Saturday, February 14, 2009

विशेष पेशकश










आज सोचा कि थोड़ा रोमांटिक हो जाएँ और फिर बरबस अहमद फ़राज़ साहब कि याद आ गई और उनकी एक बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है जो आप सब से सांझा करना चाहता हूँ और फिर साइड बार मे एक ग़ज़ल मेहदी हसन साहेब की मखमली आवाज मे आप सब के लिए पेश की है उम्मीद करता हूँ कि आप को ये पेशकश पसंद आएगी.


ग़ज़ल

बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा


अबरू खिंचे खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा

अल्फ़ाज़ थे के जुग्नू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा

ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बतों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफ़ाक़तों से दिल था डरा डरा सा


कुछ ये के मुद्दतों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूँ हुआ के सावन आँखों में आ बसे थे
फिर यूँ हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारो हम को ख़बर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़िआ ज़रा सा

तेवर थे बेरुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आश्ना सा

हम दश्त थे के दरिया हम ज़हर थे के अमृत
नाहक़ था ज़ोंउम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उस को देखा कल शाम इत्तेफ़ाक़न
अपना भी हाल है अब लोगो "फ़राज़" का सा

8 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन ग़ज़ल.... वाह-वाह.. क्या गुलाबी पेशकश है........ फ़राज साहब तो कमाल थे ही आपने भी संत जी को सही श्रद्धांजली दी... जय वैलेण्टाइन..

श्रद्धा जैन said...

aapne aaj ka din sunder karne mein kasar nahi chori ji

bhaut hi khobsurat kalaam

Asha joglekar said...

बहुत बढिया ।
दिले दर्द भी है जरासा
औ सुकून भी जरासा ।
प्यार भरा वेलेन्टाइन दिवस ।

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi said...

अहमद फराज़ का यह अंदाज़ है निराला
उर्दू ग़ज़ल मे जिसका है आज बोलबाला

सतपाल भाटिया की इस पेशकश से बर्क़ी
बज़्मे अदब मेँ अपनी है फिक्र का उजाला

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

SWAPN said...

behad khoobsurat rachna.

PRAN SHARMA said...

AAJ TO HAR TARAF PYAR KE HEE
NAGME HAIN.Basant Bahaar aur
Valentine Day hai aur tis par
mohabbat se bharee khoobsoorat
gazlen kahne waale Ahmad faraaz
kee gazal sone par suhaagaa hai.

गौतम राजरिशी said...

वाह सतपाल जी...इस अनूठी गज़ल को इस दिवस-विशेष पर हम सब को पढ़्वा कर गज़ब का अहसान किया है...
शुक्रिया आपका\
अपने आलेख में जो एक बार आपने बताया था मुसलसल गज़ल के बारे में और ’चुपके-चुपके रात-दिन’ का उदाहरण दिया था,तो क्या ये गज़ल भी इसी में आयेगी?

Kavi Kulwant said...

bahut khoob.. satpaal ji..