
शायर होना आसान है लेकिन वली होना बहुत मुशकिल है-
ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान “ग़ालिब”
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता
यूँ तो शायरी में गा़लिब का स्थान किसी औलिए से कम नहीं लेकिन ग़ालिब को महफ़िलों में गाया जाता है और कबीर को मंदिरों में। इस फ़र्क को गा़लिब समझते थे।
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय ..कबीर
पीरो-मुर्शिद, औलिये, संत,फ़कीर और वली इन्हें हम "साईं" कहकर बुलाते हैं, साईं यानि मालिक । पूज्य शिरडी के संत तो "साईं" नाम से ही जाने जाते हैं। साईं रदीफ़ पर एक बहुत सादा और तसव्वुफ़ के रंग में रंगी एक ग़ज़ल आज आपकी नज़्र कर रहा हूँ जिसके शायर हैं जनाब महमूद अकरम जो न्यू जर्सी में रहते हैं। उनकी ये ग़ज़ल दो साल पहले पढ़ी थी,आप भी मुलाहिज़ा कीजिए-
ग़ज़ल
मेरे हक़ में कोई दुआ साईं
बे-रंग हूँ, रंग चढ़ा साईं
मैं कौन हूँ,क्या हूँ, कैसा हूँ?
मैं कुछ भी नहीं समझा साईं
मेरी रात तो थी तारीक बहुत
मेरा दिन बे-नूर हुआ साईं
था छेद प्याले के अंदर
नहीं आँख में अश्क बचा साईं
वही तश्ना-लबी, वही खस्ता-तनी
मेरा हाल नहीं बदला साईं
गुम-कर्दा राह मुसाफ़िर हूँ
मुझे कोई राह दिखा साईं
मेरे दिल में नूर ज़हूर करे
मेरे मन में दीया जला साईं
मेरी झोली में फल-फूल गिरें
कोई शाख़े-सब्ज़ हिला साईं
मेरे तन का सहरा महक उठे
मेरी रेत में फूल उगा साईं
मुझे लफ़्ज़ों की ख़ैरात मिले
मेरा हो मज़मून जुदा साईं
मेरे दिल में तेरा दर्द रहे
हो जाए दिल दरिया साईं
कोई नहीं फ़क़ीर मेरे जैसा
कहाँ दहर में तुझ जैसा साईं
मेरी आँख में एक सितारा हो
मेरे हाथ में गुल-दस्ता साईं
तेरी जानिब बढ़ता जाऊँ मैं
और ख़त्म न हो रस्ता साईं
तेरे फूल महकते रहें सदा
तेरा जलता रहे दीया साईं
अब बात जब तसव्वुफ़ की चली है तो एक सूफ़ी कलाम सुनिए । ऐसे कलाम पर हज़ारों दीवान न्यौछावर, हज़ारों अशआर कुर्बान। इसे गाया है सूफ़ी गायक हंस राज हंस ने, जिसकी आवाज़ सुनते ही फ़क़ीरों की सोहबत का सा अहसास होता है-