Tuesday, May 25, 2010

आठवीं क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी

इस क़िस्त कि शुरूआत इस ग़ज़ल से कर रहे हैं ,जिसमें जगजीत सिंह ने जोगी शब्द को अलग-अलग अंदाज़ में पेश किया है। ठीक वैसे ही जैसे शायरों ने इस मुशायरे में जोगी को नचाया।



नये-पुराने शायरों को हमने एक साथ शाया किया है ताकि प्रयास, अनुभव से सीख सके और अनुभव, नये का मार्गदर्शन और स्वागत कर सके। इस तरही मुशायरे की अंतिम क़िस्त 27 तारीख को शाया होगी , जिसमें आदरणीय द्विज जी की और मुझ नाचीज़ की ग़ज़ल शाया की जाएगी। आप सब समापन सामारोह पर सादर आमंत्रित हैं। हर शायर जो यहाँ पेश हुआ है उससे अपेक्षा है कि वो समापन पर ज़रूर पधारे । लीजिए आठवीं क़िस्त आप सब की नज़्र कर रहा हूँ-

विनोद कुमार पांडेय

बैठ मेरे तू पास रे जोगी
बात कहूँ कुछ खास रे जोगी

सच्चाई है, इसको जानो
हर दिल रब का वास रे जोगी

रंग बदलते इंसानों का
कौन करे विश्वास रे जोगी

अपनों ने ही गर्दन काटी
देख ज़रा इतिहास रे जोगी

आज ग़रीबी के आगे तो
मंद पड़े उल्लास रे जोगी

देख तमाशा इस दुनिया का
मत हो ऐसे उदास रे जोगी

फैंकों अपनी झोला-झंडी
हो जाओ बिंदास रे जोगी

कुमार ज़ाहिद

मत रख तू उपवास रे जोगी
झूठी है हर आस रे जोगी

गिरह लगाकर याद रखे जो
उसका क्या विश्वास रे जोगी

चाहे जिसकी चाह छुपी हो
है मिथ्या संन्यास रे जोगी

मनका- मनका, इनका- उनका
मन का मिटा न त्रास रे जोगी

चल ‘ज़ाहिद’ से मिलकर पूछें
मिटती कैसे प्यास रे जोगी

कवि कुलवंत सिंह

किसको है संत्रास रे जोगी
कौन चला बनवास रे जोगी

रब के दरस को मारा फिरता
कैसी है यह प्यास रे जोगी

धरती ढ़ूंढी,अंबर ढ़ूंढ़ा
उसको पाया पास रे जोगी

लाख जतन कर के मैं हारा
कैसे बुझे यह प्यास रे जोगी

जीवन में जब तूफां आया
डोल चला विश्वास रे जोगी

हर पल प्रभु लीला मैं गाता
कब आयें प्रभु पास रे जोगी

गौतम सचदेव

यह कैसा संन्यास रे जोगी
निशि-दिन, भोग-विलास रे जोगी

मुज़रिम ये उजले कपड़ों में
जाएँ न कारावास रे जोगी

मठ के ऊपर भजन आरती
नीचे है रनिवास रे जोगी

क़ातिल को ज़न्नत मिलती है
ख़ूनी यह विश्वास रे जोगी

हत्यारा मानव, मानव का
यह ही है इतिहास रे जोगी

जोग रमाये जा पर जग का
मत कर सत्यानास रे जोगी

पाखंडों की चादर ओढ़े
धर्म हुए बकवास रे जोगी

चैन सिंह शेखावत

क्यों जाना बनवास रे जोगी
वो है इतने पास रे जोगी

अंधियारों से वह जूझेगा
जिसके ह्रदय उजास रे जोगी

शोर उठेगा दूर- दूर तक
जब टूटे विश्वास रे जोगी

जीवन जिनसे जीत न पाया
अन्न वस्त्र आवास रे जोगी

कुछ न बचा बस मेरे हिस्से
गिनती के कुछ श्वास रे जोगी

सातवीं क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी














विलास पंडित "मुसाफ़िर" के इस खूबसूरत शे’र के साथ -

उसमें विष का वास भरा है
शब्द है जो विश्वास रे जोगी

और माहक साहब के इस फ़लसफ़े-

बीता जीवन,जी लीं साँसें
बीत गया मधुमास रे जोगी


-के साथ हाज़िर हैं सातवीं क़िस्त की तीन ग़ज़लें।

डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी

प्रीत न आई रास रे जोगी
ले लूँ क्या बनवास रे जोगी

दर-दर यूँ ही भटक रहा हूँ
आता नहीँ क्यों पास रे जोगी

कब तक भूखा प्यासा रहूँ मैं
आ के बुझा जा प्यास रे जोगी

देगा कब तू आख़िर दर्शन
मन है बहुत उदास रे जोगी

कितना बेहिस है तू आख़िर
तुझको नहीं एहसास रे जोगी

मन को चंचल कर देती है
अब भी मिलन की प्यास रे जोगी

छोड़ के तेरा जाऊँ कहाँ दर
मैं तो तेरा दास रे जोगी

सब्र की हो गई हद ‘बर्क़ी’ की
तेरा सत्यानास रे जोगी

विलास पंडित "मुसाफ़िर"

हुक़्म है तेरा ख़ास रे जोगी
मैं तो तेरा दास रे जोगी

जीवन का इक रूप है ये तो
खेले सारे रास रे जोगी

सब कुछ मेरा नाम है तेरे
जो भी मेरे पास रे जोगी

खूब ठिठौली कर लेता है
तू भी है बिंदास रे जोगी

जब से रूठा है तू मुझसे
टूटी मेरी आस रे जोगी

दुनिया को देना है,क्या दें
पत्थर या अल्मास रे जोगी

जोगन तेरी राह तके है
आया सावन मास रे जोगी

बस में होता तो मैं देता
रावण को बनवास रे जोगी

उसमें विष का वास भरा है
शब्द है जो विश्वास रे जोगी

तुझको देख के मुझको रब का
होता है एहसास रे जोगी

शायर तो दुनिया में लाखों
एक "मुसाफ़िर" ख़ास रे जोगी

डा.अजमल ख़ान "माहक" लखनऊ से

ओ जोगी तुम ख़ास रे जोगी
हमको तुम से आस रे जोगी

राम सिया संग जाई बसे वन
तज कर भोग विलास रे जोगी

देख रहे हैं अपने सारे
कौन चला बनवास रे जोगी

मोह में जब तुम इतने उलझे
काहे का सन्यास रे जोगी

जिन को भूख की आदत पड़ गई
उनको क्या उपवास रे जोगी

बीता जीवन,जी लीं साँसें
बीत गया मधुमास रे जोगी

ज्ञानी ध्यानी सब दुखियारे
मोह रचाऐ रास रे जोगी

घर छोड़ा पर जग नांहि छूटा
तू माया का दास रे जोगी

सच मिलता रोता- चिल्लाता
सहता है उपहास रे जोगी

“माहक” दुनिया देख रहा है
आई उसको रास रे जोगी