Thursday, February 4, 2010

देवमणि पाण्डेय की ग़ज़लें














देवमणि पाण्डेय जी का 4 जून 1958 को अवध की माटी में जन्म हुआ। हिंदी और संस्कृत के सहज साधक हैं और आप कवि तो हैं ही मंच संचालन के महारथी भी हैं। सुगम संगीत से लेकर शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों का सहज-संचालन करते हैं। दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं - दिल की बातें और खुशबू की लकीरें। इन्होंने पिंजर, हासिल और कहाँ हो तुम जैसी कई फिल्मों के लिए गीत लिखेहैं। पिंजर के बहु चर्चित गीत "चरखा चलाती माँ" को साल 2003 के लिए बेस्ट लिरिक ऑफ दि इयर का अवार्ड मिला है। फिलहाल मुंबई में भारत सरकार के श्रमिक हैं।

सबसे पहले इनकी ग़ज़ल-

चमन को फूल घटाओं को इक नदी मिलती
हमें भी काश कभी अपनी ज़िंदगी मिलती

..सुनते हैं। गायक हैं राज कुमार रिज़वी-



अब ये ग़ज़ल आपकी नज़्र है-

खिली धूप में हूँ, उजालों में गुम हूँ
अभी मैं किसी के ख़्यालों में गुम हूँ

कहाँ जाके ठहरेगी दुनिया हवस की
नए दौर के इन सवालों में गुम हूँ

दिखाएं जो इक दिन सही राह सबको
मैं नेकी के ऐसे हवालों में गुम हूँ

मेरे दौर में भी हैं चाहत के क़िस्से
मगर मैं पुरानी मिसालों में गुम हूँ

मेरे दोस्तों की मेहरबानियाँ हैं
कि मैं जो सियासत की चालों में गुम हूँ

मेरी फ़िक्र परवाज़ करके रहेगी
भले मैं किताबों, रिसालों में गुम हूँ

मुत़कारिब(122x4) मसम्मन सालिम

दूसरी ग़ज़ल से पहले मैं कुछ चर्चा करना चाहता हूँ। आज जो ग़ज़ल लिखी या कही जा रही है वो दो हिस्सों में विभाजित होती नज़र आ रही है। एक , जो उर्दू बहरों के अनुरूप कही जा रही है जो बहरों के नियम-क़ानून का पालन करती है लेकिन लिखी देवनागरी में जा रही है और दूसरी जो देवनागरी में लिखी जा रही है,जो हिंदी के छंदों के अनुरूप कही जा रही है जिसमें शायर ज़्यादातर मात्रिक छंदों से काम लेता और मात्राओं की गणना करके ग़ज़ल पूरी कर लेता है और अब हिंदी और उर्दू दोनों में दोनों तरह से ग़ज़ल कही जा रही है। आज श्री आर. पी शर्मा जी ने बताया कि उर्दू के शायर अज़मतुल्ला खां ने मात्रिक छंदों में काफ़ी ग़ज़लें कही जो सराही भी गाईं।

अब मैं ये बात कहना चाहता हूँ कि जो ग़ज़ल बहर के अनुरूप होती है उसकी लय तो सुनिश्चित ही होती हैं क्योंकि लघु-गुरू की तरकीब इनमें बदलती नहीं। दोनों मिसरों में एक जैसी रहती है लेकिन जब हम ग़ज़ल कहने के लिए मात्रिक छंद का चुनाव करते हैं तो लय उतनी सुनिश्चित नहीं होती जितनी बहर में होती है और हाँ तीसरी बात वार्णिक छंदों और बहर में काफ़ी समानता है लेकिन शायर वार्णिक छंदों का इस्तेमाल नही करते क्योंकि काम थोड़ा मुश्किल हो जाता है जैसा कि बहर में लिखते वक़्त होता है। मीर ने भी हिंदी मीटर का प्रयोग किया जिसे आज हम अमूमन मीर का मीटर भी कह लेते हैं। मैं दोनों पक्षों का हिमायती हूँ लेकिन मेरा झुकाव ज़्यादा ग़ज़ल को बहर के अनुरूप कहने का है जिसे मैं मात्रिक ग़ज़ल से ज़्यादा लययुक़्त मानता हूँ।

इस पूरे विषय पर श्री आर. पी शर्मा का ये लेख ज़रूर पढ़ लें...

http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2005/ghazal/ghazal04.htm

अब ये ग़ज़ल जिसे पांडेय जी ने मात्रिक छंद में कहा है पेश है( प्रत्येक चरण ३० मात्रा)

ख़्वाब सुहाने दिल को घायल कर जाते हैं कभी कभी
अश्कों से आँखों के प्याले भर जाते हैं कभी कभी

मेरे शहर में मिल जाते हैं ऐसे भी कुछ दीवाने
रातों-दिन सड़कों पर भटकें घर जाते हैं कभी कभी

पल पल इनके साथ रहो तुम इन्हें अकेला मत छोड़ो
अपने साए से भी बच्चे डर जाते हैं कभी कभी

खेतों को चिड़ियां चुग जातीं बीते कल की बात हुई
अब तो मौसम भी फ़सलों को चर जाते हैं कभी कभी

आँख मूँदकर यार किसी पर कभी भरोसा मत करना
अपने दोस्त भी सर पे तोहमत धर जाते हैं कभी कभी

अगर किसी पर दिल आ जाए इसमें दिल का दोष नहीं
अच्छा चेहरा देखके हम भी मर जाते हैं कभी कभी

जिनके फ़न को दुनिया अकसर अनदेखा कर देती है
ऐसे लोग जहाँ को रोशन कर जाते हैं कभी कभी

न पीने की आदत हमको न परहेज़ है पीने से
हम भी जाते हैं मयख़ाने पर जाते हैं कभी कभी

अब दिमाग़ों की ताज़गी के लिए देव मणि साहब की ग़ज़ल

जब तलक रतजगा नहीं चलता
इश्क क्या है पता नहीं चलता

एक बार फिर राज कुमार रिज़वी की आवाज़ में-

11 comments:

रंजना said...

इतना सब देख सुन पढ़ सीख और समझ कर यदि कहने लायक कोई एक शब्द पास बचा रहता है तो वह है....कोटिशः आभार....
आनंद आ गया..और क्या कहूँ...

नीरज गोस्वामी said...

दमदार रचनाएँ और उतनी ही असरदार आवाज...और क्या चाहिए...आपने तो समां बाँध दिया...शुक्रिया सतपाल जी बहुत बहुत शुक्रिया...
नीरज

तिलक राज कपूर said...

सतपाल भाई, मुझे ग़ज़ल का ज्ञान कम है इसलिये मेरे लिये संशय की एक स्थिति निर्मित हो गयी है।
क्‍या दो पंक्तियों का कोई भी छंद जिसमें रुक्‍न (मूल या जिहाफ़ शक्‍ल में) न हों ग़ज़ल कहा जा सकता है?
मेरा मानना है कि अपनी सुविधा के अनुसार इसे परिभाषित करने का प्रचलन बढ़ गया है। अगर मैं कहूँ कि हिन्‍दी ग़ज़ल जैसा कुछ है ही नहीं तो विवाद खड़ा हो जायेगा। ऐसा कहने का मेरा आधार यह है कि हिन्‍दी काव्‍य शास्‍त्र में ग़ज़ल संबंधी नियम अभी भी नहीं हैं और जब तक काव्‍य शास्‍त्र में ग़ज़ल के नियम न आ जायें, ‘हिन्‍दी ग़ज़ल’ को भी हिन्‍दी शब्‍दावली का उपयोग करते हुए देवनागरी लिपि में लिखी ग़ज़ल कहना पर्याप्‍त होगा। थोड़ा सरल कहने के लिये इसे यदि ‘हिन्‍दी ग़ज़ल’ कहा भी जाता है तो अनावश्‍यक रूप से हिन्‍दी छंदो से इसका संबंध जोड़ना उचित नहीं है। ग़ज़ल प्रचलित नियमों के अनुसार केवल मात्रिक ही होती है, हॉं कुछ वर्णिक छंद ऐसे हैं जिनका दीर्घ-हृस्‍व क्रम किसी बह्र के समान है लेकिन ये छंद एक विश्‍ोष स्थिति पैदा करते हैं जिसमें वर्णिक छंद तो बह्र में फिट हो जाता है लेकिन उस बह्र में कहा गया हर शेर वर्णिक छंद में फिट हो जाये ये जरूरी नहीं । मात्रिक छंदों में विपरीत स्थिति है। उदाहरणस्‍वरूप ‘दोहा’ के नियम का पालन करते हुए बह्र तो हो सकती है लेकिन हर दोहा उस बह्र पर फिट हो जाये ये जरूरी नहीं। दोहा चरण की कुल मात्राओं की गणना पर आधारित होता है जबकि बह्र रुक्‍न-ब-रुक्‍न मात्रिक-क्रम पर।
अर्तजाल की सुविधाओं का उपयोग करते हुए इस विषय पर ऑनलाईन कान्‍फ्रेंस द्वारा एकबार हिन्‍दी ग़ज़ल को प्रामाणिक स्‍वरूप देना अब संभव भी हो गया है और आवश्‍यक भी।

सतपाल ख़याल said...

तिलक जी,
अगर हम मात्रिक छंद के हवाले से बात करें तो कोई एक मिसरा पकड़ लीजिए जो लय में लगे और फिर शुरू हो जाइए, जो हो भी रहा है और फिर मात्राएँ गिन कर निपटा दीजिए लेकिन मैं किसी को ऐसा करने के लिए कहूँगा नहीं।
निर्धारित बहरों में लिखें तो ज़्यादा सही है लेकिन एक बात और है बहरे-मुतदारिक की मुज़ाहिफ़ शक्लें और मात्रिक छंदों में ज़रा सा फ़र्क है और एक बात और भी है कि मात्रिक छंदों में भी मिठास बराबर है। मैं तो ये कहता हूँ कि आप मात्रिक छंद चुनो लेकिन जो गुरू-लघु की तरकीब भी follow कर लो तो सोने पे सुहागा हो जाएगा और शब्दों में लय और उभर कर सामने आएगी।
खेतों को चिड़ियां चुग जातीं बीते कल की बात हुई
अब तो मौसम भी फ़सलों को चर जाते हैं कभी कभी
अब इसमें जो scheme गुरू-लघु की पहले मिसरे में है वो अगर दूसरे में भी हो मज़ा दूना हो जाएगा। लेकिन ये भी सही है और इस पर आर.पी शर्मा जी जैसे अरूज़ी भी मोहर लगाते हैं और उनका कहा तो हमारे लिए हर्फ़े-आख़िर है और देव मणि पांडेय जी एक निपुण ग़ज़लकार हैं और गीतकार भी सो उनका लय के साथ नाता तो बहुत गहरा है और रिज़वी साहब की आवाज़ उनकी ग़ज़लों को चार चाँद लगाती है।
धन्यवाद

kavi kulwant said...

umda gazalen..

तिलक राज कपूर said...

सतपाल जी,
आभारी हूँ, आपने मेरे सामने खड़े एक प्रश्‍न का सहजता से उत्‍तर दे दिया है। वस्‍तुत: भाई देवमणि जी की रचनाओं पर बात करने से पहले मैं अपने ही प्रश्‍न के उत्‍तर की तलाश में उलझ गया और इतनी प्‍यारी ग़ज़लों पर कुछ भी नहीं कहा।
ग़ज़लें तो माशाअल्‍लाह, एक से बढ़कर एक शेर हैं किस किस की तारीफ करूँ?

अगर किसी पर दिल आ जाए इसमें दिल का दोष नहीं
अच्छा चेहरा देखके हम भी मर जाते हैं कभी कभी

पर तो एक शेर कहने से रुक नहीं पा रहा कि:
सजधज के कोई आये, और आप नहीं देखें,
ये ज़ुल्‍म है एै लोगों, हद से भी बहुत आगे।
अब भाई मरना, गिरना तो चलता रहता है सारी उम्र, कभी किसी पे कभी किसी पे। क्‍यूँ न उसपर मरा जाये जो मरने पर सम्‍हाल लेता है।

महर्षि साहब की सात किताबों के बारे में सुना है, अगर आप प्राप्‍त करने का जरिया बता सकें तो मेहरबानी होगी।

sumita said...

बहुत खूबसूरत गज़ल और दमदार आवाज ने इस गज़ल को मुक्क्मल बना दिया। देवमणि जी की गजलों की जितनी भी तारीफ़ की जाय कम है।

निर्मला कपिला said...

ांअज आपके ब्लाग से उमदा गज़लें तो पढने को मिली ही मगर बहुत कुछ सीखने को भी मिला मुझ जैसे अनजान के लिये तो किसी खजाने से कम नही। देवमणि पाण्डेय जी जैसे गज़ल के उस्ताद को मैं कमेन्ट क्या दे सकती हूँ लाजवाब लगी निशब्द हूँ सतपाल जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद्

devmanipandey.blogspot.com said...

आप सब सहृदय लोगों के इतने सुंदर और सार्थक कमेंट पढ़कर मेरा हौसला बढ़ गया है। बहुत-बहुत शुक्रिया । आपने सच कहा- 'आज की ग़ज़ल'तो ग़ज़ल लेखन की कार्यशाला है । इस टीम के सभी सदस्यों को इस श्रेष्ठ कार्य के लिए बधाई ।

देवमणि पाण्डेय

सतपाल ख़याल said...

Shukria Devmani ji

ye to aapka baRappan hai varna hamara kya vajood.Apna aashirvaad dete rahiye .
regards

Saket Ranjan Praveer said...

भाई देवमणि पाण्डेय जी की ग़ज़ल "खिली धूप में हूँ उजालों में गुम हूँ" पढ़ी. अच्छी लगी. ग़ज़ल पढ़ के लगा कि किसी बहर और औजान के जानकर ने ग़ज़ल कही है. आखिर में बहरे मुतकारिब मुसम्मन बता कर इसका एहसास भी कराया गया है. लेकिन मिसरा "मेरे दोस्तों की मेहरबानियाँ हैं" बेबहर हो गया है. मेहरबानी में ह मुतहर्रिक नहीं है. लिहाज़ा मेहरबानी का वज़न मुफाईलुन न होकर फाइलातुन होता है. अतः मेहरबानियाँ का वज़न फ़ऊलुनफ़ऊ न होकर फ़ाइलुनमिफ़ा हो जाएगा. अगर मिसरा ऐसा होता "मेरे दोस्तो मेहरबानी तुम्हारी" तो वज़न के ऐतबार से मिसरा ठीक हो जाता.
कोई साधारण शायर होता तो मैं इतनी सारी बातें नहीं लिखता. लेकिन पाण्डेय जी एक मशहूर शायर हैं इसीलिए इतना कुछ कहना ज़रूरी समझता हूँ.
बहरहाल ये एक बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल है.
साकेत रंजन प्रवीर
saket07@rediffmail.com