Saturday, November 21, 2009

तरही की अंतिम क़िस्त













मिसरा-ए-तरह "तुझे ऐ ज़िंदगी , हम दूर से पहचान लेते हैं" पर अंतिम दो ग़ज़लें

कुमार ज़ाहिद

वो जो दिल ही नहीं लेते हैं अक्सर जान लेते हैं
उन्हें हम बारहा दिल से दिलो-जां मान लेते हैं

ये गुल, गुलशन,ये शहरों की हंसीं रंगीनियां सारी
ये चादर नींद में ख्वाबों की है हम तान लेते हैं

कभी खुलकर नहीं रोती,कभी शिकवा नहीं करती
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

किसे मंज़िल नहीं मिलती, किसे रस्ता नहीं मिलता
सुना है मिलता है सब कुछ अगर हम ठान लेते हैं

सतपाल ख़याल

हम आँखें देखकर हर शख़्स को पहचान लेते हैं
बिना जाने ही अकसर हम बहुत कुछ जान लेते हैं

वही उतरा हुआ चहरा, वही कुछ सोचती आँखें
तुझ ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

ज़रा सा सर उठाता है खुशी का जब कोई अंकुर
घने बरगद ग़मों के इसपे सीना तान लेते हैं

बज़ुर्गों की किसी भी बात का गुस्सा नहीं करते
कि हम हर हाल में अपनी ही ग़लती मान लेते हैं

ज़रूरी तो नहीं हर काम का हासिल हो दुनिया में
तेरी गलियों की अक़सर खाक भी हम छान लेते हैं

ये जलवे हुस्न के का़तिल ख़याल इनसे बचे रहना
ये दिल लेते हैं पहले और फिर ये जान लेते हैं

16 comments:

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जनाब सतपाल 'ख्याल' साहब,
इब्तदा से आखिर तक,
ये कोशिश बहुत कामयाब रही.
मुबारकबाद
आपका ये शेर तो माशा अल्लाह मेरी ग़ज़ल के मतले का गोया जवाब ही बन गया-
बज़ुर्गों की किसी भी बात का गुस्सा नहीं करते
कि हम हर हाल में अपनी ही ग़लती मान लेते हैं
आपका ये शेर अलग ही अंदाज़ का रहा-
ज़रूरी तो नहीं हर काम का हासिल हो दुनिया में
तेरी गलियों की अक़सर खाक भी हम छान लेते हैं
जनाब 'कुमार ज़ाहिद' साहब की ग़ज़ल भी पसंद आई.
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

नीरज गोस्वामी said...

जनाब सतपाल साहब तरही मुश्यारे की कामयाबी के लिए दिली मुबारकबाद कबूल फरमाएं.

कभी खुलकर नहीं रोती,कभी शिकवा नहीं करती
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

कुमार साहब ने बहुत खूबसूरत गिरह लगी है..इस ग़ज़ल के लिए उन्हें दाद देता हूँ.

सतपाल साहब मुशायरे को आपने अपनी ग़ज़ल से लूट लिया ऐसे ऐसे शेर कहें है आपने अपनी ग़ज़ल में की हर शेर पर ढेरों दाद और तालियाँ बजाने को दिल कर रहा है. तरही को आपने बुलंदियों पर पहुँचाया है.

वही उतरा हुआ चहरा, वही कुछ सोचती आँखें
तुझ ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

वाह...क्या तारीफ़ करूँ इस शेर की लफ्ज़ नहीं मिल रहे...वाह...

ज़रा सा सर उठाता है खुशी का जब कोई अंकुर
घने बरगद ग़मों के इसपे सीना तान लेते हैं

ग़ज़ब का शेर कहा है...नया अंदाज़ और कहन की सादगी ने लूट लिया हमें...बेहतरीन...

बज़ुर्गों की किसी भी बात का गुस्सा नहीं करते
कि हम हर हाल में अपनी ही ग़लती मान लेते हैं

इस शेर ने तो जान ही लेली...उठ कर तालियाँ बजा रहा हूँ...दिल खुश कर दिया आपने...बहुत दिनों बाद ऐसा शेर कहा है जो बिना किसी रूकावट के सीधे दिल में उतर गया है...बहुत बहुत बधाई आपको इस शेर के लिए...
आप ऐसे ही लिखते रहें....हमेशा...आमीन....

नीरज

सतपाल said...

shukria shaahid saab!
naacheez ko pasand karne ka..aapka ye kahna
""आपका ये शेर अलग ही अंदाज़ का रहा-
ज़रूरी तो नहीं हर काम का हासिल हो दुनिया में
तेरी गलियों की अक़सर खाक भी हम छान लेते ""

mujhe duvidha me Daal gaya, huzoor! agar she'r achcha na laga ho to muafee chahta hooN aur agar andaz pasand aaya ho to ye gustakhi agalee baar bhi duhraa doonga..

MUFLIS said...

तर`ही मिसरे पर कही गयी सभी गज़लें
पढ़ ली हैं ....
हर गज़लकार ने अपनी तरफ से
पूरी पूरी कोशिश की अछा कहने की ....

कुमार ज़ाहिद साहब ki ग़ज़ल दिल तक
दस्तक दे रही है ......
उन्हें शायद मैंने पहले नहीं
पढ़ा है....मेरी ही ग़लती रही होगी .
ज़ाहिद साहब को मुबारकबाद .

और जनाब सतपाल "ख़याल" जी की ग़ज़ल भी
तवज्जो ki हक़दार है .....
हुज़ूर ने जो गिर`हा लगाई है वोह बहुत जयादा
पसंद आई मुझे ....
"वही उतरा हुआ चेहरा, वही कुछ सोचती आँखें...."
वाह-वा .....
भई बहुत ही अछा कहा है .....
और ग़ज़ल का वो शेर भी....
"ज़रूरी तो नहीं हर काम का हासिल हो दुनिया में..."
हुज़ूर उन गलियों में हो आना भी तो
किसी भी तरह किसी हासिल से कम थोड़े ही होता है
वैसे एक गुजारिश यूं करना चाहूँगा कि
इन दोनों मिसरों के
दो अलग-अलग अश`आर हो सकते हैं
कोशिश कीजिये...
आपके लिए कोई मुश्किल नहीं है .

एक कामयाब मुशायरे के
उम्दा एहतमाम के लिए
दिली मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं .

Tilak Raj said...

अजी जनाब आप तो खुलकर छानिये खाक. और हासिल न हो यह तो हो ही नहीं सकता। खाक छानने में जो आनंद है वो और कहॉं।
मैं तो इसपर बस अभी अभी जन्‍म लिया यह शेर कहूँगा कि:
कभी सिज़दा किया उनको तो उत्‍तर ही नहीं पाया
कभी दुनिया में खोये थे तो बस दीदार उनका था।

शायर के ख्‍याल की जड़ों तक पहुँचने के लिये कुछ तो मंथन लगेगा और यहॉं शायर खुद ख्‍याल है।

तिलक राज कपूर

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जनाब 'ख्याल' साहब,
आदाब,
मुआफी तो मैं चाहता हूं, मेरे अल्फाज़ ने आपको दुविधा में डाल दिया !!
''अलग अंदाज़'' मतलब बिल्कुल साफ है,
बेशकीमती शेर दिल को छू गया हुज़ूर..
इसे रचियता नहीं,
पाठक के तौर पर पढकर देखिये,
''ज़रूरी तो नहीं हर काम का हासिल हो दुनिया में
तेरी गलियों की अक़सर खाक भी हम छान लेते हैं''
'आवारगी' को किस अंदाज़ में पेश किया है 'खालिक' ने
मेरी बात से इत्तेफाक करते हैं???
तो बहैसियत शायर, मुबारकबाद कबूल फरमायें...
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

गौतम राजरिशी said...

एक और लाजवाब मुशायरा सतपाल भाई..आखिरी के दोनों ग़ज़ल भी खूब हैं।

ज़ाहिद साब का आखिरी शेर खूब पसंद आया। जगह-जगह कहने लायक...बहुत खूब!

और सतपाल भाई आपके ये दो शेर बहुत अच्छे लगे "ज़रा सा सर उठाता है खुशी का जब कोई अंकुर
घने बरगद ग़मों के इसपे सीना तान लेते हैं" और वो तेरी गलियों की खाक़ वाला शेर। और गिरह की तारीफ़ न करूं तो नाइंसाफी होगी।

chandrabhan bhardwaj said...

Bhai Satpal ji
Pahale Is tarahi mushaire ki safalta ke liye badhai. iske pashchaat apki sunder ghazal ke liye fir se badhai Khaskar yah sher 'wahi utara hua chehra wahi kuchh sochati aankhen tujhe ye zindagi ham door se pahchaan lete hain.'Isi tarah bhai Kumar ka yah sher bhi bahut sunder ban oada hai,'Kabhi khulkar nahin roti kabhi shikva nahin karati tujhe ye zindagi ham door se pahchaan lete hain.bahut bahut badhai
Chandrabhan Bhardwaj

kavi kulwant said...

bahut khoob satpaal ji..

सतपाल said...

आप सब का शुक्रगुज़ार हूँ,आपकी राय और मशविरे
सर आँखों पर। शाहिद भाई , मुफ़लिस जी और नीरज जी आपका तहे-दिल से शुक्रिया। ये बज़्म हम सब शायर मिज़ाज लोगों की है और इसे ऐसे ही शे’रों के चराग़ों से सजाते रहिए और विनती यही कि अपनी राय और सताइश दर्ज कर दिया करें।
शायरी अगर इबादत बन जाए तो शे’र खु़द मालिक ही कहता है ,इन्सान तो ज़रिया बन जाता है और बज़ुर्गों का आशीर्वाद और द्विज जी..उनके लिए यही कह सकता हूँ-
मैं नींवी मेरा मुर्शद उच्चा
असां उच्चियां दे नाल लाई
सदके जां उन्नां उच्चियां दे
जिनां नींविआं नाल निभाई...

रब राखा!!!

समयचक्र - said...

हम आँखें देखकर हर शख़्स को पहचान लेते हैं
बिना जाने ही अक़सर हम बहुत कुछ जान लेते हैं
बहुत बढ़िया मिसेया है वाह भाई सतपाल जी धन्यवाद

"अर्श" said...

सतपाल जी मुशायरे की सफलता के लिए दिल से ढेरो बढ़ाई
आहीरी किश्त की दोनों ही ग़ज़ल कमाल की है...
जाहिद साब का यह शे'र क्या खूब कही है उन्होंने ...
ये गुल, गुलशन,ये शहरों की हंसीं रंगीनियां सारी
ये चादर नींद में ख्वाबों की है हम तान लेते हैं
और आपके शे'र खुद बोलते हुए होते हैं....जिस तरह से आपने गिरह
लगाई है वो या अल्लाह अब क्या कहूँ दिल से वाह वाह निकल रहा है
बहुत बहुत बधाई इस मुकम्मल मुशायरे के लिए ...


अर्श

सुलभ सतरंगी said...

ज़रूरी तो नहीं हर काम का हासिल हो दुनिया में
तेरी गलियों की अक़सर खाक भी हम छान लेते हैं..

-

सतपाल जी, यह सफ़र तो कामयाब रहा.
- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

निर्झर'नीर said...

ज़रा सा सर उठाता है खुशी का जब कोई अंकुर
घने बरगद ग़मों के इसपे सीना तान लेते हैं

बज़ुर्गों की किसी भी बात का गुस्सा नहीं करते
कि हम हर हाल में अपनी ही ग़लती मान लेते हैं

khoobsurat sher lage gazal ke

psingh said...

behtrin gajal wah

psingh said...

bahut khub nice gazal
bahut bahut abhar