Wednesday, December 23, 2009

कृश्न कुमार 'तूर' साहिब की दो ग़ज़लें

















11 अक्तूबर 1933 को जन्मे जनाब—ए—कृश्न कुमार 'तूर' साहब ने उर्दू , अँग्रेज़ी और इतिहास जैसे तीन विषयों में एम.ए. किया है.आप हिमाचल प्रदेश के टूरिज़म विभाग में उच्च अधिकारी रह चुके हैं.आपका का क़लाम उर्दू जगत में प्रकाशित होने वाली लगभग सभी पत्रिकाओं में बड़े आदर से छपता है.भारत में आयोजित तमाम कुल—हिन्द और हिन्द—पाक मुशायरों में इन्हें बड़े अदब से सुना जाता है.
इनकी प्रसिद्ध किताबें हैं - आलम ऐन ; मुश्क—मुनव्वर; शेर शगुफ़्त ; रफ़्ता रम्ज़ ; सरनामा—ए—गुमाँ नज़री .'तूर' साहब अर्से से उर्दू में प्रकाशित सर सब्ज़ पत्रिका के सम्पादक हैं.पेश हैं इनकी तीन ग़ज़लें-

एक

मैं मंज़र हूँ *पस मंज़र से मेरा रिश्ता बहुत
आख़िर मेरी पेशानी पे सूरज चमका बहुत

जाने कौन से *इस्मे-अना के हम *ज़िन्दानी थे
तेरे नाम को लेकर हमने ख़ुद को चाहा बहुत

उनसे क्या रिश्ता था वो क्या मेरे लगते थे
गिरने लगे जब पेड़ से पत्ते तो मैं रोया बहुत

कैसी *मसाफ़त सामने थी और सफ़र था कैसा लहू
मैंने उसको उसने मुझको मुड़ के देखा बहुत

है दरिया के *लम्स पे नाज़ाँ इक काग़ज़ की नाव
सूरज से बातें करता है एक दरीचा बहुत

सारी उम्र किसी की ख़ातिर सूली पे लटका
शायद 'तूर' मेरे अन्दर इक शख़्स था ज़िन्दा बहुत

(6फ़ेलुन+1फ़े)
पस मंज़र=पृष्ठभूमि,*इस्मे-अना -अहम का नाम,ज़िन्दानी -कै़दी,मसाफ़त-सफ़र की दूरी,लम्स-स्पर्श

दो

अब सामने लाएँ आईना क्या
हम ख़ुद को दिखाएँ आईना क्या

ये दिल है इसे तो टूटना था
दुनिया से बचाएँ आईना क्या

इस में जो अक्स है ख़बर है
अब देखें दिखाएँ आईना क्या

क्या *दहर को *इज़ने-आगही दें
पत्थर को दिखाएँ आईना क्या

उस *रश्क़े-क़मर से वस्ल रक्खें
पहलू में सुलाएँ आईना क्या

हम भी तो मिसाले-आईना हैं
अब ‘तूर’ हटाएँ आईना क्या

रश्क़े-क़मर - चाँद से हसीन,*दहर -दुनिया,इज़्न-इजाज़त,आगही-जानकारी

बहरे-हज़ज की मुज़ाहिफ़ शक्ल
मफ़ऊलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
222 212 122 या 2211 212 122

तीन

तेरे फ़िराक़ में जितनी भी अश्कबारी की
मिसाले-ताज़ा रही वो दिले-हज़ारी की

था कुछ ज़माने का बर्ताव भी *सितम आमेज़
थी लौ भी तेज़ कुछ अपनी अना-ख़ुमारी की

ये किसके नाम का अब गूँजता है अनहदनाद
ये कौन जिसने मेरे दिल पे मीनाकारी की

कभी-कभी ही हुई मेरी फ़स्ले-जाँ सर सब्ज़
कभी कभी ही मेरे इश्क़ ने पुकारी की

अगर वो सामने आए तो उससे पूछूँ मैं
ये किस की फ़र्दे-अमल मेरे नाम जारी की

सदा-ए-दर्द पड़ी भी तो बहरे कानों में
हमारे दिल ने अगर्चे बहुत पुकारी की

जो हम ज़माने में बरबाद हो गए हैं तो क्या
सज़ा तो मिलनी थी आख़िर ख़ुद अख़्तियारी की

जिसे न पासे महब्बत न दोस्ती का लिहाज़
ये ‘तूर’ तुमने भी किस बेवफ़ा से यारी की

*सितम आमेज़- जुल्म से भरा हुआ,अना-ख़ुमारी -अहम का नशा, अश्कबारी-आँसुओं की बरसात

बहरे-मजतस की मुज़ाहिफ़ शक्ल
म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन
1212 1122 1212 22/ 112
सम्पर्क:134—E,Khaniyara Road,
Dharmshala—176215 (Himachal Pradesh)
फोन: 01892—222932 ; मोबाइल: 098160—20854

8 comments:

devmanipandey said...

उनसे क्या रिश्ता था वो क्या मेरे लगते थे
गिरने लगे जब पेड़ से पत्ते तो मैं रोया बहुत

तूर साहब के कलाम बहुत अच्छे लगे।

jogeshwar garg said...

था कुछ ज़माने का बर्ताव भी सितम आमेज़
थी लौ भी तेज़ कुछ अपनी अना-ख़ुमारी की

बहुत खूब तूर साहब !
सज़दा करने को जी चाहता है आपको और आपके कलाम को !
ईश्वर आपको स्वस्थ दीर्घायु और आपके कलाम को और ऊंचाइयां दे !

psingh said...

बहुत अच्छी रचना
हम भी तो मिसाले-आईना हैं
अब ‘तूर’ हटाएँ आईना क्या
बहुत -२ आभार

तिलक राज कपूर said...

आपकी तीनों ग़ज़लें नये शाईरों के लिये उदाहरण हैं कहन की और पहली दो ग़ज़लें नये रदीफ का प्रयोग कितने प्रभावकारी रूप से किया जा सकता है इसकी। हर शेर बोलता है कि आप किस मकाम पर खड़े होकर ज़माने को सदायें दे रहे हैं।
ये ग़ज़लें कभी मिसालें बनकर किताबों में मिलेंगी।
तिलक राज कपूर

kavi kulwant said...

Toor saheb ko padhna to saubhagya ki baat hai.. thansk satpaal ji..

MUFLIS said...

सारी उम्र किसी की ख़ातिर सूली पे लटका
शायद 'तूर' मेरे अन्दर इक शख़्स था ज़िन्दा बहुत

था कुछ जमाने का बर्ताव भी सितम आमोज़
थी लौ भी तेज़ कुछ अपनी अना खुमारी की

jo हम ज़माने में बरबाद हो गए हैं तो क्या
सज़ा तो मिलनी थी आख़िर ख़ुद अख़्तियारी की

कहन के हिसाब से अच्छी ग़ज़लें हैं
"तूर साहब" को पहले पढने का मौक़ा
कभी नहीं मिला
आज आपकी नवाज़िश हुई,,
और
मन को परखने का मौक़ा मिल ही गया ....
आपकी इदारत पर भी नाज़ाँ हूँ ,,,
जो बकमाल शाईरी से रु ब रु होने का
फख्र हासिल हो पाता है.....
kuchh deegar tabsiroN ka bhi
intzaar rahegaa .
m u b a r a k b a a d.

Devi Nangrani said...

तुर साहेब तो पड़कर सोच भी ठिठक गयी पल दो पल. एक एक शेर चतनों से अपने रस्ते बनता हुआ पत्रों से झरने की तरह कल कल बहता हुआ.

ये किसके नाम का अब गूँजता है अनहदनाद
ये कौन जिसने मेरे दिल पे मीनाकारी की
मेरी जुबान की क्कामोशियन इसकी ज़मीं है


नव वर्ष की मंगलकामनाओं सहित
देवी नागरानी

योगेश स्वप्न said...

नव वर्ष २०१० की हार्दिक मंगलकामनाएं. ईश्वर २०१० में आपको और आपके परिवार को सुख समृद्धि , धन वैभव ,शांति, भक्ति, और ढेर सारी खुशियाँ प्रदान करें . योगेश वर्मा "स्वप्न"