Monday, April 12, 2010

राहत इन्दौरी साहब की नई ग़ज़ल


















राहत इन्दौरी किसी तआरुफ़ के मोहताज़ नहीं हैं। उनकी एक ताज़ा ग़ज़ल, उनकी इजाज़त के साथ शाया कर रहा हूँ। छोटी बहर की बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है । लीजिए मुलाहिज़ा कीजिए-

ग़ज़ल

तू शब्दों का दास रे जोगी
तेरा कहाँ विशवास रे जोगी

इक दिन विष का प्याला पी जा
फिर न लगेगी प्यास रे जोगी

ये साँसों का बन्दी जीवन
किस को आया रास रे जोगी

विधवा हो गई सारी नगरी
कौन चला बनवास रे जोगी


पुर आई थी मन की नदिया
बह गए सब एहसास रे जोगी

इक पल के सुख की क्या क़ीमत
दुख हैं बाराह मास रे जोगी

बस्ती पीछा कब छोड़ेगी
लाख धरे सन्यास रे जोगी

चार फ़ेलुन की बहर

और राहत साहब को सुन भी लीजिए-