Saturday, February 20, 2010

दिनेश ठाकुर की ग़ज़लें











1963 में उदयपुर में जन्में दिनेश ठाकुर आजकल राजस्थान पत्रिका में वरिष्ट सामाचार संपादक हैं। एक ग़ज़ल संग्रह" हम लोग भले हैं कागज़ पर" छाया हो चुका है। फ़िल्म समीक्षक भी रह चुके हैं और पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। हाल ही में अनुभूति पर इनकी ग़ज़लें शाया हुईं और इनके कुछ शे’रों ने मुझे बहुत प्रभावित किया, सो मेल करके इनसे ग़ज़लें मंगवाईं जो आज आपकी नज़्र करूँगा। पहले इनके कुछ अशआर मुलाहि्ज़ा कीजिए-

गज़ल

जहाँ लफ्ज़ डमरू के किरदार में हैं
सुखन मेरा उस शायरी से अलग है

तेरी याद के जुगनुओं की क़सम
ये बारिश के छींटे शरारे हुए

दुःख की तितली के पंखों पर
बाँधो सुख का धागा लम्बा

ये शे’र अपने आप में एक ताज़गी और नयापन ज़ाहिर कर रहे हैं और ग़ज़ल के लहजे को भी बर्करार रखे हुए है। यही एक सफल शायर की निशानी है कि वो किस तरह ग़ज़ल की नज़ाकत का भी ख़याल रखता है और नए प्रयोग भी कर लेता है। इस नए लहजे के बारे में बशीर बद्र साहब का ये शे’र क़ाबिले-ग़ौर है-

कोई फूल धूप की पत्तियों मे हरे रिबन से बंधा हुआ
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया , न कहा हुआ न सुना हुआ

ग़ज़ल तक़रीबन 800 साल पहले अपने काँधे पर सुराही लेकर हिंदुस्तान में दाख़िल हुई। तब से खुसरो से लेकर मुनव्वर राना तक हर शायर ने इसे अपने रंग में रंगना चाहा। किसी ने इसके हाथ में मशाल थमा दी, किसी ने इसके दुपट्टे को तसव्वुफ़ के रंग में रंग दिया,किसी ने इसे कोठे पे बिठा दिया, कोई मैखाने तक ले गया, किसी ने इसे हिज़्र-मिलन के पाठ पढ़ाए और आज तो ग़ज़ल के मायने ही बदल रहे हैं। ग़ज़ल अब संसद मे नज़र आती है, सड़कों पर नज़र आती है। मुनव्वर राना जैसे शायरों ने इसे माँ के रूप में देखा, बेटी भी कहा और लोगों ने इसे सराहा और क़बूल किया। दुश्यंत ने अपने अंदाज़ में इसे लिया, लेकिन वही शायर सफ़ल हुए जिन्होंने प्रयोग तो किए लेकिन ग़ज़ल के असली रंग-रूप, उसकी नज़ाकत, उसकी कोमलता और उसके ख़ास लहजे को ठेस नहीं पहुँचाई और वो शायर जिन्होंने इसकी आत्मा बदलनी चाही वो सफ़ल नहीं हुए। उदाहरण के तौर पर पानी भले बर्फ़ बन जाए, हवा बन जाए, नदी हो जाए या बादल बनकर बरसे लेकिन रहता पानी ही है, essence of water is not changed ,उसी तरह ग़ज़ल की ये essence ये रूह नहीं बदलनी चाहिए और वो होनी भी नई चाहिए। जिसे लोग पढ़कर ही कहें कि ये फ़लां शायर की है।

मेरी ग़ज़ल को मेरी ग़ज़ल होना चाहिए
तालाब में मिस्ले-कंवल होना चाहिए
..मुनव्वर राना

ग़ज़ल में ये नयापन लाना बहुत कठिन है। इस बात को मुनव्वर साहब के ये शे’र देखें कैसे बयान करता है-

बहुत दुश्वार है प्यारे ग़ज़ल में नादिराकारी
ज़रा सी भूल अच्छे शे’र को *मोहमल बनाती है


* (निरर्थक) *नादिराकारी- art of perfection

अब दिनेश ठाकुर की ये ग़ज़ल बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक्ल में

हम यूँ महदूद हो लिये घर में
हँस लिये घर में, रो लिये घर में

जाने किस फूल की तमन्ना थी
ख़ार ही ख़ार बो लिये घर में

जिससे हासिल सबक़ करें बच्चे
इस सलीक़े से बोलिए घर में

वो समझते हैं दिन अमन के हैं
एक मुद्दत जो सो लिये घर में

चारागर पूछता सबब जिनके
हमने वो ज़ख़्म धो लिये घर में

*महदूद-सीमित

मैं तो समझता हूँ कि हम ग़ज़ल की नींव नहीं बदल सकते लेकिन ऊपर मकान अपने ढंग से बना सकते हैं। नींव जितनी अच्छी होगी मकान मज़बूत होगा जैसे लता मंगेशकर गाए भले पाप लेकिन उनका क्लासिकल बेस उस पाप को बेमिसाल बना देता है ऐसा ही शायर के साथ भी है। बिना क्लासिकल पढ़े-सुने कोई शायर थोड़े बन सकता है। गा़लिबो-मीर को जाने समझे बिना शायर होना बेसुरा गायक होने जैसा है। मैनें जब द्विज जी को अपने ये शे’र सुनाए-

नाती-पोतों ने ज़िद्द की तो
अम्मा का संदूक खुला है

घर में हाल बजुर्गों का अब
पीतल के वर्तन जैसा है

तो उन्होंने कहा अब तुम निकले अपने खोल के बाहर । इसी नयेपन की ज़रूरत है लेकिन..essence of ghazal should not change ये एक शर्त है। बशीर साहब ने भी चेताया है-

शबनमी लहजा है आहिस्ता ग़ज़ल पढ़ना
तितली की कहानी है फूलों की ज़बानी है

शायरी में दोहराव भी बहुत है जिसकी वज़ह से कई बार ऊब भी पैदा होती है । बहुत कुछ कहा जा चुका है और उसी बहुत कुछ कहे हुए को फिर से कहना है । शायद इसीलिए नए लहजे की ज़रूरत ज़्यादा है। एक ही बात को ज़रा से फ़ेर कह देने का चलन बहुत है -

न जाने कौन सी मज़बूरियों का क़ैदी हो,
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो..राहत इंदौरी

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता..बशीर बद्र

जिन्हें तुम ने समझा मेरी बेवफ़ाई
मेरी ज़िन्दगी की वो मज़बूरियां थीं..आनंद बख़्शी

(ये बहुत बड़े शायर है और शायरी का मान हैं ये शे’र खाली हम जैसे नए शायरों के समझने के लिए हैं)

दिनेश ठाकुर की एक और ग़ज़ल बहरे-खफ़ीफ़ की मुज़ाहिफ़ शक्ल में

यूँ जो वादों से पेट भर जाते
हम तो बदहजमियों से मर जाते.

सबने चेहरे बदल लिये वरना
आदमी आदमी से डर जाते.

काम-धंधे से लग गए ज़ाहिद
हम न होते तो ये किधर जाते.

ख़ुशख़रामी भी रास आ जाती
आप सच बोलकर मुकर जाते.

सबके सब हम पे धर दिए क्योंकर
कुछ तो इल्ज़ाम उसके सर जाते.

हमसुबू कब गए पता ही नहीं
तू उठाता तो हम भी घर जाते

*ख़ुशख़रामी-खूबसूरत चाल *हमसुबू- एक सुराही से पीने वाले

शायरी में दोहराव से तंग आकर द्विज जी का ये शे’र देखें क्या कहता है-

झूमती, लड़खड़ाती ग़ज़ल मत कहो
अब कहो ठोकरों से सं‘भलती ग़ज़ल


ये देखिए ताज़गी और नयेपन का नमूना बशीर बद्र साहब का शे’र-

ज़हन में तितलियां उड़ रहीं थी बहुत
कोई धागा नहीं बाँधने के लिए

यक़ीनन ख़यालात तो सबके एक जैसे ही हैं और हमारे एहसास भी एक जैसे, द्विज जी ने एक दिन बताया कि..

what you said is not important but how beautifully we said it, how beautifully we express it, how diffrently we explain it, is something which is very important in poetry.

वो ग़ज़ल पढ़ने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था
सिर्फ़ ग़ज़लें ही नहीं लहजा भी ग़ज़ल जैसा था..
मुनव्वर राना

दिनेश ठाकुर की एक और ग़ज़ल( ७ फ़ेलुन+ १ फ़े)

पनघट, दरिया कैसे हैं, वो खेत, वो दाने कैसे हैं
रब जाने अब गाँव में मेरे यार पुराने कैसे हैं

जिसको छूकर सब हमजोली झूठी क़समें खाते थे
अब वो पीपल कैसा है, वो लोग स्याने कैसे हैं

छिप-छिपकर तकते थे जिसको अब वो दुल्हन कैसी है
सास, ससुर, भौजी, नंदों के मीठे ताने कैसे हैं

पहली-पहली बारिश में हर आँगन महका करता था
छज्जों का टप-टप करना, वो दौर सुहाने कैसे हैं

रोज़ सुबह इक परदेसी का संदेशा ले आती थी
उस कोयल की चोंच मढ़ाने के अफ़साने कैसे हैं

दिन भर जलकर और जलाकर सूरज का वो ढल जाना
शाम की ठंडी तासींरे, चौपाल के गाने कैसे हैं

परबत वाले मंदिर पे क्या अब भी मेला भरता है
घर से बाहर फिरने के सद शोख़ बहाने कैसे है

यक़ीनन जिस नयेपन और ताज़गी की हम बात करते हैं दिनेश ठाकुर की ये ग़ज़लें उसका प्रमाण हैं। मुनव्वर साहब के इस शे’र के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं-

बेसदा ग़ज़लें न लिख वीरान राहों की तरह
खामुशी अच्छी नहीं आहों कराहों की तरह

19 comments:

Suman said...

पनघट, दरिया कैसे हैं, वो खेत, वो दाने कैसे हैं
रब जाने अब गाँव में मेरे यार पुराने कैसे हैंnice

तिलक राज कपूर said...

जब ग़ालिब साहब ने कहा कि 'रग़ों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो ऑंख ही से ना टपका तो फिर लहू क्‍या है' या 'बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता, वगरना शह्र में ग़ालिब की आबरू क्‍या है' या ऐसे ही कई और आशआर जो तत्‍कालीन व्‍यवस्‍था पर चोट करते थे तो उनके अशआर ग़ज़ल के उसी रूप को अख्‍तियार किये थे जो आज की तंजि़या शायरी में मिलते हैं। लेकिन उस समय शायद ऐसी शायरी को माना और सराहा नहीं जाता था। आज शायरी का जो रंग सुना और सराहा जाता है वह सही अर्थों में अवाम की बात का है। आज शायरी में सिर्फ तंज़ ही नहीं समस्‍याओं के हल भी तलाशे और सराहे जाते हैं।
दिनेश ठाकुर जी के शेर एक चिंतनशील शायर के हैं जो आब्‍ज़र्वेशन पर आधारित है। अच्‍छे गठे हुए शेर जो सटीक बात कहते है।
बधाई।

कंचन सिंह चौहान said...

दिनेश जी की ये ग़ज़ले सीखने वालो के लिये मददगार साबित होगी...

ये पोस़्ट बार बार खीच कर लायेगी आपकी चौखट पर...!

बेवफ़ाई के खूबसूरत शेरो पर किसी को जवाब देने के लिये कहा गया एक अपना भी अदना सा शेर कहने का मन हो रहा है

बेवफ़ाई को दिया है उसने मज़बूरी का नाम,
मेरे दिलवर की ज़फ़ा की भी कुछ खास है....!

योगेश स्वप्न said...

bahut achcha laga sab padhkar , aabhaar.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

सतपाल ’ख़्याल’ साहब, आदाब
जनाब दिनेश ठाकुर साहब की लाजवाब
ग़ज़ल पेश करने के लिये शुक्रिया
ये शेर ख़ास तौर पर पसंद आये-
*********************
जिससे हासिल सबक़ करें बच्चे
इस सलीक़े से बोलिये घर में....
********************
सबने चेहरे बदल लिये वरना
आदमी आदमी से डर जाते.
*******************
पनघट, दरिया कैसे हैं, वो खेत, वो दाने कैसे हैं
रब जाने अब गाँव में मेरे यार पुराने कैसे हैं
इस गज़ल का हर शेर....गांव की मिट्टी की ख़ुशबू लेकर आया है.

वाह...वाह

devmani pandey said...

दिनेश ठाकुर की ग़ज़लों में अभिव्यक्त सोच और सरोकार सराहनीय हैं । बधाई !

dheer said...

जाने किस फूल की तमन्ना थी
ख़ार ही ख़ार बो लिये घर में

जिससे हासिल सबक़ करें बच्चे
इस सलीक़े से बोलिए घर में

यूँ जो वादों से पेट भर जाते
हम तो बदहजमियों से मर जाते.

परबत वाले मंदिर पे क्या अब भी मेला भरता है
घर से बाहर फिरने के सद शोख़ बहाने कैसे है

behad khoobsoorat ashaar! Dinesh saHeb ko meraa naman!

Satpal saHeb!
nivedan hai keh agar aap ke Dinesh ji ka email or cell number ho to unkee ijaazat se mujhe deejiyegaa. aglee baar Udaipur jaanaa huaa to une mulaaqat kee koshish karunga (Udaipur meraa native place hai)!

lekh paRh kar bahut achchhaa lagaa. naye-pan kee aapkee baat se ittefaak rakhte hue yeh hee arz hai keh, kitne hee khayaal alfaaz ke naye libaas meN baar_haa parose jaate haiN. magar dohraane ke baawjud har baar pehle saa hee asar chhoRte jaate haiN!
apna hee ek sher nazr kartaa huN keh,
bhalee baatoN ko dohraataa rahungaa maiN,
bhalee baatoN ko dohraanaa zarooree hai!

khairandesh
Dheeraj Ameta "Dheer"

निर्मला कपिला said...

सतपाल जी आज तो आपने कमाल की गज़लें पेश की हैं किस किस शेर की बात करूँ। दिनेश ठाकुर जी की गज़लें दिल को छू गयी। नये भाव नई बात बहुत खूब । दिनेश जी को बधाई आपका धन्यवाद । राजस्थान पत्रिका की नियमित पाठक हूँ दिनेश जी को यहाँ देख कर बहुत अच्छा लगा।

Anonymous said...

आदरणीय ठाकुर साहब के शेर बेहद उम्दा हैं, मालिक शेरो की तासीर को इसी तरह बरकरार रखना. अच्छे शेरों के लिए बेहद शुक्रिया ठाकुर साहब,
विलास पंडित "मुसाफ़िर"

kavi kulwant said...

Dinesh thakur ji ko padh kar bahut achcha laga.. satpaal ji ka shukriya..

सतपाल ख़याल said...

Aadaab Dheer saahab !

> naye-pan kee aapkee baat se ittefaak rakhte hue yeh hee arz hai keh, kitne hee khayaal alfaaz ke naye libaas meN baar_haa parose jaate haiN. magar dohraane ke baawjud har baar pehle saa hee asar chhoRte jaate haiN!<<

धीर जी मै ये कहना चाहता हूँ कि भले बात पुरानी हो, लेकिन कुछ इस तरह से कही गई हो कि वो तरो-ताज़ा और नवीन लगे। बात अच्छे या बुरे की नहीं है । और ये हमेशा नहीं होता कि कि दुहराई हुई बात असर छोड़े उसी वक़्त होता है जब बात कुछ नये प्रतीकों या नयेपन से कही हो।

बाकी इस शे’र के लिए दाद क़बूल करें-
bhalee baatoN ko dohraataa rahungaa maiN,
bhalee baatoN ko dohraanaa zarooree hai!

गौतम राजरिशी said...

ठाकुर साब के अशआरों में व्याप्त नयेपन की तरह आज की पोस्ट भी हम ग़ज़ल-छात्रों के लिये खूब सारे नये सबक समेटे हुयी है।

शुक्रिया सतपाल भाई...दिनेश ठाकुर की ग़ज़लों के लिये भी और इस महत्व्पूर्ण पाठ के लिये भी।

सतपाल ख़याल said...

गौतम भाई,
हमारा मक़सद ग़ज़ल को समझना ज़्यादा है,समझाना कम। क्योंकि मैं ख़ुद बहुत कुछ सीख रहा हूँ इसी मंच की वज़ह से और आप जैसे दोस्त भी इसी मंच की देन हैं।

श्रद्धा जैन said...

Satpaal ji
har sher kamaal aapne Dinesh thakur ji ki gazlen padhayi saath hi kayi sare udaharn aur nayi nayi baaten
bahut badiya rahi post

Please छाया को ...... शाया कर लें

Anonymous said...

सतपालजी,
मुआफ़ी चाहूँगा की शहर के बाहर होने की वजह से न अपना मेल देख पाया और न ही आपका ब्लॉग. आज दोनों काम किये. आपने ग़ज़लों को जिस सलीक़े के साथ पेश किया, उसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. दरअसल, आजकल ग़ज़ल लिखना फैशन-सा हो गया है और जो लिखा जा रहा है, जैसा लिखा जा रहा है (खासकर हिंदी ग़ज़ल के नाम पर) , उससे आप बखूबी वाकिफ़ हैं. मैं अपने बारे में कोई बड़े दावे नहीं करता, लेकिन किसी भी ग़ज़ल को लिखने से पहले उसके भावों को भरपूर ढंग से जीता हूँ. ग़ज़ल की नज़ाकत को बरक़रार रखने के लिए यह बेहद ज़रूरी है. जैसा किसी ने कहा है...'ग़ज़ल में बंदिशो-अल्फाज़ ही नहीं काफ़ी, जिगर का खून भी कुछ चाहिए असर के लिए.' ग़ज़ल के लिए गहराई के साथ-साथ मासूम तबीयत की भी दरकार होती है. जिन लोगों ने ग़ज़ल को झुनझुना बना रखा है, वे मुझे ज़रा भी मुत्तासिर नहीं करते. भाई, नारेबाज़ी और सुख़न में कुछ तो फर्क होना चाहिए. मैंने अपने पहले दीवान को इससे महफूज़ रखा था (जो शायद आपकी लाइब्रेरी में मौजूद है) और इन दिनों जिस नए दीवान को मुकम्मल कर रहा हूँ, उसमें भी मैंने यह ख़याल रखा है कि ग़ज़ल जदीद तो हो, लेकिन अपनी रिवायत से, अपनी नज़ाकत से, अपनी खूबसूरती से दूर न हो जाए. बहरहाल, एक अच्छे ब्लॉग के संचालन के लिए बधाई. उम्मीद है, राब्ता क़ायम रखेंगे..दिनेश ठाकुर

kumar zahid said...

ख्याल साहब ,बहुत दिनों बाद नेट पर बेठना हुआ है
आज की गजल में दिनेश ठाकुर को प्रस्तुत करते हुए जो बातें हुईं उससे बेहद बढ़िया जानकारी हासिल हुई.. आपकस यह ब्लाग हम जैसों के लिए सुकूनगाह है

jogeshwar garg said...

वाह भाटियाजी !
आनंद आ गया श्री दिनेश ठाकुर को पढ़ कर. ऐसी ताजगी, नजाकत और नफासत एक साथ बिरले ही देखने को मिलती है. तीनों ग़ज़लें बहुत ही उम्दा हैं. उनके बारे में और जानने की इच्छा हो रही है. मेरी मुबारकबाद उन तक पहुंचाने की तकलीफ गवारा करें.
जोगेश्वर गर्ग.

Anonymous said...

satpalji aapka bahut-bahut shukriya dinesh thakurji ki tajgi se bharpoor ghazlon ke liye.in ghazlon ke sabhi sher lajwab hain.kya aap dineshji ka phone no. aur e-mail de sakte hain?
-antima kinger

Anonymous said...

satpalji aapka bahut-bahut shukriya dinesh thakurji ki tajgi se bharpoor ghazlon ke liye.in ghazlon ke sabhi sher lajwab hain.kya aap dineshji ka phone no. aur e-mail de sakte hain?
-antima kinger