Friday, April 6, 2012

राहत इंदौरी
















राहत इंदौरी साहब ने शायरी को इबादत बना लिया है और इबादत भी किसी पहुँचे हुए फ़क़ीर जैसी।

सब अपनी-अपनी ज़ुबां में अपने रसूल का ज़िक्र कर रहे हैं
फ़लक पे तारे चमक रहे हैं, शजर पे पत्ते खड़क रहे हैं

ऐसे शे’र कहते वक़्त शायर रुहानीयत के शिखर पर पहुँच जाता है और फिर उसके अल्फ़ाज़ सचमुच जी उठते हैं।

मुलाहिज़ा कीजिए -

मेरे पैयंबर का नाम है जो , मेरी ज़बां पर चमक रहा है
गले से किरनें निकल रही हैं,लबों से ज़म-ज़म टपक रहा है

मैं रात के आख़री पहर में, जब आपकी नात लिख रहा था
लगा के अल्फ़ाज़ जी उठे हैं , लगा के कागज़ धधक रहा है

सब अपनी-अपनी ज़ुबां में अपने रसूल का ज़िक्र कर रहे हैं
फ़लक पे तारे चमक रहे हैं, शजर पे पत्ता खड़क रहा है

मेरे नबी की दुआएँ हैं ये , मेरे ख़ुदा की अताएँ हैं ये
कि खुश्क मिट्टी का ठीकरा भी , हयात बनकर खनक रहा है

5 comments:

रचना दीक्षित said...

राहत इंदौरी साहब कि शायरी से रूबरू कराने के लिए आभार

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

मैं स्वयं राहत इन्दौरी जी का बहुत बड़ा प्रसंशक हूँ। प्रस्तुति के लिये बहुत बहुत बधाई....

शारदा अरोरा said...

bahut badhiya , aabhaar...

Anonymous said...

me rahat indori ka bahut bada fan ho...

Yudhisthar raj said...

बेहतरीन ....

मेरे नबी की दुआएँ हैं ये , मेरे ख़ुदा की अताएँ हैं ये
कि खुश्क मिट्टी का ठीकरा भी , हयात बनकर खनक रहा है