

रगों में वो लहू बाक़ी नहीं है
वो दिल वो आरजू बाकी नहीं है
नमाजो-रोज़-ओ-कुर्बानिओ-हज
ये सब बाक़ी है तू बाक़ी नहीं है

रुबाई का अपना एक छंद होता है.

इस छंद के बारे में कहा जाता है, 251 ईसवी सन में अरब के एक इलाक़े में सुल्तान याकूब का लड़का गोलियों से खेल रहा था. एक गोली के लुढ़कने पर उसने ख़ुशी में कुछ लफ्ज़ कहे थे. इन लफ्ज़ों में एक ख़ास लय थी. उस समय के शायर रोदकी ने इसी लय में तीन पंक्तियाँ जोड़ दीं और इस तरह रुबाई और इस का छंद वजूद में आया.

पहली रुबाई अरब की देन ज़रूर है, लेकिन इस विधा को शोहरत ईरान में मिली. ईरान में 12वीं सदी, उमर ख़ैयाम की रुबाइयों के लिए मशहूर है. उमर ख़ैयाम खुरासाँ में नेशपुर के निवासी थे. उसके नाम के साथ ख़ैयाम का जुड़ाव, शायर के पिता के पेशे की वजह से था. ख़ैयाम के पिता इब्राहीम ख़ेमे (तंबू) बनाने का काम करते थे और ख़ैयाम को फारसी में 'ख़ेमा' के अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है.

उमर ख़ैयाम की रूबाइयों की शोहरत में, अंग्रेज़ी भाषा के कवि एडवर्ड फिट्ज जेराल्ड (1809-1883) का बड़ा हाथ है. जेराल्ड ख़ुद भी अच्छे कवि थे लेकिन कविता के पाठकों में वह अपनी कविताओं से अधिक ख़ैयाम की रूबाइयों के अनुवादक के रूप में अधिक पहचाने जाते हैं. जीवन की अर्थहीनता में व्यक्तिगत अर्थ की खोज, खैयाम की रूबाइयों का केंद्रीय विषय है. इस एक विषय को अलग-अलग प्रतीकों और बिम्बों के ज़रिए उन्होंने बार-बार दोहराया है.

फिराक़ गोरखपुरी का शेर है,

ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएँ

वह उदास होने के लिए सोच की शर्त रखते थे और ख़ैयाम इस सोच को भूलकर साँसों को गँवारा बनाते हैं. एक स्तर पर ख़ैयाम की यह सोच हिंदू मत में माया-दर्शन से भी मिलती-जुलती नज़र आती है. अंतर सिर्फ़ इतना है 'माया' कबीर के शब्दों में ठगनी है जो आत्मा और परमात्मा के बीच दीवार उठाती है और ख़ैयाम की फ़िलॉसफ़ी में इस संसार में जीवन के अर्थहीन होने का मातम ज़रूर करती है.

मगर वह इस मातम-खुशी का एक पहलू भी खोज निकालते हैं और वह है ख़ैयाम का जाम. पश्चिम में ये छोटी कविताएँ काफी लोकप्रिय हुईं. नौजवानों को इनमें विद्रोह और नैतिकता के पाखंड को बेनकाब करने करने का रास्ता नज़र आया. उन्हें इनके लिए ये रुबाइयाँ 'विक्टोरियन कल्चर' के ख़िलाफ़ एक मंच देती थी. इन रूबाइयों के प्रशंसकों में टनीसन ने इनकी तारीफ में एक कविता लिखी और थॉमस हार्डी ने 88 वर्ष की उम्र में मरने से पहले ख़ैयाम की एक रुबाई सुनने की इच्छा प्रकट की थी.

ख़ैयाम और मधुशाला

हरिवंश राय बच्चन भी ईरान के इस बोहेमियन महाकवि के जादू से नहीं बच सके. बच्चन जी की मुलाक़ात उमर ख़ैयाम की रूबाइयो से, फारसी भाषा में नहीं हुई. वह उमर खैयाम से फिट्ज जेराल्ड के अनुदित अंग्रेज़ी रूप के माध्यम से मिले थे. बच्चन जी अंग्रेज़ी के शिक्षक थे और अंग्रेज़ी के कवि यीट्स पर उन्होंने कैब्रिज से डॉक्ट्रेट की डिग्री भी प्राप्त की थी. शेक्सपियर के कई नाटकों का हिंदी में अनुवाद भी किया था.

जेराल्ड की तरह उन्होंने भी रुबाई के विशेष छंद को छोड़कर अपने ही मीटर में मधुशाला की चौपाइयों की रचना की है. ये भावभूमि के स्तर पर भी खैयाम के प्रतीकों और संकेतों के बावजूद ख़ैयाम से अलग भी है और छह सौ साल में जो समय बदला है, उस बदलाव से जुड़ी हुई भी हैं. मधुशाला की रूबाइयो का प्रथम पाठ बच्चन जी ने सन् 1934-35 में बनारस में किया था. अपने प्रथम पाठ से अब तक मधुशाला स्वर्ण जयंती से गुजर के हीरक जयंती मना चुकी है. 1984 में इसकी स्वर्ण जयंती के अवसर पर उन्होंने एक नई रुबाई भी लिखी थी

घिस-घिस जाता कालचक्र में हर मिट्टी के तनवाला
पर अपवाद बनी बैठी है मेरी यह साक़ी बाला
जितनी मेरी उम्र वृद्ध मैं, उससे ज़्यादा लगता हूँ
अर्धशती की होकर के भी षोडष वर्षी मधुशाला

मधुशाला हिंदी काव्य साहित्य के संसार में अपना मेयार आप है. यह अकेली किताब है जो अपने जन्म से अब तक कई जन्म ले चुकी है और आज तक पाठकों के साथ चलती-फिरती है और बातचीत में मुहाविरों की तरह इस्तेमाल होती है.

बच्चन जी ने कई विधाओं में लिखा है और स्तरीय लिखा है लेकिन यह वह पुस्तक है जो अमिताभ के जन्म से पहले वजूद में आई थी और उनकी फ़िल्मी शोहरत के बगैर भी जनजन में मशहूर है. पहले भी थी और अब भी है. इस पुस्तक की लोकप्रियता का एक कारण तो इन रुबाइयों में वे अनोखे प्रतीक है, हाला, प्याला, साक़ी बाला आदि और दूसरा आकर्षण इसकी शब्दावली है जिसमें आम आदमी अपने दुख-सुख का इजहार करता है. इन्ही के साथ इन रूबाइयों का मुख्य पात्र धर्म-जात के घेरे से बाहर होकर सदभाव की रौशनी फैलाता है. होश वालों की दुनिया में वह ऐसा बेहोश है जो न हिंदू है न मुसलमान सिर्फ इंसान है और वह इंसान जितना सूफ़ी है और उतना ही रिंद है.

मुसलमान और हिंदू दो हैं, एक मगर उनका प्याला
एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला
दोनों रहते एक न जब तक मंदिर-मस्जिद को जाता
बैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला

मैं मदिरालय के अंदर हूँ मेरे हाथों में प्याला
प्याले में मदिरालय बिंबित करने वाली हाला
इस उधेड़बुन ही में मेरा सारा जीवन बीत गया
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला

एक बार सहारा ग्रुप ने बच्चन जी की वर्षगाँठ मनाई थी. इस आयोजन में एक कवि सम्मेलन भी था. जिसमें मैं भी आमंत्रित था. कवि सम्मेलन के बाद अमिताभ बच्चन को स्टेज पर बुलाया गया और उन्होंने अपनी आवाज़ में कई साज़ों के साथ मधुशाला की कई रूबाइयाँ सुनाईं थी. अमिताभ सुनने से अधिक देखने की चीज़ है. लोगों ने दिल खोलकर उनका स्वागत किया.

अमित जी न रूबाइयों को अपनी धुन में गाया था, लेकिन उन्होंने आकाशवाणी में सुरक्षित, सीनियर बच्चन जी की आवाज़ में बिना साज़ के इन्हें सुना था. उन्हें अमिताभ की प्रस्तुति पसंद नहीं आई. यह भी हो सकता है जब कोई चीज़ आदत बन जाती है तो उसमें थोड़ी सी भी तब्दीली सुनने वालों को सताती है.

मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता
शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यवहार मेरा



3 comments:

जमशेद आज़मी said...

बहुत अच्‍छी रचना की प्रस्‍तुति। मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

Shiv Kumar Sahil said...

पठनीय भी और अनुकरणीय भी

Amit Kumar Tanwar said...

How to connect with you Satpal ji.

Want to learn the intricacies of Gajal and subsequent help to correct and improve my writing.

Please have a look at :http://amitkumartanwar.blogspot.in/

Or

https://www.facebook.com/AmitkumarTanwar.Writer

Thanks.

Amit Kumar Tanwar