Thursday, February 19, 2009

राजेन्द्र नाथ "रहबर" - परिचय और ग़ज़लें







राजेन्द्र नाथ 'रहबर`अदब की दुनिया का एक जाना पहचाना नाम है.इन्होंने ने हिन्दू कॉलेज अमृतसर से बी.ए., ख़ालसा कॉलेज अमृतसर से एम.ए. (अर्थ शास्त्र) और पंजाब यूनिवर्सिटी चण्डीगढ़ से एल. एल.बी. की .इन्होने शायरी का फ़न पंजाब के उस्ताद शायर पं.'रतन` पंडोरवी से सीखा जो प्रसिद्ध शायर अमीर मीनाई के चहेते शार्गिद थे। इनकी एक नज्म़ ''तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त`` को विश्व व्यापी शोहरत नसीब हुई है। ग़ज़ल गायक श्री जगजीत सिंह इस नज्म़ को 1980 ई. से अपनी मख़्मली आवाज़ में गा रहे हैं .

प्रकाशित पुस्तकें :याद आऊंगा ,तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त,जेबे सुख़न, ..और शाम ढल गई, मल्हार , कलस ,आगो़शे-गुल ,

आज की ग़ज़ल के पाठकों के लिए आज हम इनकी दो ग़ज़लें पेश कर रहे हैं.


ग़ज़ल







क्या क्या सवाल मेरी नज़र पूछती रही
लेकिन वो आंख थी कि बराबर झुकी रही

मेले में ये निगाह तुझे ढूँढ़ती रही
हर महजबीं से तेरा पता पूछती रही

जाते हैं नामुराद तेरे आस्तां से हम
ऐ दोस्त फिर मिलेंगे अगर ज़िंदगी रही

आंखों में तेरे हुस्न के जल्वे बसे रहे
दिल में तेरे ख़याल की बस्ती बसी रही

इक हश्र था कि दिल में मुसलसल बरपा रहा
इक आग थी कि दिल में बराबर लगी रही

मैं था, किसी की याद थी, जामे-शराब था
ये वो निशस्त थी जो सहर तक जमी रही

शामे-विदा-ए-दोस्त का आलम न पूछिये
दिल रो रहा था लब पे हंसी खेलती रही

खुल कर मिला, न जाम ही उस ने कोई लिया
'रहबर` मेरे ख़ुलूस में शायद कमी रही

बहरे-मज़ारे
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन
221 2121 1221 2 12

ग़ज़ल







जिस्मो-जां घायल, परे-परवाज़ हैं टूटे हुये
हम हैं यारों एक पंछी डार से बिछुड़े हुये

आप अगर चाहें तो कुछ कांटे भी इस में डाल दें
मेरे दामन में पड़े हैं फूल मुरझाये हुये

आज उस को देख कर आंखें मुनव्वर हो गयीं
हो गई थी इक सदी जिस शख्स़ को देखे हुये

फिर नज़र आती है नालां मुझ से मेरी हर ख़ुशी
सामने से फिर कोई गुज़रा है मुंह फेरे हुये

तुम अगर छू लो तबस्सुम-रेज़ होंटों से इसे
देर ही लगती है क्या कांटे को गुल होते हुये

वस्ल की शब क्या गिरी माला तुम्हारी टूट कर
जिस क़दर मोती थे वो सब अर्श के तारे हुये

क्या जचे 'रहबर` ग़ज़ल-गोई किसी की अब हमें
हम ने उन आंखों को देखा है ग़ज़ल कहते हुये

बहरे-रमल
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212


पता:
राजेन्द्र नाथ 'रहबर`
1085, सराए मुहल्ला,
पठानकोट-145001
पंजाब

26 comments:

Anonymous said...

क्या क्या सवाल मेरी नज़र पूछती रही
लेकिन वो आंख थी कि बराबर झुकी रही
wah wah wah!!! kya keh diya sahab!!!laajwaab matlaa!!! simplicity at its best!!

amit ranjan

रवीन्द्र प्रभात said...

आज उस को देख कर आंखें मुनव्वर हो गयीं
हो गई थी इक सदी जिस शख्स़ को देखे हुये

यह शेर दिल को छू गया ....रहबर जी की दोनों गज़लें अच्छी है .......पढ़ तो गया मगर प्यास नही बुझी ......!

Pran Sharma said...

Rahbar sahib kee dono gazlen achchhee lagee hai.sheron mein
mithaas hai.
Ek misre mein "Barpaa"kaa
istemaal huaa hai.Kyaa ye shabd
barpaa hai ya koee aur?

Udan Tashtari said...

बहुत आभार सतपाल भाई, राजेन्द्र नाथ 'रहबर' जी से परिचय करवाने का और उनकी उम्दा रचनाऐं पढ़वाने का. एक से एक उम्दा रचनाऐं पढ़ने मिलती हैं आपके माध्यम से, साधुवाद.

विनय ओझा 'स्नेहिल' said...

dhanyavad jo rahbar sahab se parichay karaya.Bahut acchhha prayas hai.Aisee naayaab cheejen mushkil se milti hain.

विनय ओझा 'स्नेहिल' said...

dhanyavad jo rahbar sahab se parichay karaya.Bahut acchhha prayas hai.Aisee naayaab cheejen mushkil se milti hain.

नीरज गोस्वामी said...

सतपाल जी बेहद खूबसूरत ग़ज़लें पढ़वाने का शुक्रिया...आज के दौर में ऐसी शायरी अब बहुत कम पढने को मिलती है...शुक्रिया.

नीरज .

sanjaygrover said...

मैं था, किसी की याद थी, जामे-शराब था
ये वो निशस्त थी जो सहर तक जमी रही
Wah! kya baat hai!
Mohtaram Rahbar Sahab se vyaktigat mulaqat ka saubhagya bhi mujhe mil chuka hai. Delhi aate haiN to mere Padosi hote haiN. Rahbar saheb ki ghazaleN padhwaane ke liye Shukriya.

SWAPN said...

itni sunder gazlon se parichay karane ke liye dhanyawaad.

योगेन्द्र मौदगिल said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति है सतपाल जी, बधाई....... रहबर साहब उस्ताद शायर हैं. उन्हें नमन..

सतपाल said...

पीते थे न 'महरिष, तो सभी कहते थे ज़ाहिद
अब जाम उठाया है तो हंगामा बपा है .
Respected pran ji yahan barpa ko shayad yahan bapa ke vazan me liya hai, aise hi ooper ke she'r me RP sharma ji ne bhi kia hai.
ab ye kahan tak sahih hai iske baare me kuch nahi kah sakta.
saadar
khyaal

dheer said...
This comment has been removed by the author.
dheer said...

namaste Satpal saHeb!!
Pran saHeb kee baat saHeeH hai. lafz e barpaa naheeN lafz e bapaa kaa istemaal hogaa. shaaid typo hai. urdu zabaan meN "bapaa" lafz aam hai. aur matlab sher se zaahir hai.

Rahbar saHeb kee ghazleN behad pasand aayee. meeree hazaar_haa daad unke liye aur aapkaa aabhaar in ghazloN ko pesh karne ke liye.

mohataram Sarwar Alam Raz saHeb kaa ek sher arz hai!

roz-o-shab is meN bapaa shor-e-qiyaamat kyaa hai?
yeh miraa dil hai keh aa,eenah-e-Hairat? kyaa hai?


Dheeraj Ameta "dheer"

दिगम्बर नासवा said...

आंखों में तेरे हुस्न के जल्वे बसे रहे
दिल में तेरे ख़याल की बस्ती बसी रही

वस्ल की शब क्या गिरी माला तुम्हारी टूट कर
जिस क़दर मोती थे वो सब अर्श के तारे हुये

बहुत शुक्रिया सतपाल जी
रहबर साहब की शायरी इतनी खूबसूरत है ये बात तो जगजीत जी की ग़ज़ल सुन कर ही लग जाता है बेहद सुंदर शब्द और ये दोनों की दोनों गज़लें तो एक से बढ़ कर एक हैं. ये दो शेर तो बहुत ही ख़ास हैं

सतपाल said...

इस क़दर तुंद है रफ़्तारे-हयात
वक़्त भी रिश्ता बपा लगता है

Mumukshh Ki Rachanain said...

सतपाल जी माननीय राजेन्द्र नाथ 'रहबर` से परिचय कराने का आपको धन्यवाद.
प्रस्तुत ग़ज़ल से प्यास इन्हे और पढने की बढ़ गई.निम्न शेर विशेष पसंद आय :

क्या क्या सवाल मेरी नज़र पूछती रही
लेकिन वो आंख थी कि बराबर झुकी रही

शामे-विदा-ए-दोस्त का आलम न पूछिये
दिल रो रहा था लब पे हंसी खेलती रही

आप अगर चाहें तो कुछ कांटे भी इस में डाल दें
मेरे दामन में पड़े हैं फूल मुरझाये हुये

एक बार पुनः आपका शुक्रिया.

चन्द्र मोहन गुप्त

सतपाल said...

ek mahshar sa gulistan mein bapaa ho jayegaa
aye malihabad ke rangii gulistaaN alvidaa,

इस क़दर तुंद है रफ़्तारे-हयात
वक़्त भी रिश्ता बपा लगता है
शोर सा एक हर एक सिम्त बपा लगता है.
वो खमोशी है कि लम्हा भी सदा लगता है.

और
हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है
क्योंकि दोनो का (बरपा और बपा ) अर्थ एक ही है
और बपा बहर ले लिहाज़ से भी सही है तो होन तो बपा ही वाहिए .

रंजन गोरखपुरी said...

क्या क्या सवाल मेरी नज़र पूछती रही
लेकिन वो आंख थी कि बराबर झुकी रही

फिर नज़र आती है नालां मुझ से मेरी हर ख़ुशी
सामने से फिर कोई गुज़रा है मुंह फेरे हुये

क्या जचे 'रहबर` ग़ज़ल-गोई किसी की अब हमें
हम ने उन आंखों को देखा है ग़ज़ल कहते हुये

Beshaq, saadgi ki sundarta atulneey hai!!
Shat shat naman us qalam ko jisne "tere khat ..." jaisi tehreer ataa ki!!

Satpal Sahab, aapko punh aabhaar!!

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

साधुवाद.

गौतम राजरिशी said...

बहुत-बहुत शुक्रिया सतपाल जी रहबर साब की गज़लों को यहाँ पढ़वाने के लिये। वैसे इन गज़लों का संग्रह तो मेरे पास था ही ,लेकिन एक शेर है जिसे जितनी बार पढ़्ता हूँ रहबर साब के सोचने के अंदाज़ पर बरबस मुस्कुरा उठता हूँ "तुम अगर छू लो तबस्सुम-रेज़ होंटों से इसे/देर ही लगती है क्या कांटे को गुल होते हुये"

...और ’बरपा’ / ’बपा’ पे इतने सारे शेर इकट्ठा देख कर मजा आ गया

श्रद्धा जैन said...

bahut bahut shukriya rajendra ji ko padhkar bhaut achha laga

aur jaankari main ezafa bhi hua

barpa aur bapa ko samjha

aisi hi charcha is manch ki khasiyat hai
yaha aakar hamesha hi bahut kuch padne milta hai


dhanyvaad

"अर्श" said...

rahabar sahab ki gazalon se parichay kara diya aapne ... kya gazab kiya sahab aapne ... satpaal jee... dono hi gazalen behat khubsurat aur mithas liye jaisa ki adarniya praan sahab ne kaha hai ... dhero badhai sahab ...


arsh

श्याम सखा‘श्याम’ said...

बहुत अच्छा ब्लॉग और रहबर साहिब तो क्या कहने।
श्याम सखा‘श्याम’

shipraak said...

laajawab ! bahut badhiya.........rehbar saa'b ko humari taraf se dhero badhai .

har sher unka aankhon se dil me utar gaya
hum sochte hi reh gaye aur jadu kar gaya

bahut khoob
shipra verma

manu said...

वाह सतपाल जी,
मैं भी बरपा और बपा से कन्फ्यूज हो कर ही आया था....पर आपने इतने सारे उदाहरन दे दिए वो भी प्रामाणिक और सटीक .... सारा संशय ख़तम हो गया.............
शुक्रिया हम ख्याल

प्रकाश बादल said...

भाई सतपाल जी


आप जो काम ग़ज़ल के लिए कर रहे हैं मैं उसके लिए आपको प्रणाम करता हूँ। रहबर साहब की ग़ज़लें पढ़कर मज़ा आ गया शुक्रिया।