
22 जुलाई 1952 को जयपुर मे जन्मे श्री राजेश रेड्डी उन गिने-चुने शायरों में से हैं जिन्होंने ग़ज़ल की नई पहचान को और मजबूत किया और इसे लोगों ने सराहा भी .आप ने हिंदी साहित्य मे एम.ए. किया, फिर उसके बाद "राजस्थान पत्रिका" मे संपादन भी किया.आप नाटककार, संगीतकार, गीतकार और बहुत अच्छे गायक भी हैं.आप डॉ. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला सम्मान हासिल कर चुके हैं.अभी आप आकाशवाणी मुंबई मे डायेरेक्टर सेल्स की हैसीयत से काम कर रहे हैं .जाने-माने ग़ज़ल गायक इनकी ग़ज़लों को गा चुके हैं. नेट पर इनकी कुछ ग़ज़लें हैं जिन्हें हम छाप सकते थे लेकिन जो ग़ज़लें नहीं हैं उनको हमने यहां हाज़िर किया है और ये राजेश जी की वज़ह से ही मुमकिन हुआ है मेरे एक अनुरोध पर उन्होंने अपना ग़ज़ल संग्रह "उड़ान"मुझे भेजा जिसकी बदौलत ये ग़ज़लें आप तक पहुंची और इसे हम दो या तीन हिस्सों मे पेश करेंगे. लीजिए पहली पाँच ग़ज़लें-
एक

ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा
वहाँ भी रेत का अंबार होगा
ये सारे शहर मे दहशत सी क्यों हैं
यकीनन कल कोई त्योहार होगा
बदल जाएगी इस बच्चे की दुनिया
जब इसके सामने अख़बार होगा
उसे नाकामियां खु़द ढूंढ लेंगी
यहाँ जो साहिबे-किरदार होगा
समझ जाते हैं दरिया के मुसाफ़िर
जहां में हूँ वहां मंझदार होगा
वो निकला है फिर इक उम्मीद लेकर
वो फिर इक दर्द से दो-चार होगा
ज़माने को बदलने का इरादा
तू अब भी मान ले बेकार होगा
दो

कोई इक तिशनगी कोई समुन्दर लेके आया है
जहाँ मे हर कोई अपना मुकद्दर लेके आया है
तबस्सुम उसके होठों पर है उसके हाथ मे गुल है
मगर मालूम है मुझको वो खंज़र लेके आया है
तेरी महफ़िल से दिल कुछ और तनहा होके लौटा है
ये लेने क्या गया था और क्या घर लेके आया है
बसा था शहर में बसने का इक सपना जिन आँखों में
वो उन आँखों मे घर जलने का मंज़र लेके आया है
न मंज़िल है न मंज़िल की है कोई दूर तक उम्मीद
ये किस रस्ते पे मुझको मेरा रहबर लेके आया है
तीन

निगाहों में वो हैरानी नहीं है
नए बच्चों में नादानी नहीं है
ये कैसा दौर है कातिल के दिल में
ज़रा सी भी पशेमानी नहीं है
नज़र के सामने है ऐसी दुनिया
जो दिल की जानी पहचानी नहीं है
जो दिखता है वो मिट जाता है इक दिन
नहीं दिखता वो, जो फ़ानी नहीं है
खु़दा अब ले ले मुझसे मेरी दुनिया
मेरे बस की ये वीरानी नहीं है
कोई तो बात है मेरे सुख़न मे
ये दुनिया यूँ ही दीवानी नहीं है
चार

मेरी ज़िंदगी के मआनी बदल दे
खु़दा इस समुन्दर का पानी बदल दे
कई बाक़ये यूँ लगे, जैसे कोई
सुनाते-सुनाते कहानी बदल दे
न आया तमाम उम्र आखि़र न आया
वो पल जो मेरी ज़िंदगानी बदल दे
उढ़ा दे मेरी रूह को इक नया तन
ये चादर है मैली- पुरानी, बदल दे
है सदियों से दुनिया में दुख़ की हकूमत
खु़दा! अब तो ये हुक्मरानी बदल दे
पाँच

डाल से बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए
इक हकी़क़त थे जो कल तक दास्तां मे खो गए
जुस्तजू में जिसकी हम आए थे वो कुछ और था
ये जहाँ कुछ और है हम जिस जहाँ मे खो गए
हसरतें जितनी भी थीं सब आह बनके उड़ गईं
ख़्वाब जितने भी थे सब अश्के-रवाँ मे खो गए
लेके अपनी-अपनी किस्मत आए थे गुलशन मे गुल
कुछ बहारों मे खिले और कुछ ख़िज़ाँ में खो गए
ज़िंदगी हमने सुना था चार दिन का खेल है
चार दिन अपने तो लेकिन इम्तिहाँ मे खो गए
अगली पाँच ग़ज़लें जल्द हाज़िर करूंगा.



