Saturday, October 10, 2009

माधव कौशिक की ग़ज़लें और परिचय













उर्दू में कही जाने वाली ग़ज़ल के लहजे के समानांतर ग़ज़ल की एक नवीन धारा बह रही है जिसे देवनागरी मे लिखा जा रहा है और यकीनन इसने एक नया लहजा इख्तियार किया है जो सराहा भी जा रहा है। लेकिन मैं ये भी मानता हूँ कि उर्दू में कही जाने वाली ग़ज़ल को सिरे से नकार कर आप इस विधा को अलग दिशा नहीं दे सकते और आज तो दोनों भाषाएँ के शायर एक दूसरे से बहुत कुछ सीख भी रहे हैं और यही एक सही रास्ता भी है।

खै़र ! आज हम इसी नई धारा के एक क़दावर शायर से आपका परिचय करवा रहें हैं। इनका नाम है माधव कौशिक और आप चंडीगड़ साहित्य अकादमी के सचिव हैं, इनके अब तक नौ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 1953 में हरियाणा में जन्में माधव जी एक इमानदार शायर हैं। अपने ग़ज़ल संग्रह की भूमिका में आपने कहा है कि आप साहित्य में इश्तेहारबाजी में यकीन नहीं रखते और घर पर बैठकर पढ़ना लिखना पसंद करते हैं। आपकी तीन ग़ज़लें और कुछ अशआर हाज़िर हैं-

एक

पानी से धुंध, धूप, हवा काट रहा हूँ
किस्मत मेरे जो था लिखा काट रहा हूँ

अपने किए हुए की खु़दा जाने कब मिले
अब तक तो दूसरों की सज़ा काट रहा हूँ

ग़र दे सके तो मेरी तू हिम्मत की दाद दे
पलकों से पत्थरों की शिला काट रहा हूँ

ए दोस्त! बुरे वक़्त की संगीनियां तो देख
बैठा हूँ जिसपे वो ही तना काट रहा हूँ

छंटते ही नहीं ज़ेहन से सवालों के अँधेरे
हर रोज़ रौशनी का गला काट रहा हूँ

दो

पनघट की पीर गोरी की गागर न ला सके
शहरों में अपने गांव का मंज़र न ला सके

अब रहज़नो कुछ आप ही मेरी मदद करो
हम को सही मुका़म पे रहबर न ला सके

जो आदमी के ज़िस्म में रहता है पोर-पोर
उस आदमी को ज़िस्म से बाहर न ला सके

पानी से प्यास बुझ न सकी अपने दौर की
अमृत को हम ज़मींन से उपर न ला सके

बरसों से उसको हाथ में थामे रहे मगर
अधरों के पास प्यास का साग़र न ला सके

सच बोलने की दोस्तो इतनी सज़ा मिली
ग़र बच गई जुबान तो हम सर न ला सके

तीन

भरोसा क्या करे कोई तिजारत के हवालों का
न सत्ता का यकीं हमको, न सत्ता के दलालों का

दिखाई भी नहीं देता हमें उगता हुआ सूरज
अँधेरा तल्ख़ है इतना सवालों ही सवालों का

शुरू से अंत तक सब चित्र नंगे, शब्द भी नंगे
किसी वैश्या से भी बदतर हुआ हुलिया रिसालों का

तुम्हारी आँख में आँसू चमकते हैं मगर ऐसे
कि जैसे धूप में दमके कलश ऊँचे शिवालों का

कुछ चुनिंदा अशआर-

दल गया इंसान मशीनी पुर्ज़े में
हाथों की हिम्मत ख़तरे में लगती है

ख्वा में भी दूसरा कोई कभी दिखता नहीं
जाने किस की आँख का काजल मेरी आँखों मे है

को बढ़ते हुए दरिया के कानों में कहे जाकर
बहुत मुशकिल से मिट्टी का मकां तैयार होता है

इंसानीयत के दायरे मज़हब से दूर हैं
गीता से हर कुरान से आगे की बात कर

शायर का पता-
कवि माधव कौशिक
3277, सेक्टर - 45 डी
चंडीगढ़